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कहर बन टूटने को तैयार है एक और नरमेधी सरकारी सूनामी

लीजिए, कॉर्पोरेट्स के दबाव में देश के गरीब-गुरबों के पेट पर लात मारने को एक और सरकारी सूनामी कहर बन कर टूटने ही वाली है। पांच राज्यों के चुनावी नतीजे आने के बाद केन्द्र सरकार आर्थिक सुधारों के बहाने कॉर्पोरेट घरानों की तिजौरियां भरने को कुछ बड़े और कड़े फैसले लेने जा रही है। इनके जरिये सरकार श्रम कानूनों में सुधार के नाम पर कंपनियों को उत्पादन लागत घटाने तथा निर्यात-प्रोत्साहन के हिसाब से कर्मचारियों की मनमानी छंटनी करने की छूट देने जा रही है। नोटबंदी से तो देशभर में लगभग डेढ़ सौ ही अकाल मौत की नींद सो गये थे, लेकिन इस सूनामी की भेंट कितने बेकसूर चढ़ेंगे इसकी कल्पना नहीं की जा सकती।

लीजिए, कॉर्पोरेट्स के दबाव में देश के गरीब-गुरबों के पेट पर लात मारने को एक और सरकारी सूनामी कहर बन कर टूटने ही वाली है। पांच राज्यों के चुनावी नतीजे आने के बाद केन्द्र सरकार आर्थिक सुधारों के बहाने कॉर्पोरेट घरानों की तिजौरियां भरने को कुछ बड़े और कड़े फैसले लेने जा रही है। इनके जरिये सरकार श्रम कानूनों में सुधार के नाम पर कंपनियों को उत्पादन लागत घटाने तथा निर्यात-प्रोत्साहन के हिसाब से कर्मचारियों की मनमानी छंटनी करने की छूट देने जा रही है। नोटबंदी से तो देशभर में लगभग डेढ़ सौ ही अकाल मौत की नींद सो गये थे, लेकिन इस सूनामी की भेंट कितने बेकसूर चढ़ेंगे इसकी कल्पना नहीं की जा सकती।

पिछले लोकसभा चुनावों में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआइ) के मुद्दे पर पिछली सरकार के विरुद्ध जहरीला वातावरण बनाकर सत्ता के शिखर पर पहुँचे मोदी की सरकार 5 सेक्टरों में एफडीआइ नियमों में छूट देने जा रही है। जिसमें प्रिंट मीडिया में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआइ) की सीमा 26 फीसदी से बढ़ाकर 49 फीसदी करना शामिल है। इसके अतिरिक्त रिटेल में विदेशी निवेश की शर्तों में ढील दी जा सकती है। इसके अंतर्गत विदेशी निवेश वाले फूड स्टोर में होम केयर प्रॉडक्ट रखने की इजाजत भी दी जा सकती है।

सूत्रों के अनुसार, 5 राज्यों के चुनाव नतीजे आने के बाद अगले कुछ हफ्ते आर्थिक सुधारों (इकनॉमिक रिफॉर्म) के मद्देनजर काफी हलचल भरे रहने वाले हैं। इन आर्थिक सुधारों से जुड़े नये कदमों की रूपरेखा तैयार कर ली गई है। सरकार इन कदमों की घोषणा चुनावी नतीजों के बाद करेगी। वित्त मंत्रालय के अधिकारियों का कहना है कि इन सुधारों पर चुनावी नतीजों का कोई असर नहीं होगा। सरकार ने पहले ही इनके बारे में रूपरेखा तैयार कर दी थी। चुनाव आचार संहिता के कारण इन फैसलों को अभी तक टाला गया था।

सूत्रों का कहना है कि आर्थिक सुधारों से जुड़े इन ताजा कदमों को लेकर उद्योगों और मजदूर संगठनों के साथ जरूरी बातचीत हो चुकी है। हालांकि, मजदूर संगठनों ने श्रम कानूनों में सुधार को लेकर कुछ आशंकाएं भी व्यक्त की हैं लेकिन यह अभी स्पष्ट नहीं हो पाया है कि क्या सरकार इन आशंकाओं को दूर करने के बाद ही कोई अंतिम निर्णय लेगी।

भले ही श्रम मंत्री बंडारु दत्तात्रेय यह कहें कि सरकार के लिए मजदूरों के हित सर्वोपरि हैं और हर फैसले में उनके हितों का ध्यान रखा जाएगा। लेकिन जिस तरह मोदी ने 2014 में प्रधानमंत्री का पदभार ग्रहण करने के तुरंत बाद श्रम कानूनों में संशोधन कर उद्योगपतियों को ‘हॉयर एंड फायर’फार्मूले के तहत किसी भी कर्मचारी को जब चाहे तब निकाल बाहर करने का अधिकार दे दिया था, उससे सरकार की नीयत पर शक होना लाजिमी है।

अब एक बार फिर श्रम कानूनों में सुधार के बहाने सरकार 44 श्रम कानूनों को 4 आसान लेबर कोड में बदलने जा रही है। इन नए कानूनी प्रावधानों के तहत छोटी फैक्ट्रियों में कार्यरत 14 से कम कर्मचारियों के लिए यूनियन बनाना मुश्किल हो जाएगा और 300 तक कर्मचारियों वाली कंपनियों में सरकार की अनुमति लिये बिना प्रबंधन अपनी इच्छानुसार छंटनी कर सकेगा।

यहाँ उल्लेखनीय है कि दुनिया के सर्वाधिक अमीर देश अमेरिका के नव-निर्वाचित राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप जहाँ अपने देशवासियों को रोजगार देने के अधिकतम अवसर पैदा करने के लिए विदेशियों के प्रति कड़ा रुख अपना रहे हैं, वहीं हमारे प्रधानमंत्री स्वदेशी श्रमिकों की गर्दन मरोड़ने को देसी-विदेशी कॉर्पोरेट्स की मदद कर रहे हैं। ऐसे में एक सामान्य व्यक्ति के लिए यह समझ पाना बेहद मुश्किल है कि मोदी सरकार का यह कैसा अर्थशास्त्र है जो देश लुटवाने और बेरोजगारी फैलाने को पिछली सरकार को भी मात देने में जुटा हुआ है। इससे देश के लाखों किसानों की तरह न जाने कितने बेरोजगार श्रमिक अकाल मौत को गले लगाने को विवश होंगे या तमाम तरह के रोग व बीमारियों का शिकार होकर मारे जायेंगे। कहीं सरकार का यह जन-विरोधी निर्णय सूनामी ही साबित न हो।

श्यामसिंह रावत
वरिष्ठ पत्रकार
[email protected]

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