
कमलजीत
देश में भले ही आधे से ज्यादा आबादी, एक दिन का गुजारा अपने परिवार के साथ बीस रूपये में कर रही है… पर इससे हमारे सांसदों को कोई फर्क नही पड़ता, उन्हें बस फर्क इस बात से पड़ता है कि उनकी सुविधाओ में किसी भी प्रकार की कमी नहीं होनी चाहिए। वैसे भी हमारे सांसदगणों को फर्क पड़े भी तो क्यों? इन्हें गरीब और गरीबी से क्या लेना-देना? अरे भई! इन महंगाई के मारे माननीयों की तनख्वाह समय पर जो आ जाती है, अब तो और बल्ले-बल्ले हो गई है। हाल ही में हुए एक सर्वे के मुताबिक, हिन्दुस्तान में 37 प्रतिशत लोग गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन कर रहे हैं या कहें जीवनयापन करने के लिए मजबूर है। ग्रामीण इलाकों के सूरतेहाल पर नज़र डालें तो 22 प्रतिशत तथा शहरी इलाकों में रहने वाली लगभग 15 प्रतिशत जनता गरीबी रेखा से नीचे रहने के लिए अभिशप्त है।
आंकड़ों की कहानी यहीं नही खत्म होती है। पूरे विश्व में भ्रष्टाचार के मामले में भारत का नाम 100 देशों के अंदर है। साल 2009 में जीसीबी द्वारा 180 देशों में भ्रष्टाचार की स्थिति का सर्वे कराया गया, जिसमें भारत 84 वें स्थान पर आया। इस सर्वे में जनता ने भ्रष्टाचार में बढ़ोत्तरी के लिए देश के इन्हीं माननीयों को ज़िम्मेदार ठहराया है। इसके बावजूद हमारे सांसदों को अपना वेतन काफी कम लगता है। आखिर यह देश में लोकतंत्र की कौन सी जीत है? इस लोकसभा में 544 सांसदो में से 315 सांसद करोड़पति हैं। हाल ही में राज्य सभा के लिए चुने गये 54 सांसदो में से 43 सांसद लखपति हैं। देश के ज़्यादातर सांसद कई फैक्ट्रियों और कई शिक्षण संस्थानों आदि के मालिक है।
अगर वेतन बढ़ोत्तरी के अलावा भी अन्य चीजों पर नज़र डाली जाय तो हमारे सांसदों को सैलरी के अलावा अपने क्षेत्र में दौरा करने, आफिस खर्च, सहायक, फोन इत्यादि ऐसी ना जाने कितनी सुविधाएं दी जाती हैं, जिनका सालाना खर्च कई लाख रूपये में होता है। कोई सांसद मकान या गाड़ी खरीदने हेतु बैंक से कर्ज भी लेता है तो उसे बिना ब्याज के या बिल्कुल कम दर पर कर्ज दिया जाता है। जिस आम जनता की गाढ़ी कमाई में से इन सांसदों को तनख्वाह और तमाम खर्च दिये जाते है, उस आम आदमी के लिए दिन भर में दो रोटी जुटाना भी दुश्वार होता है। देश को आज़ाद हुऐ 63 साल बीत चुके हैं, लेकिन आज भी देश के कई ग्रामीण इलाकों में बिजली तक नही पहुंची हैं, लेकिन इसकी फिक्र किसको है? ये बात किसी से भी नही छिपी है कि हमारे देश के ज्यादातर सांसद कितने अमीर है। हर सांसद अच्छी से अच्छी लग्जरी गाड़ी से चल रहा है, कई सांसदों के आगे-पीछे कई बंदूकधारियों का काफिला भी चलता है, अगर सचमुच हमारे सांसदों की तनख्वाह पहले कम थी तो आखिर इतने सारे आडम्बरों का इन्तजाम कहां से होता आया है?
तनख्वाह बढ़ाने के लिए सांसदों ने देश के नौकरशाहों को मिलने वाली तनख्वाह का हवाला दिया है। एक तरफ ये सांसदगण अपने आप को जनता का सेवक कहते है और दूसरी तरफ जनता की सेवा के एवज में उन्हें मोटी सैलरी भी चाहिये। आज देश के उपर विश्व बैंक का लगभग 9 बिलियन डालर का कर्ज है और ऐसी स्थिति में सांसदों का तनख्वाह बढ़ाने की मांग काफी सोचनीय और शर्मनाक है। ऐसे में एक सवाल ये उठता है कि आखिर इन सांसदों को इतनी तनख्वाह किस बात की दी जानी चाहिये? संसद में बैठकर जूता-चप्पल फेंकने की या फिर संसद में हल्ला मचाकर, अपशब्द कहकर, नोट लहराकर देश की गरिमा गिराने की? सबसे अहम सवाल यह कि अगर हमारे सांसदगण अपने काम के एवज में तनख्वाह की मांग कर रहे हैं तो क्या तनख्वाह बढ़ाने से पहले इन लोगों के काम आकलन नहीं होना चाहिये। सांसदों की तनख्वाह बढ़ा दी गयी है। आज सिर्फ सांसदों ने मांग की है, कल राज्यों में विधायक भी अपनी तनख्वाह बढ़ाने की मांग करेंगे। इसी तरह से तनख्वाह बढ़ाने का क्रम शुरू हो जायेगा और इसका सीधा असर उस आम आदमी पर पड़ेगा, जिसके लिए दिनभर में बीस रूपये जुटाना भी काफी मुश्किल होता है।
लेखक कमलजीत सिंह टीवी पत्रकार हैं.

