चार जून शायद कम लोगों को याद रहे लेकिन कुछ तो चाह कर भी नहीं भूल पाएंगे, जो भारत की राजधानी दिल्ली में रामलीला मैदान में एक साधू के बहकावे में आ टपके थे, किसी के हाथ टूटे किसी के पैर कोई छुप गया तो कोई भाग गया. सत्तामठों को ब्लैक मेल करने की चाहत और राजनीति के पिछले गलियारे से इंट्री कर किंग मेकर बनने की ख्वाइश इस कदर ले डूबेगी इसका अंदाज़ा गेरुआ चोला धारक को बिलकुल नहीं था. रही बात पूरे मामले में मीडिया की भूमिका की तो भ्रष्टाचार की गंगोत्री से फूटे प्रवाह में पत्रकारिता के मानदंड या तो बह गए या किनारे लग गए जो कुछ एक बचे हैं वो इतने हताश निराश और टूट चुके हैं कि उनकी कलम अंगार उगलने के काबिल ही नहीं बची, हिम्मत दीखाने वाले पर या तो दनदनाती गोलियां चलती है या उन्हें इतना प्रताड़ित कर दिया जाता है कि सच लिखने की परिभाषा तक भूल जाता है सच को लिखने के अक्षम्य अपराध में मुंबई के एक पत्रकार की हत्या और लखनऊ के दो संवाददाताओं पर हमला जल्द ही हुआ है.
कालाधन हमारे देश के लोगों के खून पसीने की कमाई है जिसे वापस लाने के लिए अकेले रामदेव नहीं देश की मीडिया और सभी पार्टियों के लोगों को एक माहौल बनाना चाहिए. जो विदेश में काला धन जमा कर सकते हैं वो अपने भारत के अन्दर अपने धन के जरिये अस्थिरता पैदा कर सकते हैं, ये बाबा को सोच कर ही ताल ठोंकनी चाहिए थी. ज्यादा चालाकी के चक्कर में अकेले पड़ चुके बाबा का साथ तो अन्ना हजारे ने भी दिल से नहीं दिया, कालेधन के खातेदार बाबा की राजनैतिक नौसिखियेपन का फायदा उठाते हुए कुछ सफेदपोशों के जरिये इन्हें सबक सिखाने के लिए मैदान में कूड़े लेकिन परदे के पीछे से..लेकिन बाबा को जब तक समझ में आता कि उन्होंने सांप के बिल में हाथ ड़ाल दिया है, तब तक उस सांप ने उन्हें डस भी लिया और जहर उनके सबसे करीबी तक पहुच गया.
केंद्र की कठपुतली सीबीआई की पीठ तो वाकई ठोंकने लायक है क्यूं कि इसको चालाने के लिए ऊँगली का भी इस्तेमाल नहीं करना पड़ता शायद इन्हें भर्ती के दौरान ही सत्ता के इशारे समझने की ट्रेनिंग भी दी जाती है, लेकिन सच तो ये है कि दाग इधर भी हैं जो योग से हासिल प्रतिष्ठा में अब तक छुपे थे, पतंजलि योगपीठ के प्रमुख रामदेव और बालकृष्ण का विवादों से पुराना नाता है. बाबा की दवाओं कंपनियों और बालकृष्ण की नागरिकता, पासपोर्ट पर सवाल पहले भी उठ चुके हैं पर 4 जून के पहले इनकी जाँच करने की जहमत किसी ने नहीं उठाई और ये मामले सिर्फ फाइलों में कैद होकर धूल चाटते रह गए.
हरिद्वार के कनखल स्थित त्रिपुरा योग आश्रम से रामदेव बालकृष्ण ने योग सिखाने की शुरुआत की धीरे-धीरे ये तिकड़ी हरिद्वार के दिव्या योग मंदिर के अध्यक्ष शंकरदेव की शरण में पहुंचे जहाँ इस कला का जमकर विस्तार किया सच तो ये है कि रामदेव की डीलिंग पावर और बालकृष्ण की चतुराई ने इन्हें कम समय में ही असमान की बुलंदियों तक पंहुचा दिया, चूंकि रामदेव और बालकृष्ण ये जान गए थे कि वही इस ख्याति के मुख्य अधिकारी हैं सो अपने परिवार और रिश्तेदारों को उन्होंने महत्वपूर्ण पद और जिम्मेदारियां दे दी, जिससे नाराज कर्मवीर और कई साथियों ने इनका साथ छोड़ दिया सबसे ज्यादा समस्या तो शंकर देव की प्रतिष्ठा के दांव पर लगने से हुई और उनकी २००७ में रहस्यमयी तरीके से हुई गुमशुदगी भी अब सीबीआई के लिए एक हथियार बन गयी है, जो अब तक ठण्डे बस्ते में पड़ी थी.. सीबीआई भी इस हाई प्रोफाइल बन चुके मामले में कोई रिस्क नहीं लेना चाहती लेकिन शुरुआत तो बालकृष्ण से हो ही गई है.
जाँच शुरू हुई देहरादून से लेकिन सबूत इस जाँच के बनारस तक ले गए और फिर परते खुलने में देर नहीं लगी, सम्पूर्णानन्द विश्व विद्यालय ने तो पल्ला झाड़ ही लिया उल्टे नाम ख़राब करने के चक्कर में आचार्य पर एफआईआर तक की धमकी दे डाली. मीडिया को खुल कर उन रोल नंबर का डिटेल भी दे दिया, जिनके जरिये ये नेपाली आचार्य जी लोगों से पैर छुआ कर आशीर्वाद दिया करते थे. हरिद्वार नगर पालिका से उनके जन्म सम्बन्धी दस्तावेज पहले ही गायब हो चुके हैं. सीबीआई के हर रोज कसते शिकंजे से बाबा के चेहरे का रंग बदलता चला जा रहा है.. सोचनेवाली बात ये है कि सीबीआई को जाँच में सहयोग नहीं कर रहे बालकृष्ण शायद काले कोट के बहकावे में हैं कि उनको कुछ नहीं होगा और वो पतंजलि योगपीठ सहित तमाम संस्थानों और पतंजलि आयुर्वेद विश्व विद्यालय के कुलपति और सर्वे सर्वा बने रह पाएंगे. ये सवाल आज काले धन से जयादा चर्चा का विषय है.
लेखक महेंद्र प्रताप सिंह रायबरेली में आईबीएन7 के संवददाता हैं.

