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कल यह आपके मां के साथ भी हो सकता है!

एएन शिबली: अब भी न जागे तो बहुत देर हो जायेगी : भड़ास4मीडिया के एडिटर यशवंत सिंह की मां और उनकी दूसरी महिला रिश्तेदारों के साथ गाजीपुर पुलिस ने जो कुछ भी किया उसकी जितनी भी निंदा की जाये कम है। हालांकि बहुत से लोगों को एक शिकायत यह हो सकती है कि चूंकि इस बार पुलिस ज्यादती की शिकार यशवंत की मां हुई हैं  इसलिए वो खुद और दूसरे पत्रकार बावेला मचा रहे हैं। जबकि ऐसा बिल्कुल नहीं है। भड़ास4मीडिया पर जिस प्रकार की खबरें प्रकाशित होती हैं उस से थोड़ा सा भी पढ़ा-लिखा आदमी इस बात का अंदाज़ा आसानी से लगा सकता है की यशवंत नाम का यह आदमी बहुत ही ईमानदार है। इस बात का अंदाज़ा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि यशवंत जिस मैदान में काम कर रहें हैं और देश के बड़े-बड़े पत्रकारों से जैसे उनके संबंध हैं, तो वो पुलिस के खिलाफ इस प्रकार अभियान चलाने के बजाए किसी बड़े नेता से मिलकर गाजीपुर पुलिस का दिमाग ठिकाने लगवा देते। मगर ऐसा करने के बजाए उन्‍होंने लोकतांत्रिक तरीके से पुलिस वालों के खिलाफ मुहिम चलाने का फैसला किया।

एएन शिबली

एएन शिबली: अब भी न जागे तो बहुत देर हो जायेगी : भड़ास4मीडिया के एडिटर यशवंत सिंह की मां और उनकी दूसरी महिला रिश्तेदारों के साथ गाजीपुर पुलिस ने जो कुछ भी किया उसकी जितनी भी निंदा की जाये कम है। हालांकि बहुत से लोगों को एक शिकायत यह हो सकती है कि चूंकि इस बार पुलिस ज्यादती की शिकार यशवंत की मां हुई हैं  इसलिए वो खुद और दूसरे पत्रकार बावेला मचा रहे हैं। जबकि ऐसा बिल्कुल नहीं है। भड़ास4मीडिया पर जिस प्रकार की खबरें प्रकाशित होती हैं उस से थोड़ा सा भी पढ़ा-लिखा आदमी इस बात का अंदाज़ा आसानी से लगा सकता है की यशवंत नाम का यह आदमी बहुत ही ईमानदार है। इस बात का अंदाज़ा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि यशवंत जिस मैदान में काम कर रहें हैं और देश के बड़े-बड़े पत्रकारों से जैसे उनके संबंध हैं, तो वो पुलिस के खिलाफ इस प्रकार अभियान चलाने के बजाए किसी बड़े नेता से मिलकर गाजीपुर पुलिस का दिमाग ठिकाने लगवा देते। मगर ऐसा करने के बजाए उन्‍होंने लोकतांत्रिक तरीके से पुलिस वालों के खिलाफ मुहिम चलाने का फैसला किया।

इस पूरे मामले में अफसोस की बात यह है कि पत्रकार बिरादरी को यशवंत की जिस प्रकार मदद करनी चाहिए, वैसी उन्‍होंने नहीं की। अब तक इस संबंध में मेरी नज़र जिन खबरों या फिर कमेंट्स पर पड़ी हैं, उसमें सब से बड़ा नाम मुझे आलोक तोमर जी का लगा है, जिन्होंने हमेशा की भांति अपने चिर-परिचित अंदाज़ में पुलिस की इस खराब हरकत के खिलाफ लिखा है और उसे अपनी औकात में रहने को कहा है. आज जो पत्रकार इस मुहिम में यशवंत का साथ नहीं दे रहें हैं उन्हें यह समझना चाहिए कल ऐसा उनके साथ भी हो सकता है। यहां दो बात समझने की है। एक तो ज़ुल्म महिला पर हुआ है, दूसरे यह ज़ुल्म एक ऐसे पत्रकार की मां पर हुआ जिसे आज शायद ही कोई पत्रकार हो जो नहीं पहचानता हो।

यशवंत को आज यदि बड़े पत्रकारों का साथ नहीं मिल रहा है तो इसकी एक बड़ी वजह यह है कि वो पूरी ईमानदारी के साथ पत्रकारिता जगत के अंदर की खबर लिखते रहते हैं, चाहे इससे किसी भी बड़े से बड़े पत्रकार का नुकसान क्‍यों न हो रहा हो। ऐसा नहीं है की भड़ास पर सिर्फ हर किसी के खिलाफ ही खबर छपती है। जो अच्छा करते हैं उनकी खबरें भी छपती है और जो बुरा करते हैं उनकी खबरें भी छपती हैं। तो फिर देश के बड़े-बड़े अखबार या पत्रकार आज यशवंत की इस मुहिम में उनका साथ क्‍यों नहीं दे रहें हैं। मेरी देश के सारे पत्रकारों से गुजारिश है कि वो यशवंत की मां को अपनी मां समझें और गाजीपुर पुलिस के खिलाफ कारवाई होने तक चैन की सांस न लें। अगर इसमें आपने कोताही की तो यह ख्‍याल रखें कि यह आज यशवंत की मां के साथ हुआ है कल आपकी मां के साथ हो सकता है।

लेखक ए एन शिबली हिन्‍दुस्‍तान एक्‍सप्रेस के ब्‍यूरोचीफ हैं.

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