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कार्टून से किसी को मिर्ची लगी तो हम क्‍या करें!

: जिस तरह कांग्रेसी कार्टून का विरोध कर रहे हैं, वैसा विरोध महंगाई का करना चाहिए था : मनमोहन सिंह जैसा हृदयहीन प्रधानमंत्री अब तक नहीं हुआ : एक फिल्मी गीत किसी समय खूब चर्चित हुआ था ‘तुझको मिर्ची लगी तो मैं क्या करूं.’ इस समय भी एक गीत खूब चर्चा में है. महंगाई को लेकर बनी फिल्म ‘पिपली लाइव’ का यह गीत है – ‘महंगाई डायन खाय जात है.’ इस महंगाई से केंद्र सरकार बिलकुल ही चिंतित नहीं है, ना ही उस पार्टी को इसकी चिंता है जिसकी सरकार केंद्र में है. मगर इस महंगाई को लेकर छत्तीसगढ़ प्रदेश भाजपा की पत्रिका में कवर पर छपे एक कार्टून से बबाल मच गया है. बवाल क्या मचा है, कहिये मिर्च लग गयी है. महंगाई से कांग्रेसियों को मिर्च नहीं लगी मगर इस कार्टून से मिर्च ज़रूर लग गयी. इसलिए कांग्रेसी इसके विरोध में जम कर प्रदर्शन कर रहे हैं.

: जिस तरह कांग्रेसी कार्टून का विरोध कर रहे हैं, वैसा विरोध महंगाई का करना चाहिए था : मनमोहन सिंह जैसा हृदयहीन प्रधानमंत्री अब तक नहीं हुआ : एक फिल्मी गीत किसी समय खूब चर्चित हुआ था ‘तुझको मिर्ची लगी तो मैं क्या करूं.’ इस समय भी एक गीत खूब चर्चा में है. महंगाई को लेकर बनी फिल्म ‘पिपली लाइव’ का यह गीत है – ‘महंगाई डायन खाय जात है.’ इस महंगाई से केंद्र सरकार बिलकुल ही चिंतित नहीं है, ना ही उस पार्टी को इसकी चिंता है जिसकी सरकार केंद्र में है. मगर इस महंगाई को लेकर छत्तीसगढ़ प्रदेश भाजपा की पत्रिका में कवर पर छपे एक कार्टून से बबाल मच गया है. बवाल क्या मचा है, कहिये मिर्च लग गयी है. महंगाई से कांग्रेसियों को मिर्च नहीं लगी मगर इस कार्टून से मिर्च ज़रूर लग गयी. इसलिए कांग्रेसी इसके विरोध में जम कर प्रदर्शन कर रहे हैं.

ऐसी स्थिति में ऐसा कार्टून बनाने वाले और जानलेवा महंगाई से त्रस्त जनता को मेरी यह सलाह है कि वे इस कार्टून का विरोध करने वालों को यह गा कर माकूल जबाब दें ‘तुझे मिर्ची लगी तो मैं क्या करूँ.’ उस कार्टून में जिस महिला का व्यंग्य चित्र है, उसे कांग्रेसी सोनिया गांधी के रूप में मान रहे हैं. उस व्यंग्य चित्र में मनमोहन सिंह और अन्य कई मंत्रियों- नेताओं के भी कार्टून हैं. महिला के व्यंग्य चित्र के बगल में गीत की पंक्ति लिखी है- ‘महंगाई डायन खाय जात है.’ कांग्रेसी इसे सोनिया गांधी का व्यंग्य चित्र मान कर बबाल मचा रहे हैं.

जानलेवा महंगाई ने पूरे देश के गरीब और मध्यम वर्ग के लोगों का जीना हराम कर रखा है फिर भी केंद्र की कांग्रेस नीत सरकार इस पर लगाम लगाने को तैयार नहीं है. कांग्रेसियों को भी इसकी कोई चिंता नहीं है. उन्हें तो सिर्फ सोनिया गांधी की चिंता है. आज यदि सोनिया जी कहें कि मनमोहन सिंह जी आप गद्दी से उतर जाय तो सारे कांग्रेसी उनकी हां में हां मिलाने लगेंगे. यही है कांग्रेस की संस्कृति. मनमोहन जी भी कांग्रेस के ऐसे ही आज्ञाकारियों में से हैं. वे तो आज्ञा का पालन भर कर रहे हैं. हमने बहुत पहले लिखा था कि इस देश में मनमोहन सिंह जैसा हृदयहीन प्रधानमंत्री अब तक नहीं हुआ. जिस प्रधानमंत्री को देश की हकीकत नहीं मालूम वह देश के लोगों का क्या भला करेगा? जिस देश के वित्तमंत्री महंगाई पर अंकुश लगाने के बजाय संसद में इसे जायज ठहराने की कोशिश करते हों, उसने विपक्ष और देश की जनता आखिर क्या उम्मीद करेगी?

संसद के इसी सत्र में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने पूरे देश को यह साफ़-साफ़ बता दिया कि दिसंबर से पहले दाम नहीं घटेंगे. प्रधानमंत्री के इस बयान के बाद अब भी यदि इस सरकार से किसी को कोई उम्मीद है कि यह महंगाई घटाने के उपाय करेगी तो मुझे कुछ नहीं कहना. मुझे ऐसी उम्मीद करने वालों पर तरस ही आयेगी. दरअसल यह महंगाई कांग्रेस सरकार की गलत अर्थनीति की देन है. तभी तो महंगाई रोकने के उपाय के बारे में कुछ कहने की बजाय केन्द्रीय वित्तमंत्री प्रणव मुखर्जी ने लोकसभा में इसे देश के आर्थिक विकास का प्रतीक बताया. जिस सरकार को चंद धन्नासेठों का विकास पूरे देश का विकास नज़र आता हो उस सरकार की अर्थनीति जनविरोधी नहीं है तो और क्या?

विपक्ष ने लोकसभा में महंगाई पर बहस के लिए कामरोको प्रस्ताव पेश किया तो सरकार के अडि़यल रवैये के कारण लोकसभा अध्यक्षा ने प्रस्ताव नामंजूर कर दिया. केंद्र सरकार के इसी रवैये के कारण एक सप्ताह तक संसद की कार्यवाही नहीं चल सकी. इसकी वज़ह से पूरे देश के सामने सरकार की फजीहत होती रही. अंततः प्रणव मुखर्जी ने विपक्ष के कुछ नेताओं को चाय पर बुला कर संसद की कार्यवाही शांतिपूर्ण चलाने का रास्ता निकाला. मगर यह भी देश की जनता और विपक्ष के साथ एक प्रकार से छल साबित हुआ. छल इसलिए साबित हुआ कि प्रणव दा ने बहस के जबाब में महंगाई रोकने के उपाय करने का आश्वासन देने और इसपर चिंता जताने की जगह इसे उचित ठहराने की कोशिश की. उन्होंने जो कुछ कहा उससे यही ध्वनित हुआ कि यह महंगाई देश के आर्थिक विकास का द्योतक है.

प्रणव दा ने कभी की होगी लालटेन की रोशनी में पढ़ाई मगर ताज़ा हकीकत यह है कि इस समय उन्हें गरीबों की जिंदगी की हकीकत का कुछ पता नहीं. भारतीय रिजर्व बैंक भी महंगाई कम करने के नाम पर वही फार्मूले बार-बार अपनाता है जो कब के फेल हो चुके हैं. दरअसल बहुमत के मद में चूर यह केंद्र सरकार मुट्ठी भर अरबपतियों के हित के लिए आर्थिक विकास का जो किताबी खेल खेल रही हैं, यह आम जनता के ऊपर सरासर जल्लादी जुल्म है. यह जले पर नमक छिडकने जैसा है. कोई सरकार इतनी हृदयहीन, संवेदनहीन और आततायी बनकर आम लोगों के जले पर नमक रगड़ने लगे तो आम लोगों के कंठ से दुःख और बेबसी भरे गीत तो फूटेंगे ही, इसलिए कि इस देश में दुःख को भी गाकर व्यक्त करने की परंपरा है.

फिल्म पिपली लाइव का गीत ‘महंगाई डायन खाय जात है’ पूरे देश में इसीलिए बेहद चर्चित हुआ. अकेले इस गीत ने महंगाई के कारक तत्वों की पोल खोल कर रख दी. महंगाई के विरोध में जनता के बीच इस गीत ने ऐसा कमाल किया, जिस प्रभावी ढंग से इस गीत ने भूमिका निभाई. विपक्षी दल भी ऐसी भूमिका नहीं निभा सके. उस कार्टून का विरोध करने वालों के लिए यही नसीहत होगी कि वे महंगाई का विरोध करें. कार्टून का तो काम ही होता है मिर्च लगाना. कांग्रेस सरकार की जैसी करनी है, वैसा ही कार्टून है.

लेखक अनिल विभाकर जनसत्‍ता रायपुर के स्‍थानीय संपादक हैं.

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