
प्रमोद पांडेय
जीवनधर्मी विवेक और जनधर्मी आलोचकीय चेतना के लिए जाने-जाने वाले चंद्रबली जी की पहली पुस्तक 1956 में ‘ लोक दृष्टि और हिन्दी साहित्य’ (आलोचनात्मक निबंधों का संकलन) प्रकाशित हुई। 46 साल बाद दूसरी पुस्तक ‘आलोचना का जनपक्ष’ (2003 ) प्रकाशित हुई। नोबेल पुरस्कार विजेता चिली के विश्वविख्यात कवि पाब्लो नेरुदा (1904-1973) के जन्मशती वर्ष में उनके द्वारा किया गया अनुवाद ‘पाब्लो नेरुदा कविता संचयन’ साहित्य अकादमी से 2004 में छपकर आया। इस अनुवाद का व्यापक स्वागत हुआ। चर्चित आलोचक डा. नामवर सिंह ने लिखा है कि -”ऐसे काव्यात्मक स्तबक के लिये हिन्दी जगत अपने वरिष्ठ जनवादी समालोचक के प्रति कृतज्ञ रहेगा।” पाब्लो नेरुदा के अलावे उन्होंने नाजिम हिकमत, वाल्ट ह्विटमैन, एमिली डिकिन्सन, ब्रेख्त, मायकोव्स्की, राबर्ट फ्रास्ट जैसे विख्यात विशिष्ट कवियों का भी अनुवाद किया है। चर्चित कथाकार काशीनाथ सिंह कहते हैं, ”आलोचना के समानांतर उनका अनुवाद कार्य अद्भुत है और उन्होंने जिनके अनुवाद किये हैं वे एक तरह के कवि नहीं हैं। प्राय: मार्क्सवादी समीक्षक अपाठ्य, दुर्गम, खूसट और सठियाये हुए गद्य लिखते हैं, इससे मास्टर साहब (चंद्रबली जी) की समीक्षा दूर है।”
अपने शुरुआती लेखकीय जीवन से ही वे कवियों की कृतियों एवं विविध काव्य-धाराओं पर लिखते रहे हैं। चंद्रबली सिंह की आलोचकीय दृष्टि को प्रख्यात समालोचक (स्व.) रामविलास शर्मा बखूबी महत्व देते थे। रामविलास शर्मा ने अपनी एक किताब ‘भूतपूर्व आलोचक’ चन्द्रबली सिंह को समर्पित की है। इस समर्पण में स्नेह पूर्वक शिकायत भी है कि चन्द्रबली सिंह अपनी प्रतिभा के कारण कहीं ज्यादा रच सकते थे। यह पीड़ा चन्द्रबली जी को भी है कि आलोचना की उनकी कम से कम बीस किताबें होनी चाहिए थी।
‘भारत-भारती’ के सर्जक राष्टकवि मैथिलीशरण गुप्त (1886-1964) की रचनाओं एवं उनकी काव्य दृष्टि तथा संवेदना को लेकर प्रगतिशील आलोचक अक्सरहां बेहद अनुदार रहे हैं। उन्हें पुनरुत्थानवादी और अंध हिन्दू राष्ट्रवादी के रूप में भी देखा जाता रहा है। चंद्रबली जी अपनी मौलिक दृष्टि से इसे नकारते हैं- गुप्त जी पुनरुत्थानवादी नहीं हैं- उनकी राष्ट्रीयता गांधी युग की राष्ट्रीयता है, जो धार्मिक पुट के बावजूद सांप्रदायिक वैमनस्य से मुक्त है, जिसमें वैष्णव उदारता है और जो देश के साथ-साथ सारी मानवता को प्यार कर सकती है। इस दृष्टि-संपन्नता के कारण ही उनका (चंद्रबली जी) समकालीन आलोचकों में एक अलग स्थान रहा है। रामविलास जी की तरह ही उन्होंने अपनी परंपरा का सावधान मूल्यांकन किया तथा पूरी जिम्मेदारी और दायित्व बोध से साहित्य समग्र में काम किया।
रामविलास शर्मा के निधन के बाद उनकी बरसी पर याद करने के बहाने उनके पूरे अवदान को ही संदेह के घेरे में रखे जाने के ‘आलोचना’ समय में उन्होंने कहा था कि आज रामविलास जी पर चारों ओर से हमले हो रहे हैं। एक तरफ से दिखाया जा रहा है कि उनका सारा लेखन मार्क्सवाद विरोधी रहा है। उनकी नीयत में ही संदेह प्रकट किया गया है। तमाम लोग उन पर लिख रहे हैं और लोग सोच रहे हैं कि चंद्रबली चुप क्यों हैं। मैं जवाब दूंगा। उनका मानना है कि डा. शर्मा की बहुत सी मान्यताओं को हम माने या न मानें लेकिन वे भारत में समाजवादी विचारों के लिए जीवन के अंतिम दिनों तक संघर्ष कर रहे थे। इसके बारे में संदेह व्यक्त नहीं किया जा सकता।
नवजागरण के नेताओं में रामविलास जी का नाम सर्वप्रमुख रहेगा। ऐसा व्यक्ति ‘रेनेसा’ काल में हुआ है कि एक ही व्यक्ति विविध क्षेत्रों में अपने व्यक्तित्व को फैलाया हुआ है। वे केवल (सीमित अर्थों में) साहित्यकार नहीं थे। ऐसा भी नहीं कि वह डा. शर्मा की सभी मान्यताओं से सहमत रहे हों। उन्होंने एक बेहद कड़ा असहमतिपरक-लेख रामविलास शर्मा पर लिखा है। क्योंकि ‘विचारों से कोई समझौता करना मैंने कभी नहीं सीखा।’ इस विचलन के दौर में वे संघर्षशील वैचारिकता के साथ अडिग खड़े हैं। उनका मानना रहा है कि ‘तुलसीदास के जाके प्रिय न राम बैदेही’ की तरह मेरी वैचारिक दृढ़ता और प्रबल होती जा रही है। बाबरी विध्वंस पर उन्होंने कहा था कि स्वयं मनुष्यता ने सारी हार-जीत देखी है। वह कहते हैं कि ‘वर्तमान के यथार्थ का अगर हमने सामना करना नहीं सीखा तो हम भविष्य नहीं बना सकते।’ प्रगतिशील आलोचना के स्थापत्य में उनके अवदान का जिक्र करते हुए वरिष्ठ समीक्षक मुरली मनोहर प्रसाद ने लिखा है कि ‘एक जमाना था, जब रामविलास शर्मा के बाद उन्हीं का नाम लिया जाता था और उस जमाने के लोग आज भी यह बताते हैं कि सृजनात्मक साहित्य के मर्म को पकडऩे और कलात्मक संवेदना की व्याख्या का जैसा औजार उनके पास रहा है वैसा उनके समकालीनों में किसी के पास नहीं रहा है।’ प्रगतिवाद, प्रयोगवाद, नकेनवाद, नई कविता, मुक्तिबोध, नेमीचंद जैन, गिरिजाकुमार माथुर, अज्ञेय, नागार्जुन, त्रिलोचन आदि पर उनकी आलोचनात्मक टिप्पणियां, निबंध और संदर्भ इसकी पुष्टि करते हैं। उनकी राय है कि हमारा काम यह है कि कवियों में जो वजनवादी तत्व देखें उसे हम विकसित करने की कोशिश करें और जो जनविरोधी हैं उनके खिलाफ आवाज उठायें।
उम्र के इस पड़ाव पर भी उनकी चिंताएं, सक्रियाएं उर्वर हैं। ‘प्रेमचन्द की 125वीं जयंती’ के निमित ‘लमही’ वाराणसी में आयोजित मुख्य कार्यक्रम में उन्होंने संगोष्ठी की अध्यक्षता की। 6 नवंबर 2005 को ‘गोदान’ को फिर से पढ़ते हुए अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी (वाराणसी में आयोजित) के उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता की। कुल्हे के ऑपरेशन तथा बीमारी के बावजूद उनकी जीजिविषा अभी आशक्ता में भी बरकरार है। मित्रवत पुत्र स्व. डा. प्रमोद कुमार सिंह बब्बू जी का एकाएक बिछुड़ जाना रचनात्मक सक्रियता से ही सह्य हो पाया। रामविलास जी ने डेढ़ दशक पहले चंद्रबली जी की पत्नी के निधन पर एक पत्र में लिखा भी था कि तुमने निराशा और मृत्यु का मुंह देख लिया है। लेकिन पराजय तुम्हारे लिए नहीं है। डा. शर्मा का पत्र उनकी सृजन क्षमता व्यक्तिगत जीवन के तमाम झंझावतों के बावजूद उसी जीवन दृव्य से सिंचित है जिसमें मानव जीवन की बेहतरी की चिंता है। इसीलिए वह कहते हैं कि लेखक की जिंदगी की पुनर्रचना करनी चाहिए। वाराणसी के विवेकानंद नगर स्थित अपने आवास में शारीरिक लाचारी के बावजूद साहित्य के व्यापक परिपेक्ष्य से जुड़ी चर्चाओं में मशगूल रहते हैं। वे अपने समय के जीवित इतिहास हैं। उनकी जैसी सरलता-सहजता अब दुर्लभ होती जा रही है। काश! इस पुन: रचना से सिक्त उनके अधूरे तथा अप्रकाशित काम पूरे हो जाते तो हिन्दी साहित्य की समृद्धि होती। उनकी सहज आत्मीय व्यक्तित्व और कृतित्व हमारे लिए प्रेरणास्रोत हैं।
लेखक प्रमोद पांडेय पत्रकारिता विषय के शिक्षक हैं.

