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राजनीति-सरकार

कहां खो गई सिद्धांतों और विचारों की राजनीति

रिजवान चंचलमेरे मन मस्तिष्क में अक्सर यह बात कोलाहल करती रहती है कि ग्राम पंचायत चुनाव हों या विधानसभा अथवा संसदीय चुनाव,  आखिर क्यों इन पदों तक पहुंचने का रास्ता उन नागरिकों के लिये बंद सा है, जो पूरी ईमानदारी, निष्ठा व लगन के साथ गांव क्षेत्र प्रदेश, राष्ट्र व समाज के लिए सिद्धान्तों और विचारों की राजनीति करने का जज्बा रखते हैं? मन मस्तिष्क मे कोलाहल करते इस सवाल के जवाब के लिए जब मैं अपने साथी पत्रकारों, साहित्यकारों एवं सामाजिक गतिविधियों से जुड़े ईष्‍ट-मित्रों से प्रतिक्रिया जाने की कोशिश करता हूं तो लब्‍बोलुआव यही निकलता है कि वर्तमान में पूंजी इस कदर प्रभावी हो चुकी है कि अब पूरी की पूरी राजनीति इसी के ही इर्द-गिर्द घूम रही है। और तो और ग्राम पंचायतों के हो रहे चुनाव में ही इसका खुला नजारा देखने को मिल रहा है। गांव के गांव पोस्टरों से पटे हैं, कहीं-कहीं तो प्रधानी का चुनाव विधायकी और संसदीय चुनाव को भी पीछे छोड़ता नजर आ रहा है। प्रत्याशी लाखों का वारा-न्यारा कर रहे हैं, दर्जनों पेटी शराब हर रोज समर्थकों के बीच बांटी जा रही है।

रिजवान चंचल

रिजवान चंचलमेरे मन मस्तिष्क में अक्सर यह बात कोलाहल करती रहती है कि ग्राम पंचायत चुनाव हों या विधानसभा अथवा संसदीय चुनाव,  आखिर क्यों इन पदों तक पहुंचने का रास्ता उन नागरिकों के लिये बंद सा है, जो पूरी ईमानदारी, निष्ठा व लगन के साथ गांव क्षेत्र प्रदेश, राष्ट्र व समाज के लिए सिद्धान्तों और विचारों की राजनीति करने का जज्बा रखते हैं? मन मस्तिष्क मे कोलाहल करते इस सवाल के जवाब के लिए जब मैं अपने साथी पत्रकारों, साहित्यकारों एवं सामाजिक गतिविधियों से जुड़े ईष्‍ट-मित्रों से प्रतिक्रिया जाने की कोशिश करता हूं तो लब्‍बोलुआव यही निकलता है कि वर्तमान में पूंजी इस कदर प्रभावी हो चुकी है कि अब पूरी की पूरी राजनीति इसी के ही इर्द-गिर्द घूम रही है। और तो और ग्राम पंचायतों के हो रहे चुनाव में ही इसका खुला नजारा देखने को मिल रहा है। गांव के गांव पोस्टरों से पटे हैं, कहीं-कहीं तो प्रधानी का चुनाव विधायकी और संसदीय चुनाव को भी पीछे छोड़ता नजर आ रहा है। प्रत्याशी लाखों का वारा-न्यारा कर रहे हैं, दर्जनों पेटी शराब हर रोज समर्थकों के बीच बांटी जा रही है।

ऐसा करके ये खुले आम चुनाव आचार संहिता की धज्जियां तो उड़ा ही रहे हैं, पैसे के बल पर ये प्रशासनिक सहयोग भी ले रहे हैं। कई जगह प्रशासनिक पक्षपात व भ्रष्टाचार के चलते कुछ धनबली व बाहुबली निर्विरोध बाजी मारने में भी सफल रहे हैं। जबकि कुछ मामले उच्च न्यायालय तक पहुंच गये हैं। रायबरेली जनपद के खींरों ब्लाक में तो बताया जाता है कि एक निर्वाचन अधिकारी ने सुविधा शुल्क प्राप्त कर दुसरे प्रत्याशी का नामांकन पत्र ही रद्द कर दिया।  उसे यह भी याद नहीं रहा कि उसने प्रत्याशी को लाल रसीद पहले ही दे दी है, यह मामला भी कोर्ट तक जा पहुचा है। इसी तरह गेगोसो ग्रामसभा चुनाव में सरेनी पुलिस चौकी में तैनात एक दरोगा द्वारा नशे में धुत हो एक प्रत्याशी का जमकर चुनाव प्रचार करने व अन्य प्रत्याशियों के समर्थकों के साथ गाली-गलौज करने का मामला भी काफी चर्चा में है। कुल मिलाकर ऐसी राजनीति के चलते ग्राम-स्वराज की कल्पना भी बेमानी ही होगी। चुनाव आयोग की तमाम कवायदों के बाद भी न ही चुनावों में काले धन के इस्तेमाल पर काबू पाया जा सका है और न ही अपराधियों को राजनीति में घुसने से। अलबत्ता स्थित यह है कि अब तो अपराधियों का राजनीतिकरण हो गया है। ऐसी राजनीतिक व्यवस्था को बदलने के लिए जरूरत है एक बड़े मुहिम की, जिससे शोषण मुक्त जनोन्मुखी तंत्र की स्थापना हो सके, पर इसके लिए किसी न किसी को तो आगे आना ही होगा।

काफी हद तक वर्तमान जनप्रतिनिधियों, माननीयों के क्रियाकलापों को देख यह सिद्ध भी होता नजर आता है। इनके द्वारा विधान सभाओं व संसद में होने वाली बहसें निरर्थक, सारहीन, अबौद्धिक और उबाऊ हो चलीं हैं। चारित्रिक पतन तो इस हद तक हो चुका है कि इन्होंने संसद व विधानसभा सदनों की मर्यादा को भी तार-तार कर डाला है। कभी ये सदन के अन्दर ही लात-जूता पर उतारू हो जाते हैं, तो कभी संसद में खरीद-फरोख्त का खेल करोड़ों की अटैची दिखाकर शुरू कर देते हैं, जिसे देश ही नही बल्कि सारा विश्व देखता है। स्थिति यह है कि सांसद विधायक अपने को पांच वर्षों का बादशाह मान एशो-आराम में इस तरह लिप्त हो जाते हैं कि इन्हें  वातानुकूलित कारों व कमरों से बाहर निकलते ही पसीना आने लगता है। फिर देश के मौसम को ये चमड़ी के अनुकूल नहीं पाते। इनके मानदेय, भत्ते, पेंशन व निधि के मामले तो निर्लज्‍जता और अपराध की श्रेणी लांघ जाते हैं। हाल ही में सारे विश्व व देश ने देखा वेतन वृद्धि को लेकर संसद में इन्होंने हंगामा ही नहीं काटा बल्कि कुछ घंटों के लिए इन्होंने ‘‘समानान्तर’’ सरकार भी बना लिया, जैसे यह सदन ना हुआ गुड्डा-गुड़ियों का खेल हो गया। इस तरह का तमाशा करने में इन्हें लज्जा भी नहीं आई और ये मुस्कुराते ही दिखे,  कारण कि इन्हें पहले से ही अनाप-शनाप सुविधायें और ढेर सारे पैसों की सुविधा प्राप्त है, जिसका वे पूरे समय तक उपयोग करने से चूकना नहीं चाहते। आज लगभग सभी राजनीति दलों का चरित्र एक जैसा हो गया है। अपनी सुख सुविधाओं के लिए इनमें एकजुटता बनाये रखने में देर नहीं लगती और ये वेतन व भत्तों की बढ़ोत्तरी चन्द घंटों में ही सर्वसम्मति से पारित कर लेते हैं, ऐसे मामलों में अद्भुत एकता व सहमति देखने लायक होती है. कहीं कोई विरोध नहीं। गरीबी मिटाने, देश को महाशक्ति बनाने तथा सर्वहारा की पैरोकारी का दम भरने वाले नेताओं के इस पतन को हम बार-बार हर बार इन्हीं आंखों से देखते आ रहे हैं।

जरा विचार करें, संसद लोकतंत्र की सर्वोच्च और सर्वाधिक शक्तिशाली संस्था है, इसलिए इसके सदस्यों के चरित्र, आचरण कार्य व्यवहार का असर दूसरी संस्थाओं पर पड़ना स्वाभाविक है, लेकिन कितने दुर्भाग्य की बात है कि माननीयों ने आजादी के छह दशक गुजर जाने के उपरान्त अभी तक ऐसी किसी मर्यादा व कार्य-संस्कृति का निर्माण नहीं किया, जो अनुकरणीय हो। अब तो स्थिति यह है कि ये सवाल करने का भी पैसा ले रहे हैं। कबूतरबाजी का खेल खेल रहे हैं। सरकार के पक्ष और विपक्ष में वोट देने के लिए कौवेबाजी कर रहे हैं। विचारणीय तो यह है कि पेट की आग ‘‘क्षुधातृप्ति’’ के लिए जहां बच्चे बंधुआ मजदूरी करने को विवश हो रहे हों और ममता बच्चों को पालने के लिए जिस्म तो जिस्म कोख तक बेचने को मजबूर हो, वहीं लाखों टन अनाज यूं ही सड़ जाये, जिस कागज पर न्याय अंकित होता हो उसमें भी तेलगी काण्ड हो जाये! चारा, खाद, धान, चीनी, गेहूं, चावल, अस्त्र-शस्त्र कुछ भी घोटालों से वंचित न रह पाये। भ्रष्ट नेता व अफसर मौज मनायें, ये दोनों सांठ-गांठ कर तिजोरी भरें, गरीब भूखों मरे, आखिर क्यों?

हम ऐसे भ्रष्ट नेता का चुनाव ही क्यों करें और यदि करते हैं तो निश्चित तौर पर हम आप इन भ्रष्टों से कहीं अधिक दोषी हैं। भूख से मरने वालों की असामायिक मौत के जिम्मेदार हम भी हैं, जिस्म व कोख बेचने वाली मजबूर ममता की हाय हम पर भी लगेगी। जरा गौर करें आजादी के बाद से अब तक नेताओं द्वारा यही राग अलापा जाता रहा हे कि हम गरीबी मिटायेंगे, भ्रष्टाचार को जड़ से खत्म करेंगे, लेकिन आजादी के 63 वर्ष गुजर गये गरीबी तो नहीं मिट पाई अलबत्ता गरीब जरूर मिटते रहे। भ्रष्टाचार की जड़ें मजबूत होती रहीं। स्थिति यह है कि मंहगाई का बोलबाला, आम आदमी का निकला जा रहा है दिवाला, फिर भी हम आप यूं चुप हैं, आखिर हम और आप कब तक अपने मुंह में ताला लगाये रखेंगे। वर्तमान परिवेश का दृश्य किसी से छिपा भी नहीं है। आलम यह है कि गलत-सही, उचित-अनुचित दोनों कार्यों में घूस ‘सुविधा शुल्क’ का चलन है। इसके बगैर न तो नेता जी द्वारा कोई सिफारिश संभव है  और न ही बाबू द्वारा फाइल को आगे बढ़ाना।

सर्वविदित है कल तक नौटंकी में नृत्य करने वाला, साइकिल की दूकान करने ताला, जनता जनार्दन द्वारा नेता बनाये जाने पर भ्रष्टाचार खत्म करने का वादा तो करता है, किन्तु सत्ता पाते ही भ्रष्टाचार में इस तरह लिप्त हो जाता है कि चन्द महीनों में ही वह अकूत धन व सम्पदा का मालिक बन बैठता है। और तो और अब तो सत्ता हथियाने के हथकण्डे इस हद तक अपनाये जाने लगे हैं कि भ्रष्ट तरीके से अर्जित अकूत धन से विधायकों व सांसदों की भी खरीद फरोख्त की जाने लगी है। नेताओं की इस प्रबृति का फायदा अफसरशाहों ने भी जमकर उठाना शुरू कर दिया है। काली कमाई, घूसखोरी इनकी भी दिनचर्या बन चुकी है। दोनों में बेहतर तालमेल भी है। ये भी मनचाहा पद सत्ताधारियों को थैली-अटैची ‘‘भ्रष्ट तरीके से कमाये गये धन की पोटली’’ भेंटकर प्राप्त कर लेते हैं। ये नेता गोपनीय ढंग से थैली व अटैची लेते ही नहीं बल्कि कभी-कभी विधायकों सांसदों को अपने पक्ष में कर सत्ता हथियाने व सरकार बचाये रखने के उद्देश्य से सदन तक में घूस के करोड़ों रूपये लेकर चले जाते हैं। संसद भवन तक घूसखोरी के पैसों का प्रदर्शन करने वालों इन नेताओं की करतूतों का लाइव प्रसारण हुआ, जिसे देश ही नही बल्कि सारे विश्व ने देखा। बावजूद इसके इसके शर्म नही आई और हम आप भी इनकी इन काली करतूतों पर अपना कुछ क्षण निकाल कर इनको धिक्कारने का एक पोस्ट कार्ड भी नहीं लिख पाते। यानी हम आप भी सबकुछ देखते रहते हैं, मौन नही तोड़ते इसीलिए तो ये नेता भी भ्रष्ट कारगुजारी अपनाना नही छोड़ते।

लेखक रिजवान चंचल रेड फाइल के संपादक और जनजागरण मीडिया मंच के महासचिव हैं.

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