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राजनीति-सरकार

करप्शन के समंदर में सियासती रंगा बेहद चंगा

देशपाल सिंह पंवारआजादी मिलने के बाद हिंदुस्तान में सत्ता भरष्टाचारियों, मुफ्तखोरों, दुष्टों, बदमाशों, निकम्मों, घूसखोरों, लुटेरों के हाथों में चली जाएगी। हवा को छोड़कर बाकी हर चीज पर टैक्स होगा। एक टुकड़ा रोटी और एक बूंद पानी तक के लिए वे जनता को चूसेंगे। हिंदुस्तानी नेता कम क्षमता वाले लोग होंगे जो जुबान के मीठे और दिल के काले होंगे। आपस में लड़ेंगे, जनता को लड़ाएंगे, एक दिन हिंदुस्तान राजनीतिक झगड़ों में उलझकर रह जाएगा। विंस्टन चर्चिल (हिंदुस्तान की आजादी से पहले तत्कालीन ब्रिटिश प्रधानमंत्री का बयान)। उस वक्त चर्चिल ने जो कहा था, पंडित जवाहर लाल नेहरू समेत तमाम कांग्रेसी नेताओं ने मखौल उड़ाया था। हिंदुस्तान की आजादी की पीड़ा, जलन और ना जाने क्या-क्या आरोपों का राग गाया था।

देशपाल सिंह पंवारआजादी मिलने के बाद हिंदुस्तान में सत्ता भरष्टाचारियों, मुफ्तखोरों, दुष्टों, बदमाशों, निकम्मों, घूसखोरों, लुटेरों के हाथों में चली जाएगी। हवा को छोड़कर बाकी हर चीज पर टैक्स होगा। एक टुकड़ा रोटी और एक बूंद पानी तक के लिए वे जनता को चूसेंगे। हिंदुस्तानी नेता कम क्षमता वाले लोग होंगे जो जुबान के मीठे और दिल के काले होंगे। आपस में लड़ेंगे, जनता को लड़ाएंगे, एक दिन हिंदुस्तान राजनीतिक झगड़ों में उलझकर रह जाएगा। विंस्टन चर्चिल (हिंदुस्तान की आजादी से पहले तत्कालीन ब्रिटिश प्रधानमंत्री का बयान)। उस वक्त चर्चिल ने जो कहा था, पंडित जवाहर लाल नेहरू समेत तमाम कांग्रेसी नेताओं ने मखौल उड़ाया था। हिंदुस्तान की आजादी की पीड़ा, जलन और ना जाने क्या-क्या आरोपों का राग गाया था।

आजादी पाने का अनमोल लम्हा सामने था,  इस वजह से सबने अंग्रेजी सल्तनत की विदाई की खुशियां मनाई थीं। चर्चिल की चौतरफा जगहंसाई थी। बेहद तेजी से वक्त बदला-रक्त बदला-भक्त बदला-यानि सब बदला। सियासतदां को छोड़ क्या देश में ऐसा कोई माई का लाल है, जो दिल पर हाथ रखकर दबी जुबान तक में ये कह सके कि हां चर्चिल गलत थे? दावे से कहने की बात तो करना, सोचना, बोलना बहुत दूर की कौड़ी है। इससे ज्यादा अफसोस की बात और क्या होगी कि जो देश आजादी के वक्त 1600 करोड़ का साहूकार था आज वो करीबन 50 लाख करोड़ का कर्जदार है। ये बात दीगर है कि इससे कहीं ज्यादा काली कमाई विदेशी बैंकों में जमा बताई जाती है। वहां धन कितना है ये तो सही-सही ना यहां कोई जन जानता ना कोई मन पर हर तन रकम की अंदाजन फिगर जानकर ही सन्न है। हां ऊपर वाले के रहमोकरम के सहारे (सियासत की ये चाहत कहां?)  इसकी वापसी के ख्वाब पालकर प्रसन्न जरूर हो रहा है। बदनसीबी से पीली खाल को लाल करने के सपनों के ताने-बानों में हकीकत से दूर हो रहा है। चूर हो रहा है। थोड़ा मगरूर हो रहा है। आने से पहले ही गाल बजाने लगा है। हाल-चाल जमाने लगा है। गर्ज जताने लगा है। फर्ज बताने लगा है। काली कमाई आएगी-देश का कर्ज मिटाएगी-उसका मर्ज हटाएगी-अमीरी का जलवा दर्ज अगर वो ऐसा सोच रहा है तो हर्ज क्या है?

हां करप्शन पर नेताओं की लचीली लोच से लोकतंत्र में जो कंटीली मोच आई है उस पर हठीली सोच को सियासतदां कैसे बर्दाश्त कर सकते हैं? ठाठ-बाट से राजपाट चलाने वालों का अगर बस चले तो घाट पर खाट की जगह वे अपनी चाट (कमाई) की हाट लगाकर बैठ जाएं पर सौ फीसदी गनतंत्र का फसाना रोकता है। जमाना टोकता है। राज खोलता है। यही लोकतंत्र का सबसे मजबूत पक्ष है। वरना सियासत के सारे पक्ष अपनी कलाकारी में इतने दक्ष हैं कि ढेरों सवाल ज्यों के त्यों आज तक यक्ष हैं। करप्शन व कालाधन ऐसे ही मसले हैं। ना जाने कब बाबा रामदेव व अन्ना हजारे समेत सारी जनता की अलाप इस पाप की कमाई का नाप ले पाएगी? सरकार का तो हमेशा से यही जाप था। आगे वो करप्शन की खाप को खत्म करेगी इसकी आस ना तो बाबा को है और ना ही आम व खास मास को। उसके लिए तो ये खरमास था, है और रहेगा। दुख इस बात का और ज्यादा है कि जो देश 200 साल तक गुलाम रहा हो, करोड़ों लोगों ने आजादी के लिए कुर्बानी दी हो, युवाओं ने जवानी दी हो, आजादी के तरानों ने नई सुबह की रवानी दी हो, अगली पीढ़ी को आजाद देश की अनमोल निशानी दी हो, उस देश को नेताओं ने क्या दिया? महज 65 साल में सबसे करप्ट देशों में से एक का तमगा।

शुरू से ही राजा हों या रानी-सबकी सोच मनमानी, देश को तबाह करने की ठानी, दिन-रात बस दौलत खानी, जनता तो है आनी-जानी, चाहे दो घूंट मिले ना पानी भूख से जान पड़े गंवानी-सिसकती रहे नानी, नेताओं की क्या हानि? झूठ के रास्तों पर कितनी खूबसूरती से नेता बोलते हैं सच की वाणी?  यही है इस देश में लोकतंत्र की कहानी। मतलब और फायदे के लिए मीठे शब्दों में जो चाहे कहते रहिए। खुश होते रहिए। चमचागिरी के गीत गाते रहिए। कड़वा सच तो यही है। आजादी और लोकतंत्र के नाम पर जनता को क्या मिला? किससे करें शिकवा-गिला? सारे सिस्टम में है करप्शन पिला-सबका विश्वास है जड़ से हिला। पर नेताओं का चेहरा क्यों रहता है खिला? उन्होंने जो दिया वो सबके सामने है पर लाख टके का सवाल यही है कि जो लिया, जो किया, उस पर जनता का मुंह क्यों सिया?  जानते सब हैं। 50 से ज्यादा बसंत पार कर चुके कहीं बेहतर जानते हैं। जानते जवान भी हैं। अफसोस करने की जरूरत नहीं जानते तो हमारे 10 साल तक के बच्चे भी हैं। रोजाना अगर करप्शन का नाग अपना पसंदीदा राग गाएगा, सबको नचाएगा, गुलशन के हर बाग को आग लगाएगा तो क्या वो बच्चा गहरी नींद से नहीं जाग जाएगा? कैसे संस्कार वो पाएगा?

इसे विडम्बना कहिए या किस्मत पर रोइए, गुलामी के दौर में ये देश कुछ और था। ईमानदारी का शोर था। देश प्रेम का जोर था। अंग्रेजी सल्तनत में सूदखोर था। पर घूसखोर बोर था। पर देखो अपना (?) आज के राज का काज-सिर्फ करप्शन व कालेधान का बेसुरा साज। गरीब-गुरबों पर गाज-करप्ट चेहरों पर नाज। ताकतवर नहीं आते बाज। हकीकत यही है कि गणतंत्र के नाम पर हर राजतंत्र में तमाम नेताओं ने मनीमंत्र की राह पकड़ी। जनतंत्र की चाह रगड़ी। लोकतंत्र की थाह जकड़ी। नतीजा जनता कंगाल-नेता मालामाल। बापू का देश आज सबसे करप्ट गिना जाता है। 179 देशों में से 87 हमसे ज्यादा ईमानदार हैं। साल दर साल हम बेईमानी की राह पर फिसलते जा रहे हैं। सिंगापुर चोटी पर है। फिनलैंड और बोत्सवाना जैसे देश हमसे सही हैं। चार साल पहले की एक रिपोर्ट बताती है कि हमारे देश के 11 सरकारी महकमे हर साल 70 हजार करोड़ की रिश्वत डकार जाते हैं। अगर हमने गलत बात कही है-सारा सिस्टम सही है तो फिर ये सब क्या है? बिना घूस की फूंस के किसी काम की फाइल जीरो माइल से आगे क्यों नहीं जाती? कोई काम बिना रिश्वत के क्यों नहीं होता? बिना दाम के आम को उसका नाम तक क्यों नहीं मिलता? देश का पैसा विदेश में क्यों है?  क्या यही वजह नहीं है कि अनेकता में एकता का सुर आज मटकता-चहकता, खनखता, गमकता नहीं बल्कि बहकता, खटकता, भटकता, चटकता नजर आता है। पर देश के फेस को लगी ठेस के केस से ज्यादा सबकी अपनी रेस है। धन की चेस है। शायद इस देश का ग्रह मेष है। फिलहाल तो खुदगर्जी के कम अवशेष हैं। सियासत की मनमर्जी के आगे बहुत कुछ होना शेष है। अमूमन हर इंसान की तारीफ हो तो मिजाज नरम-अंगुली तरफ हो तो खून गरम, पर देश की आन-बान-शान पर घमासान के करम पर शरम क्यों नहीं आती?

अगर स्वार्थ के हरम में जीने की आदत पड़ चुकी है तो फिर कोई बाबा-कोई अन्ना कितना करप्शन का पन्ना खोले, खुलकर बोले-बेशर्मी का गन्ना लेकर सबको होले-होले दौड़ाएगी। लोकतंत्र के लिए खतरा बताएगी। संसदीय व्यवस्था के खत्म होने का डर जताएगी। कागज पर करप्शन मिटाएगी। विकास की नदियां बहाएगी। पर सच यही है कि सियासत यही कहेगी-करेगी, हम देख रहे हैं, हम देखेंगे, हमने देखा है पर तुम आगे क्यों आए, इतना क्यों चिल्लाए, तुम्हारी तो पीछे सीमा रेखा है? तुम्हारे पास देश का ठेका है? हम हैं यहां के सिकंदर-करो इसे अंदर-बनाओ बंदर-पता नहीं कहां से आ गया ये लफंदर? गंगा की गोद में आम जन नंगा- करप्शन के समंदर में सियासत का रंगा बेहद चंगा। ऐसे बेहया सियासतदां से हया-दया की आस करने वाला हर शख्स काम से गया। क्या कुछ होगा नया? होना तो चाहिए। क्या सिर्फ चाहने से होगा? तमतमाने से होगा? होता तो सिर्फ करने से है। इसके वास्ते सामने रास्ते तो हैं। फिलहाल संकरे ही सही पर हैं जरूर। कोई निजात की सूरत नहीं रही ना सही, मगर निजात की कोशिश तो एक मिसाल हुई (दुष्यंत कुमार)।

लेखक देशपाल सिंह पंवार वरिष्‍ठ पत्रकार हैं तथा कई अखबारों के संपादक रह चुके हैं.

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