लोकसभा चुनाव के दौरान मध्य प्रदेश में कांग्रेस और भाजपा के बीच ही मुकाबला होने के आसार हैं। बसपा सहित क्षेत्रीय
पार्टियां भी लोकसभा में पहुंचने के लिए अपनी तरफ से पूरा जोर लगाएंगी, लेकिन जिस तरह से हाल ही में हुए पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव में मतदाताओं ने इन छोटे दलों को नकार कर स्पष्ट रूप से राष्ट्रीय दलों पर अपना भरोसा जताया, यही स्थिति लोकसभा चुनावों में भी रहने की संभावना है। मीडिया भले ही राग अलापे कि लोकसभा चुनाव में क्षेत्रीय दल अपनी पकड़ मजबूत बनाएंगे, लेकिन कम से कम मध्य प्रदेश के राजनीतिक परिदृश्य में तो कहीं भी ऐसी संभावना बनती दिखाई नहीं देती है। इस प्रदेश में छोटे दलों के नेताओं को बात समझ में आने लगी है कि अपना अस्तित्व बनाए रखने के लिए बड़े दल के साथ गठबंधन करना मजबूरी है। धुर विरोधी भारतीय जनता पार्टी और समाजवादी पार्टी में आपस में तालमेल की खबरें आना इसका प्रमाण है।
मौजूदा लोकसभा में मध्य प्रदेश के कुल 29 सांसदों में से भाजपा के खाते में 21 सांसद हैं, जबकि कांग्रेस के केवल 8 सांसद हैं। वर्ष 2003 में हुए विधानसभा चुनाव परिणामों से उत्साहित होकर ही तब केंद्र में बैठे राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) ने फिर से सत्ता पाने का ख्वाब संजोकर समय से पहले ही लोकसभा चुनाव करवा लिए थे। उन चुनावों में भले ही मध्य प्रदेश सहित कुछ राज्यों में भाजपा को अधिक सीटें मिलीं, लेकिन वह पैरों पर कुल्हाड़ी मारने के समान ही रहा था। जिन विधानसभा चुनावों के परिणामों से प्रेरित होकर राजग की तत्कालीन सरकार ने लोकसभा चुनाव वक्त से पहले करवाने का निर्णय लिया था, वह परिणाम वास्तव में फीलगुड के चलते नहीं बल्कि एंटी-इनकम्बैंसी फैक्टर की वजह से आया था।
उस वक्त राजग के कुछ समझदार नेताओं ने समय पर ही चुनाव करवाने की सुझाव दिया था, लेकिन तब राजग में सर्वेसर्वा बने नेताओं ने ‘भारत उदय’ का ऐसा राग अलापा कि चुनाव करवा ही दिया। राजग के ‘भारत उदय’ का नारा लोगों ने सिरे से नकार दिया था, लेकिन लगता है कांग्रेस उससे कोई सबक लेना ही नहीं चाहती। कांग्रेस भी राजग की तर्ज पर `भारत निर्माण´ का नारा लगा रही है। वह भी तब जबकि महंगाई के कारण लोगों का जीना दूभर हुआ जा रहा है। कांग्रेस मुद्रास्फीति की दर 4 फीसदी तक नियंत्रित कर मान बैठी है कि महंगाई कम हो गई है, भले ही आम आदमी के लिए रोजमर्रा (मसलन शक्कर, दालें आदि) की जरूरत की चीजें 13 प्रतिशत तक पहुंच चुकी मुद्रास्फीति की दर के समय से भी महंगी मिलने लगें। पर सरकार तो आपनी पीठ थपथपाने से पीछे नहीं रहना चाह रही है। लगे हाथ सरकार इस बात को अपने तरीके से प्रचारित करने में कोई कसर नहीं छोड़ रही है कि देश के आर्थिक विकास की दर 7 प्रतिशत तक पहुंच गई है। आर्थिक विकास की दर को आम आदमी की खुशहाली से जोड़ कर देखने की आदी हो चुकी सरकार यह मान बैठी है कि देश का हर व्यक्ति अब अमीर की श्रेणी में शुमार हो गया है।
जहां तक मुद्दों की बात है तो घूम-फिरकर मुद्दे तो वे ही रहेंगे, मसलन आतंकवाद और महंगाई, लेकिन इन्हें भुनाने पर ही सारा दरोमदार रहेगा। प्रदेश में बिजली का मुद्दा सबसे प्रभावी हो सकता है। मध्य प्रदेश में बिजली का मुद्दा अपने आप में किसी की भी सरकार गिराने और बनाने का माद्दा रखता है। पांच साल पहले इसी मुद्दे के दम पर भाजपा की तत्कालीन नेत्री उमा भारती ने तब पिछले 10 सालों से शासन कर रहे कांग्रेस के मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह को करारी शिकस्त देकर राज्य में भाजपा की पूर्ण बहुमत के साथ सरकार बनाई थी। यह बात अलग है कि सत्ता में आने के बाद बिजली के मामले में कोई सुधार नहीं हो पाया। शायद यही कारण है कि अब कांग्रेस अपनी तरफ से यह कोशिश करती दिख रही है कि भले ही भाजपा ने यहां से विधानसभा में फिर से सत्ता प्राप्त कर ली हो, पर बिजली के मुद्दे पर लोगों की नाराजगी उसे लोकसभा चुनावों में झेलनी पड़ेगी और उसको पिछली बार यहां से मिली सीटों की संख्या में कमी का सामना करना पडे़गा। कांग्रेस की यह कोशिश फलीभूत हो सकती है, बशर्ते वह इस मुद्दे को यहां वोट में तब्दील कर सके। यहां अब बिजली की मांग और पूर्ति में अंतर गहराता जा रहा है। हालत यह है कि गांवों के साथ-साथ अब जिला मुख्यालय और संभाग मुख्यालय पर भी बिजली कटौती की जा रही है। भाजपा इसके लिए कांग्रेस को दोष दे रही है कि उसने राज्य को दिए जाने वाले कोयले की मात्रा में इसलिए कटौती कर दी ताकि बिजली नहीं मिलने को मुद्दा बनाकर कांग्रेस लोकसभा में अधिक सीटें जीत सके। लेकिन कांग्रेस के साथ दिक्कत यह रहती आई है कि वह नेताओं की पार्टी है, जबकि लोगों तक अपनी बात और नीतियां पहुंचाने के लिए कार्यकर्ताओं की जरूरत होती है, जिनका उसके पास हमेशा से टोटा रहता आया है।
मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान संभवत: कांग्रेस की इस रणनीति को भांप गए हैं, इसलिए लोकसभा चुनावों को ध्यान में रखते हुए उन्होंने कांग्रेस पर बढ़त बनाने के उद्देश्य से यह घोषणा कर दी है कि वे कांग्रेस की दोगली नीति से लोगों को अवगत कराने के लिए जल्द ही सारणी से कोयले के लिए सत्याग्रह शुरू करेंगे। मुख्यमंत्री का मानना है कि उनके इस कदम से लोगों को यह मालूम हो सकेगा कि राज्य के लोगों को कम बिजली मिलने की जिम्मेदार केंद्र में बैठी कांग्रेस की सरकार है, क्योंकि उसने इस साल से प्रदेश को मिलने वाले कोयले की मात्रा में कमी कर दी है। केंद्र सरकार के कोयला मंत्रालय द्वारा बनाई गई इस नीति के कारण अब यदि किसी राज्य को अधिक मात्रा में कोयला चाहिए तो इसके लिए उसे विदेश से किए जाने वाले महंगे आयात पर निर्भर रहना होगा। यदि मुख्यमंत्री प्रदेश की जनता तक यह संदेश पहुंचा पाने में कामयाब हो जाते हैं तो इस बात की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता है कि एक बार फिर से प्रदेश में शायद ही कांग्रेस दहाई के अंक तक अपनी सीटें ले जा पाए।
चूंकि केंद्र में कांग्रेस की सरकार ही बैठी है, इसलिए इस बात की संभावना कम नजर आती है कि वह यहां महंगाई को मुद्दा बनाने की कोशिश करे, क्योंकि उसे मालूम है कि महंगाई की बात करते ही भाजपा उस पर आक्रामक पटलवार कर देगी। भाजपा की तरफ से जरूर महंगाई को प्रमुख मुद्दे के रूप में लाया जा सकता है, लेकिन लगता नहीं है कि भाजपा इसे प्रमुख मुद्दा बनाने की कोशिश करेगी। ऐसा इसलिए माना जा रहा है कि उसने विधानसभा चुनाव के दौरान भी इसे उछाला था, लेकिन उसका पूरा चुनाव अभियान विकास पर केंद्रित रहा था, भले ही लोगों ने वोट महंगाई से त्रस्त होकर भाजपा को दिया हो, लेकिन वह आज भी यही मान रही है कि उसने विकास के मुद्दे पर ही मध्य प्रदेश में विधानसभा चुनाव जीता है। जबसे भाजपा ने सत्ता का स्वाद चखा है, उसे आम आदमी की परेशानियों से कोई मतलब नहीं सा रह गया है, क्योंकि उसमें भी पांच सितारा संस्कृति का समावेश हो चुका है।
कांग्रेस आतंकवाद का मुद्दा इन लोकसभा चुनावों में जोर-शोर से उठा सकती है, क्योंकि पिछले वर्ष देश के विभिन्न हिस्सों के अलावा मुंबई सहित ताज होटल में हुए आतंकवादी हमले की याद अभी ताजा ही है। कांग्रेस की चाल-ढाल से लगता नहीं कि वह इस पर ज्यादा आक्रामक हो पाएगी। इन हमलों के बाद उसने पाकिस्तान के साथ जिस तरह से मीठी झिड़की और उलाहने की नीति अख्तियार कर रखी है, उससे जनता में छवि अच्छी नहीं बनी है। कांग्रेस में आक्रामकता की कमी ही उसके पतन का कारण बनती जा रही। भाजपा अपनी तरफ से कोशिश करेगी कि आतंकवाद को चुनावी मुद्दे के रूप में उठाया जाए। पर उसे यह मालूम है कि हाल ही में हुए विधानसभा चुनावों के दौरान मुंबई में आतंकवादी घटना हुई थी, लेकिन जिन परिणामों की उसने उम्मीद लगा रखी थी, उससे वह दूर ही रही। इन लोकसभा चुनावों में भाजपा आतंकवाद को मुद्दा सोच-समझकर ही बनाना चाहेगी।
लेखक कुलदीप शर्मा इंदौर के पत्रकार हैं। उनसे संपर्क [email protected] पर किया जा सकता है।

