भाई संपादक जी आप महान हैं, आप का अखबार, चैनल और पोर्टल ब्रम्हाण्ड का नम्बर-1। इसे तीनों लोक के सुर-असुर, नर-मुनि, देव सभी पढ़ते हैं। यह मेरा सौभाग्य है कि आप ने मेरे लेख रूपी भड़ास को प्रकाशित किया। यदि आप ऐसा न करते तो मेरा बीपी बढ़ जाता और मैं इहलोक से गमन कर जाता। आप के मीडिया डॉट काम का टीआरपी अधिक है, क्यों न हो। वो क्या है कि आप मोबाइल एडिटर हैं- कंप्यूटर की जानकारी रखते हैं सो बना डाला एक ‘पोर्टल’ और पब्लिसिटी करके इसे नम्बर 1 का स्वयं कहने लगे। एक बात तो है डियर स्पूनिंग करने वाले छपास रोगियों की कमी नहीं है। जब तुम लिखते हो तो इतने ‘कमेण्ट्स’ मिलते हैं गोया स्वयं ‘वेदव्यास’ ने अवतार लेकर कलयुग में कुछ लिखा हो या फिर कालीदास, गोस्वामी तुलसी दास-एक्सेट्रा…एक्सेट्रा।
भइया जी काइँया हम भी हैं और जहां की हमारी पैदाइश है वहाँ के अनपढ़ लोग उड़ती चिड़िया के पर गिनने का माद्दा रखते हैं। तुम्हारी नजर में हम गंवईं लेखक हैं, अच्छा यह बताओ कि तुम्हारा जन्म किस मेट्रो सिटी में हुआ है। जानते हो कि धरती पर पहले लोग खुले में रहते थे, बाद में समूहों ने घास-फूस का ‘बसेरा’ बनाकर रहना शुरू किया और आज जहाँ कंक्रीट के जंगल हैं। उसे हम ‘शहर’ कहते हैं। सपोज करो कि तुम इसी तरह के किसी शहर में जन्म लिए हो, पले-बढ़े और पढ़े हो तो इसका यह मतलब नहीं कि तुसी वनली द ग्रेट हो। डियर परफेक्ट कोई नहीं होता न तुम हो और न हम।
राजा कौन कहलाता है, इसकी व्याख्या कर पाना सीधा है। अन्धों में काना राजा मतलब अंधों के समुदाय में जो काना होता है वही ‘राजा’ कहलाने का ‘हक’ रखता है। मैं यह क्यों कहूँ कि तुम अंधों में काना राजा हो। सतयुग से लेकर कलयुग तक प्रचार माध्यमों का बड़ा योगदान रहा है। ‘नारद’ जैसे ‘मीडिया परसन’ अपनी तकनीक से सुर-नर-मुनि, देव-दानव सब पर नजर रखते थे और संवादों का आदान-प्रदान करते थे। उन्हें रंच मात्र भी घमण्ड नहीं था और न ही किसी घटना या प्राणी मात्र को ‘ओवरलुक’ करते थे।
और एक तुम हो कि इतने हाई-फाई कि बस पूछो मत। तुम्हारी टीम में भी भौकाली ब्राण्ड लोग ही होंगे। पोर्टल क्या ऑपरेट करते हो गोया कोई ‘अजूबा’। मैं तो समझता था कि वेबसाइट्स, पोर्टल, ब्लाग नई तकनीकी पर आधारित अजूबे ही होंगे, लेकिन नहीं ऐसा नहीं है। रही जानकारी की बात तो तीस वर्ष पूर्व और आज की जेनरेशन में ‘गैप’ होने की वजह से अन्तर बड़ा हो गया है। डियर 70, 80 के दशक में मैंने नामचीन लेखकों, पत्रकारों के लिए लिखा है। तुम चाहो तो तुम्हारे लिए भी लिख दिया करूँ बस विषय-वस्तु बता दिया करो।
गुस्सा आता है तो लिखने बैठता हूँ। अभी-अभी एन्जीकॉम-बीटा की गोली ली है। बीपी बढ़ा है तब नार्मल हो जाएगा। कह सकते हो कि मीडिया जगत के तुम और तुम्हारी टीम सर्वाधिक व्यस्त और महान है। लोग मानेंगे। नए नमाजी 5 वक्त की नमाज पढ़ते हैं, हालांकि उन्हें ईश्वर, अल्लाह, गॉड, वाहे गुरू से कुछ भी लेना-देना नहीं। बस दिखावे के लिए सजदा करते हैं। पाक ‘काबा’ की तरफ सिर झुकाते हैं। मैं न तो ‘स्पून’ हूँ और न ही ‘स्पूनिंग’ कर पाऊंगा। क्या समझे चम्मच और चमचागीरी दोनों से दूर हूँ मैं। मैं नवनीत (मक्खन) लेपन भी नहीं कर पाता, जिसे ‘बटरिंग’ कहते हैं।
यह सारी कमियाँ मेरे विकास में बाधक रही और हैं, वर्ना आज कई लाख रूपए पर ऐनम पैकेज पर कार्यरत होता। देहात की कहावत कहने के पहले यह कहूँगा कि मुझे अपनी ‘कमियों’ पर कभी पश्चाताप नहीं हुआ और न हीं होता है। ये ही मेरी जमा पूँजी है। वैसे डियर एक बात है स्पूनर्स, बटरर्स की तादात बढ़ी है। मीडिया जगत में तो और भी। देखता हूँ तुम्हारे पोर्टल पर विशेषरूप से तुम्हारे लेख पर इन चम्मचों द्वारा काफी मात्रा में आयलिंग की गई होती है। आखिर क्यों न करें-तुम अपने कथित बड़े पोर्टल पर उनके कमेण्ट्स, लेखों को उचित स्थान देते हो, और वे ही टीआरपी बढ़ाने में सहायक होते हैं। मुझे मालूम है कि तुम्हारे पोर्टल पर पब्लिश होने के लिए लोगों की लम्बी लाइनें लगी हैं, लेकिन हे प्रिय उस ‘क्यू’ में मैं नहीं रहना चाहता।
मुझे रीता ने बताया कि मेरे कई लेख तुम्हारे मेल अथवा ‘डस्टबिन’ में पड़े हैं या फिर ‘डिलीट’ कर दिए गए हैं। ऐसा क्यों मुझे सखेद, सहर्ष लौटा देते तो क्या जाता, मुझे भी मेरी औकात पता लग जाती कि ऊँट से बड़ा पहाड़ है। मैं ऊँट हूँ और तुम-तुम्हारा पोर्टल ‘पहाड़’। घर-बाहर के लोग कहते हैं कि मैं ‘सठिया’ गया हूँ, शायद तुमने भी ऐसा ही कुछ सोचा हो। अब किसी की सोच पर ‘बैन’ लगाना मेरे वश में नहीं। मैं कोई राजतंत्रीय व्यवस्था का शंहशाह नहीं जो हुक्मनामा जारी कर दूँ कि मेरे बारे में ऐसा सोचने वाले को दण्डित किया जाए।
कल ही शाम की बात है मेरे यहाँ का एक 17 वर्षीय किशोर जो शराबी बाप का पुत्र है और लखैरागर्दी करता है मुझसे मिला था। वह बोला आप को बुढ़ापे में कौन सा रोग पकड़े है जो प्रेस/मीडिया से जुड़े हैं। क्या कमी है-आप को तो चाहिए कि बस नाती-पोतों के साथ खेलिए और मस्त रहिए। मैंने कहा था बच्चे तुम्हारी बात हो सकता है ठीक हो, लेकिन क्या करूँ शुरू से कर्म ही ऐसा किया है और अब आदत बन गई है, जब तक लिख न लूँ, भाषण न दे डालूँ तब तक खाना हजम नहीं होता। वह बोला हे ‘सीनियर सिटीजन’ इस समय की प्रेस लाइन बड़ी ही गड़बड़ है। अपढ़, 5, 5+3, 8, 8+2, 10, 10+2 से ऊपर के शिक्षित लोग इस क्षेत्र में नहीं है। सुबह होते ही ये लोग मोटर बाइक से अखबार के सेन्टर पर पहुँच जाते हैं, वहाँ से जिला अस्पताल और खबरें लाकर डेस्क पर रख देते हैं, जिसे तमीज है वह समाचार गढ़ता है। आप का जमाना लद गया है। आप बच-बचाकर चला करिए वर्ना कोई नया प्रेस/मीडिया वाला आप का एक्सीडेण्ट कर सकता है।
उस लड़के की बातें सुनकर कुछ अजीब सा महसूस हुआ था। मैं चुपचाप ‘इवनिंग वाक’ की वापसी उपरान्त भोजन के नाम पर दो-चार ‘लुकमें’ (कौर) डालकर डिनर करने की औपचारिकता पूरी किया और सो गया था। सुबह जगा तो रक्तचाप बढ़ा लगा। चीफ एडिटर रीता ने नेट खोलकर सभी साइट्स दिखवाया- फिर सोचा कि एक भड़ास लिख डालूं और तुम्हें और रीता के पोर्टल में पब्लिश होने के लिए दे दूँ। शायद रीता ने अपने पोर्टल ‘रेनबोन्यूज डॉट इन’ पर उसे प्रकाशित भी कर दिया है, अब देखना है कि तुम क्या करते हो?
भूपेन्द्र सिंह गर्गवंशी अम्बेडकरनगर के निवासी तथा स्वतंत्र पत्रकार हैं.

