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राजनीति-सरकार

कांग्रेस की विध्वंसक राजनीति

कांग्रेस शासित राजस्थान पुलिस के आतंकवाद निरोधी दस्ते (एटीएस) ने अजमेर धमाके की जाँच पूर्ण किए बिना ही इन्द्रेश कुमार का नाम उछाल दिया है। इन्द्रेश कुमार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की अखिल भारतीय कार्यकारिणी के सदस्य हैं। उनको संघ के निष्ठावान व समर्पित कार्यकर्ताओं में गिना जाता है। संघ के हजारों कार्यकर्ता कार्य की दृष्टि से उनसे प्रेरणा लेते हैं। यह भी ध्यान देने वाली बात है कि श्री कुमार पिछले कई वर्षों से “राष्ट्रवादी मुस्लिम मंच” के बैनर तले देश के राष्ट्रवादी मुसलमानों को संगठित करने के कार्य में जुटे हुए हैं। इस कार्य में उनको काफी सफलता भी मिली है। उनके भगीरथ प्रयास से हजारों मुसलमान इस संगठन से जुड़ चुके हैं। उनके इस प्रयास के कारण ही भारत के अधिकांश मुसलमानों की राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रति धारणा सकारात्मक हुई है। राष्ट्रवादी मुसलमानों को एक मंच पर लाने के लिए संघ का यह कार्य अब तक का सबसे अनोखा कार्य है, इसलिए कांग्रेस पार्टी को कैसे पच सकता है। इसी कारण श्री कुमार पिछले कई वर्षों से कांग्रेस की नजरों में चढ़े हुए हैं। कांग्रेस उनको अपने वोटबैंक के लिए प्रमुख खतरा भी मानने लगी है। इसलिए विस्फोट के रूप में यह सारा वितंडावाद खड़ा किया जा रहा है। ताकि ऐन-केन-प्रकारेण श्री इन्द्रेश कुमार को लपेटे में लेकर उनके द्वारा चलाया जा रहे राष्ट्रवादी मुस्लिमों को संगठित करने के कार्य को प्रभावित करते हुए संघ को बदनाम किया जा सके।

कांग्रेस शासित राजस्थान पुलिस के आतंकवाद निरोधी दस्ते (एटीएस) ने अजमेर धमाके की जाँच पूर्ण किए बिना ही इन्द्रेश कुमार का नाम उछाल दिया है। इन्द्रेश कुमार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की अखिल भारतीय कार्यकारिणी के सदस्य हैं। उनको संघ के निष्ठावान व समर्पित कार्यकर्ताओं में गिना जाता है। संघ के हजारों कार्यकर्ता कार्य की दृष्टि से उनसे प्रेरणा लेते हैं। यह भी ध्यान देने वाली बात है कि श्री कुमार पिछले कई वर्षों से “राष्ट्रवादी मुस्लिम मंच” के बैनर तले देश के राष्ट्रवादी मुसलमानों को संगठित करने के कार्य में जुटे हुए हैं। इस कार्य में उनको काफी सफलता भी मिली है। उनके भगीरथ प्रयास से हजारों मुसलमान इस संगठन से जुड़ चुके हैं। उनके इस प्रयास के कारण ही भारत के अधिकांश मुसलमानों की राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रति धारणा सकारात्मक हुई है। राष्ट्रवादी मुसलमानों को एक मंच पर लाने के लिए संघ का यह कार्य अब तक का सबसे अनोखा कार्य है, इसलिए कांग्रेस पार्टी को कैसे पच सकता है। इसी कारण श्री कुमार पिछले कई वर्षों से कांग्रेस की नजरों में चढ़े हुए हैं। कांग्रेस उनको अपने वोटबैंक के लिए प्रमुख खतरा भी मानने लगी है। इसलिए विस्फोट के रूप में यह सारा वितंडावाद खड़ा किया जा रहा है। ताकि ऐन-केन-प्रकारेण श्री इन्द्रेश कुमार को लपेटे में लेकर उनके द्वारा चलाया जा रहे राष्ट्रवादी मुस्लिमों को संगठित करने के कार्य को प्रभावित करते हुए संघ को बदनाम किया जा सके।

उल्लेखनीय है कि राजस्थान के अजमेर स्थित ख्वाजा मोइनुद्दीन चिस्ती की विश्व प्रसिद्ध दरगाह परिसर में 11 अक्टूबर 2007 आतंकवादी धमाके हुए थे। इन धमाकों में तीन लोगों की मौत हो गई थी और 15 घायल हुए थे। इस मामले की जाँच एटीएस कर रही है। एटीएस ने 22 अक्टूबर को मामले से संबंधित 806 पृष्ठों का आरोप पत्र दायर किया है। इसमें विस्तार से धमाकों की साजिश का खुलासा करने का प्रयास किया गया है। इसमें 133 गवाहों के बयान दर्ज किए गए हैं। इस आरोप पत्र में छह आरोपियों के नाम हैं। इनमें से तीन- देवेंद्र गुप्ता, चंद्रशेखर लवे और लोकेश शर्मा की अप्रैल में गिरफ्तारी हुई थी। ये तीनों पूछताछ के लिए अभी न्यायिक हिरासत में हैं। शेष तीन आरोपियों में से दो- संदीप डांगे व रामजी कलसांगरे को फरार बताया जा रहा है और जबकि एक आरोपी सुनील जोशी की बहुत पहले ही मध्य प्रदेश में हत्या हो चुकी है।

आरोप पत्र में इन्द्रेश कुमार का भी नाम है, लेकिन उनको आरोपी नहीं बनाया गया है। इसका केवल एक ही कारण है कि इन्द्रेश कुमार के खिलाफ एटीएस को अभी तक कोई ठोस सबूत नहीं मिल सका है। हालांकि जाँच अभी चल रही है और एटीएस यह पता लगाने की कोशिश कर रही है कि इन्द्रेश कुमार का इस मामले से कोई संबंध है भी, या नहीं। आरोप पत्र के अनुसार, बम विस्फोट की साजिश जयपुर में रची गई है। आरोप पत्र में यह भी कहा गया है कि हिंदुत्वनिष्ठ संगठनों ने बदला लेने की नीयत से अजमेर, हैदराबाद और महाराष्ट्र के मालेगाँव को धमाकों के लिए चुना।

अब प्रश्न यह उठता है कि कांग्रेस शासित राज्य के एटीएस द्वारा लगाए गए ये आरोप कितने सही हैं और कितने गलत? इसको जानने के लिए मामले की जाँच पूरी हो जाने और सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय आने तक धैर्यपूर्वक प्रतीक्षा करना होगा। तभी दूध का दूध और पानी का पानी हो सकेगा। लेकिन विडंबना यह है कि मामले की जाँच पूरी होने और आखिरी अदालत से फैसला आने के पूर्व ही कांग्रेस सहित कुछ कथित सेकुलरवादियों द्वारा आरोपियों को दोषी के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। यहाँ तक कि जिसका नाम आरोपियों की सूची में नहीं है, उसको भी दोषी मान लिया गया है।

हालांकि, कांग्रेस द्वारा सरकारी जाँच एजेंसियों का अपने हित में दुरुपयोग करने की बात कोई नया नहीं है। आजादी के बाद से ही वह अपने राजनीतिक विरोधियों को ठिकाने लगाने के लिए जाँच एजेंसियों का दुरुपयोग करती रही है। वह एजेंसियों के दुरुपयोग के मामले में सिद्धहस्त हो चुकी है। इस मामले में उसके जैसा और कोई दूसरा नहीं है। ये भी किसी से छिपा हुआ नहीं है कि गुजरात में सोहराबुद्दीन कथित फर्जी मुठभेड़ मामले में सीबीआई ‘कांग्रेस ब्यूरो ऑफ इनवेस्टीगेशन’ की तरह कार्य कर रही है। अभी हाल ही में सम्पन्न निकाय चुनावों में जनता ने कांग्रेस को भारी बहुमत से हराकर उसको उसके किए की सजा सुना दी है।

दरअसल, अजमेर विस्फोट मामले में यह अधूरा आरोप पत्र जानबूझकर बिहार चुनावों के वक्त दायर करवाया गया है। ताकि हिंदुत्वनिष्ठ संगठनों को बदनाम करके इसका तत्काल चुनावी लाभ लिया जा सके। बिहार में कांग्रेस की हालत खस्ता है। चुनाव जीतने का उसके पास और कोई दूसरा चारा नहीं है। राहुल गाँधी का सारा करिश्मा असफल साबित हो रहा है। वास्तव में कांग्रेस के पास देशहित में कोई मुद्दा नहीं बचा है। इसीलिए वह केंद्र द्वारा विभिन्न योजनाओं में दिए गए धन का हिसाब मांग रही है। चुनाव के पहले उसको केंद्र द्वारा दिए गए धन की चिंता नहीं थी। वह बिहार के संदर्भ में अभी तक सोई हुई थी और अचानक चुनाव में नींद खुली है।

आरोप पत्र दायर करवाने का एक और कारण है। वह है संसद का शीतकालीन सत्र, जो नवंबर मास में प्रारम्भ हो रहा है। इसके हंगामेदार रहने की प्रबल संभावना है। क्योंकि ‘भ्रष्टमंडल’ खेलों में कथित भ्रष्टाचार के कारण पूरी कांग्रेस पार्टी की साँस अटकी हुई हैं। वह अपने दामन को उजला रखने की जवाबदेही में प्रथम दृष्टया ही फंसती हुई नजर आ रही है। इन परिस्थितियों में वह विपक्षी दलों को विषयों से भटकाने के लिए पूरे जी-जान से लग गई है। भाजपा नेता सुधांशु मित्तल के यहाँ छापेमारी की घटना उसके इसी अभियान का हिस्सा है। जबकि सत्यता यह है कि मित्तल की कंपनी ने ‘भ्रष्टमंडल’ खेलों की तैयारियों में मात्र 29 लाख रूपए का ही कारोबार किया है।

दूसरा पहलू यह है कि कांग्रेस अयोध्या फैसले का कोई राजनीतिक लाभ नहीं उठा सकी है। फैसले के बाद से ही वह बैकफुट पर नजर आ रही थी। उसने हाथ-पाँव मारने की बहुत कोशिश की, लेकिन मामला परवान नहीं चढ़ सका। इसलिए पार्टी के महासचिव राहुल गाँधी ने अल्पसंख्यक वोटों को साधने के लिए प्रतिबंधित आतंकी संगठन सिमी की तुलना देशभक्त राष्ट्रवादी संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से कर डाली। हालांकि, उनके बयान का देश भर में काफी विरोध हुआ और करीब-करीब सभी बुद्धिजीवियों ने उनको अपरिपक्व बताते हुए उनके बयान को अनुचित नहीं माना।

राहुल के अलावा कांग्रेस के एक दूसरे राष्ट्रीय महासचिव हैं दिग्विजय सिंह जी, जो विवादित बयान देने के लिए ही प्रसिद्ध हैं। वह किसी भी मामले को विवादित बनाकर ही बयान देते हैं। उनकी वाणी में गंभीरता नाम की कोई चीज नहीं होती है। ऐसा प्रतीत होता है पार्टी ने केवल विवादित बयान देने के लिए ही उनको राष्ट्रीय महासचिव का ओहदा थमाया है। हालांकि, कांग्रेस बहुत पहले से ही संघ को बदनाम करने के लिए भूमिका बनाने में जुट गई थी। भगवा व हिंदू आतंकवाद शब्दों का प्रयोग और संघ से सिमी की तुलना, उसके इसी अभियान का हिस्सा था। कांग्रेस का यह सारा अभियान उसको घोर साम्प्रदायिक पार्टी सिद्ध करने के लिए पर्याप्त है। क्योंकि सत्ता में ऐन-केन-प्रकारेण बने रहने के लिए उसका जैसा कार्य-व्यवहार है, उसके लिए कोई दूसरा विशेषण उपयुक्त नहीं होगा।

लेखक पवन कुमार अरविंद “विश्व हिंदू वॉयस” न्यूज वेब-पोर्टल से जुड़े हुए हैं.

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