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कुख्‍यात चंबल में बदलाव की बयार

[caption id="attachment_2322" align="alignleft" width="64"]दिनेश शाक्‍य दिनेश शाक्‍य [/caption]: नीले पानी वाली चंबल नदी के आर्कषण से घाटी की तस्‍वीर बदलने का फैसला : डॉल्फिन को निहार सकेंगे सैलानी : अटेर का अपना एक अलग इतिहास है : चंबल की तुम धार देखो, डॉल्फिन का प्यार देखो, डाकुओं की बीहड़ देखो, अटेर का इतिहास देखो, बरह अतिशय क्षेत्र देखो, घड़ियालों के आंसू देखो। यह चंद लाइनें ही दस्यु संरक्षण के लिए कुख्यात रहीं चंबल की वादी की तस्वीर बदलने के लिए की जा रही कवायद का की तस्‍वीर पेश करती हैं। प्रकृति की तमाम मनोहारी धरोहरों को अपने आगोश में समेट के रखने वाली इन्हीं वादियों के प्रति सैलानियों को आकर्षित करने की कोशिश शुरू हो चुकी है। राष्ट्रमंडल खेलों में हिस्सा लेने आने वाले देशी व विदेशी सैलानियों को कुख्यात रहे चंबल घाटी की सुन्‍दरता से रुबरू कराने और इस इलाके को अंतर्राष्‍ट्रीय स्तर पर विख्यात करने का प्रयास मध्य प्रदेश के भिंड जिला प्रशासन ने कर दी है। चंबल चैलेंज नाम से तैयार कराए गए इस प्रोजेक्ट में पर्यटक चंबल की घाटी में संरक्षित दुर्लभ प्रजाति के जलीय जीवों के दीदार तो कर ही सकेंगें, मिट्टी के पहाड़ों पर रोमांचक खेलों का आनंद भी उठा सकेंगें।

दिनेश शाक्‍य

दिनेश शाक्‍य

दिनेश शाक्‍य

: नीले पानी वाली चंबल नदी के आर्कषण से घाटी की तस्‍वीर बदलने का फैसला : डॉल्फिन को निहार सकेंगे सैलानी : अटेर का अपना एक अलग इतिहास है : चंबल की तुम धार देखो, डॉल्फिन का प्यार देखो, डाकुओं की बीहड़ देखो, अटेर का इतिहास देखो, बरह अतिशय क्षेत्र देखो, घड़ियालों के आंसू देखो। यह चंद लाइनें ही दस्यु संरक्षण के लिए कुख्यात रहीं चंबल की वादी की तस्वीर बदलने के लिए की जा रही कवायद का की तस्‍वीर पेश करती हैं। प्रकृति की तमाम मनोहारी धरोहरों को अपने आगोश में समेट के रखने वाली इन्हीं वादियों के प्रति सैलानियों को आकर्षित करने की कोशिश शुरू हो चुकी है। राष्ट्रमंडल खेलों में हिस्सा लेने आने वाले देशी व विदेशी सैलानियों को कुख्यात रहे चंबल घाटी की सुन्‍दरता से रुबरू कराने और इस इलाके को अंतर्राष्‍ट्रीय स्तर पर विख्यात करने का प्रयास मध्य प्रदेश के भिंड जिला प्रशासन ने कर दी है। चंबल चैलेंज नाम से तैयार कराए गए इस प्रोजेक्ट में पर्यटक चंबल की घाटी में संरक्षित दुर्लभ प्रजाति के जलीय जीवों के दीदार तो कर ही सकेंगें, मिट्टी के पहाड़ों पर रोमांचक खेलों का आनंद भी उठा सकेंगें।

देश में पहली मर्तवा होने जा रहे राष्ट्रमंडल खेलों के आयोजन चंबल घाटी की तस्वीर भी बदल सकते हैं। भिंड के युवा जिलाधिकारी रघुराज राजेंद्रन ने इसके लिए प्रोजेक्ट पर काम शुरू करा दिया है। जिलाधिकारी का यह प्रयास इसलिए भी काफी मायने रखता है कि अभी तक इस प्रोजेक्ट के लिए न तो मध्य प्रदेश के टूरिस्ट विभाग ने मंजूरी दी है और न ही राज्य सरकार ने। हालांकि इसके बावजूद भिंड प्रशासन ने अटेर के किले के ऐतिहासिक स्वरूप प्रदान करने एवं किले के नजदीक से इठलाती बलखाती गुजरती नीले पानी वाली चंबल नदी के आर्कषण से घाटी की तस्‍वीर बदलने का फैसला लिया है। यह वह स्थान है जहां से चंद दूरी पर ही चंबल में अठखेलियां करतीं डॉल्फिन को सैलानी बेखौफ होकर निहार सकेंगे। ढलते सूरज की लाल किरणों के मध्य चंबल में लहराता नीला पानी किसी को भी अपनी ओर आकर्षित कर सकता है। यहीं पास में ही नदगवां में घड़ियालों के दुर्लभ नजारों को सैलानी देख सकेंगें।

भिंड जिला प्रशासन की मंशा यह है कि चंबल के इस नजारे को गोवा के किसी दर्शनीय बीच की भांति संवारा जाए। इसके लिए भिंड प्रशासन पूरी तन्मयता से जुट गया है। दिल्ली में होने जा रहे कॉमनवेल्थ गेम्स के साथ ही बटेश्वर के ऐतिहासिक शिव मंदिर पर लगने वाले विशाल मेले में भाग लेने आने वाले सैलानियों को प्रकृति के इन अद्भुत नजारों को दिखाने के लिए प्रशासन ने क्षेत्रीय गाइडों को प्रशिक्षण देना भी प्रारंभ कर दिया है। चूंकि यह आयोजन इसी साल अक्टूबर में किया जाना प्रस्तावित है तो इस मौसम में सैलानी अप्रवासी पक्षी, जो साइबेरिया, यूके एवं ऑस्ट्रेलिया से इन इलाकों में आते हैं, सैलानियों के आकर्षण के केन्‍द्र होंगे। गौरतलब है कि चंबल के इस सफारी क्षेत्र में 280 प्रजाति की विभिन्न प्रवासी पक्षी सर्दियों के मौसम में भ्रमण करने आते रहे हैं।

यहां सैलानी प्राकृतिक धरोहरों का लुफ्त तो उठाएंगे ही, इसके साथ ही यहां रोमांचक खेलों का आयोजन उन्हें पर्वतीय स्थलों की खूबसूरती का एहसास कराएंगे। प्रशासन ने इसके लिए उत्तराखंड के ट्रेनरों से रैकी करा ली है। अटेर के ऐतिहासिक किले पर रस्सी के सहारे चढ़ने और उतरने का अभ्यास भी शुरू किया गया है। इस प्रोजेक्ट को सफल स्वरूप देने के लिए ही यहां ट्रेजर हंटस एवं एडवेंचर गेम के आयोजनों के साथ ही चंबल ट्रेजर हंट, वाटर राइटस, बनाना राइड, एलिगेटर एवं डॉल्फिन स्पॉटिंग, पैरासाइलिंग, हॉट एअर बैलूनिंग, रॉक क्लाइविंग एवं जॉर्बो वॉल जैसे भी आयोजन कराए जाएंगें। सैलानियों को इन सबसे हटके दस्यु जीवन छोड़कर सामाजिक जीवन में रच बस चुके पूर्व दस्यु सम्राट मोहर सिंह एवं मलखान सिंह जैसे डकैतों से भी रूबरू होने का मौका मिल जाएगा।

मध्य प्रदेश के भिंड जिले के अपर जिलाधिकारी छोटे सिंह बताते हैं कि अत्याधुनिक जीवन शैली में रचे बसे सैलानियों को यहां रहने के लिए किले से सटाकर दस टेंट लगवाएं जाएंगे। यह बाहरी तौर पर बेशक टेंट के जैसा होगा, परंतु इसके अंदर सैलानियों को पांच सितारा होटलों जैसी सुविधा मुहैया कराई जाएगी। दस गुणा बारह के आकार वाले प्रत्येक टेंट की लागत तकरीबन साठ हजार रूपये अनुमानित है। इस प्रोजेक्ट की सफलता के उपरांत इस प्रकार के चार सौ टैंट लगाये जाने की योजना है। इस प्रोजेक्ट के लिए बारह करोड़ रूपये का प्रस्ताव शासन को बनाकर भेजा गया है। इस प्रोजेक्ट की कामयाबी के लिए प्रशासन के आला अधिकारी आगरा और ग्वालियर, जहां सैलानियों की संख्या अधिक रहती है, वहां के टूर ऑपरेटर्स एवं पर्यटन विभाग से भी संपर्क कर रहे हैं। फिलहाल प्रशासन को जिस प्रकार से पर्यटन से जुड़े लोगों का सहयोग मिल रहा है उससे उम्मीद है कि इस मिशन को सफलता मिल सकती है। इस आयोजन के दौरान सैलानियों को चंबल में घूमने के लिए आठ मोटर वोट प्रयोग में लाई जाएंगीं।

मूल रूप से अटेर के रहने वाले विदेश मंत्रालय के पूर्व संयुक्त सचिव डॉ. आर. के. दीक्षित ने भी प्रशासन को पूरा सहयोग देने का भरोसा जताया है।चंबल में बदलाव की यह बयार यदि कामयाब हो जाती है,  तो इसका फायदा ना सिर्फ भिंड बल्कि इटावा, आगरा, मुरैना, धौलपुर की चंबल सफारी को भी मिल सकता है। तब यह पूरा क्षेत्र पर्यटन की दृष्टि से महत्‍वपूर्ण हो जायेगा। अपर जिलाधिकारी बताते हैं कि अब चंबल घाटी दस्युविहीन है और यहां सुरक्षा का कोई खतरा नहीं है। इसके बावजूद सैलानियों की सुरक्षा का पूरा प्रबंध किया जाएगा। प्रशासन प्रत्येक प्वॉइंट पर अंतरप्रांतीय स्तर की सुरक्षा सैलानियों को दी जायेगी। सुरक्षा में मध्य प्रदेश के स्टेट आर्म्स फोर्स का सहयोग लिया जाएगा। चंबल सेंचुरी पर्यटन काउंसिल के सदस्य एवं डीआरडीए के परियोजना प्रबंधक अमित मिश्रा बताते हैं कि इस आयोजन के दौरान चंबल एवं मध्य प्रदेश की समृद्ध संस्कृति से भी सैलानियों को रूबरू कराया जाएगा। यहां के लोक गायन मसलन बड़बोला, आल्हा, लांगुरिया जैसे गीतों के साथ ही यहां की संस्कृति में रचे बसे वाहन नृत्यों के आयोजन से भी पर्यटकों को लुभाया जायेगा। इसके लिए फिलहाल भारतीय पुरातत्व विभाग को पत्र लिखकर किले में आयोजन कराने के लिए प्रयास किए जा रहे हैं। ऐसा न हो पाने की स्थिति में फिर चंबल नदी के किनारे सांध्यकाल में यह आयोजन होंगें।

पर्यटकों के खान-पान की ओर ध्यान देते हुए इस प्रोजेक्ट में अंतर्राष्ट्रीय स्तर की कंपनियों को यहां स्टॉल लगवाने के लिए आमंत्रित किया जाएगा। इस प्रयास से क्षेत्रीय लोगों के रोजगार की भी संभावनाएं बढ़ेंगी।अपर जिलाधिकारी छोटे सिंह बताते हैं कि चंबल के इस क्षे़त्र के नौजवानों का देश की सुरक्षा में सदैव ही योगदान रहा है। यहां के लोगों में जहां बल है तो बुद्धि भी है। बस इसी को संवारने की कोशिश है। पीले फूलों के लिए ख्याति प्राप्त रही यह वादी उत्तराखंड की पर्वतीय वादियों से कहीं कमतर नहीं है। अंतर सिर्फ इतना है कि वहां पत्थरों के पहाड़ हैं तो यहां मिट्टी के पहाड़ है। बीहड़ की ऐसी बलखाती वादियां समूची पृथ्वी पर अन्यत्र कहीं नहीं देखी जा सकतीं हैं। अटेर का अपना एक अलग इतिहास है और किले की प्राचीर के किनारे से बलखाती गुजरती चंबल नदी किसी समुद्री बीच से किसी भी मायने में कमतर नहीं है।

जिला प्रशासन अपने इस महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट के प्रति जिस तरह से उत्साहित है वहीं अटेर की ओर जाने वाले रास्ते इस प्रोजेक्ट की सफलता में बाधक साबित हो सकते हैं। भिंड से अटेर तक के तीस किमी की यह दूरी सैलानियों को खासा परेशान कर सकती है। ग्वालियर की ओर से आने वाले पर्यटक इसी एकमात्र रास्ते का प्रयोग करेंगें। यह मार्ग संकरा तो है ही सड़क पर जगह-जगह गड्ढे और अनावश्यक स्पीड ब्रेकर टूरिस्टों के लिये परेशनी के सबब बनेंगे।  चंबल की जिन वादियों में पर्यटकों को भ्रमण कराने की भिंड प्रशासन ने जो प्रोजेक्ट तैयार किया है उसका अतीत काफी खौफनाक रहा है। यह सही है कि अब चंबल की यह वादियां दस्यु समस्या से पूरी तरह से मुक्‍त हो चुकी है, परंतु चंबल की इस घाटी के इतिहास में इस कदर खूंखार डकैतों का बोलबाला रहा है, जिनके आगे उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश एवं राजस्थान जैसे प्रांतों का सुरक्षा तंत्र पूरी तरह से असहाय नजर आता था। एक के बाद एक जघन्य आपराधिक वारदातों को अंजाम देने वाले इन दस्यु सरगनाओं एवं उनके गिरोह के सदस्यों को इन्हीं बीहड़ों की खारें अपने आगोश में छिपा लिया करतीं थीं।

अटेर के ऐतिहासिक किले की बात की जाए तो वर्ष 1907 का मंजर बरबस ही जेहन में उभर आता है,  जब 21 पुलिसकर्मियों को उनके परिवारों सहित चंबल की वादियों में रहने वाले दस्यु सरगना ने मौत के घाट उतार दिया। यह तो सिर्फ बानगी भर थी यही कारण है कि प्रकृति की इस अद्भुद घाटी को दुनिया भर के लोग सिर्फ और सिर्फ डकैतों की बजह से ही जानते हैं। इसी के कारण वॉलीबुड भी मुंबई की रंगीनियों से हटकर चंबल की इन वादियों की ओर आकर्षित हुआ और डकैत, मुझे जीने दो, चंबल की कसम, डाकू पुतलीबाई जैसी फिल्मों ने दुनिया भर के दर्शकों का मनोरंजन किया। इन डकैतों की गतिविधियों में प्रकृति द्वारा प्रदत्त की गई यह वादियां इस कदर कुख्यात हो गईं कि क्षेत्रीय लोग भी इसमें जाने का साहस नहीं जुटा सकते थे। जबकि वास्तविकता यह है कि पूरी तरह से प्रदूषण रहित चंबल की नदी का पानी को गंगाजल से भी अधिक शुद्ध और स्वच्छ माना जाता है। चंबल की इन वादियों में अनगिनत ऐसी औषधियां समाहित है जो जीवनदायनी बन सकती हैं। भिंड जिला प्रशासन ने एक पहल शुरू की है, इससे सबक लेते हुए चंबल सफारी क्षेत्र से सटे अन्य प्रांत और जनपदों का प्रशासन ऐसे ही कार्यक्रम तैयार करता है, तो यकीनन इन वादियों के इर्दगिर्द रहने वाले लोगों को रोजगार तो मिलेगा साथ ही कुख्‍यात चंबल घाटी अपनी खूबसूरती के लिये भी विख्‍यात हो सकेगी। साथ ही पर्यटन मानचित्र पर भी अपना नाम दर्ज करा सकेगी।

दिनेश शाक्‍य इटावा में टीवी पत्रकार हैं.

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