: गौशाला के लिए अहमद पटेल ने दिए दस लाख रुपये : ऐसा किसी अध्यात्मिक जगह पर ही हो सकता है कि रात-दिन सियासी दुनिया से घिरा, देश की राजनीति में सर्वाधिक ताकतवर लोगों में शामिल कोई शख्स किसी संत की तरह बोलने लगे और किसी मुस्लिम सूफी संत की मजार की ओर से हिन्दुओं के लिए आस्था की प्रतीक गाय को बचाने और उसके संरक्षण के लिए गौशाला की स्थापना के लिए तत्काल दस लाख रुपये देने की घोषणा कर दे। ऐसा ही नजारा था, गुजरात के बड़ौदा के पास स्थित एकलबारा में सूफी संत पीर कयमामुद्दीन दादा साहेब की मजार पर उर्स के अवसर पर आयोजित सांप्रदायिक सद्भाव सम्मेलन में। इस सम्मेलन में संत मुरारी बापू, काँग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी के राजनीतिक सलाहाकार और सांसद अहमद पटेल, गुजराती के जाने माने चिंतक, लेखक, टिप्पणीकार व साहित्यकार गुणवंत शाह और इतिहासकार इब्राहिम क़ादरी मौजूद थे। पीर कयामुद्दीन चिश्ती की पवित्र मजार पर ये 325 वाँ उर्स था।
अहमद पटेल दिल्ली में ए राजा से लेकर, बिहार के चुनाव की गहमागहमी की अपनी तमाम राजनीतिक व्यस्तताओं को छोड़कर इस कार्यक्रम में भागीदारी करने खुद ही नहीं आए बल्कि इसमें आमंत्रित संत मुरारी बापू को महाराष्ट्र के अमरावती से लाने के लिए खासतौर पर विशेष चार्टर विमान की व्यवस्था भी की, ताकि वे इस कार्यक्रम में शामिल हो सके। इस मौके पर अहमद पटेल ने अपने पूरे भाषण में अध्यात्मिकता और शेरो शायरी का रंग घोलकर खूब तालियाँ बटोरी। देश के राजनीतिक हालात पर उन्होंने अपनी बात इस शेर के माध्यम से कही-
इस कायनात में इंकलाब उठेगा ही क्यों
बुलंद होकर भी आदमी ख्वाहिशों का है गुलाम।
उन्होंने देश की संस्कृति और परंपराओं को जीवित रखने में संतों की भूमिका का उल्लेख करते हुए कहा कि बाबा कयामुद्दीन चिश्ती और मुरारी बापू जैसे संतों ने हमारी पाँच हजार पुरानी संस्कृति को जीवित रखा है। उन्होंने कहा कि आज इस घनघोर अंधेरे में जो रोशनी दिखाई देती है वह
इस देश के संतों की वजह से है, क्योंकि संत मन को स्वस्थ करते हैं और मन स्वस्थ होता है तो समाज में और राष्ट्र में कोई बुराई नहीं पनपती।
संतों की भूमिका की चर्चा करते हुए अहमद पटेल ने कहा, ‘छत पर लगे दिए कब से बुझ गए होते, कोई तो है जो हवाओं के पर कतरता है।’ भारतीय संस्कृति में गाय की महत्ता का उल्लेख करते हुए अहमद पटेल ने कहा कि गाय हमारी कामधेनु है। दुनिया में ऐसा कोई उद्योग या मशीन नहीं जो मात्र चार घंटे में आपको प्रॉफिट दे सके, लेकिन गाय को आप शाम को चारा खिलाईये और सुबह ही वह आपको दूध दे देती है।
इस अवसर पर गुजराती लेखक श्री गुणवंत भाई शाह ने कहा कि किसी सूफी फकीर की मजार पर गौशाला खुले ऐसी घटना तो गिनीज़ बुक ऑफ वर्ल्ड रेकॉर्ड्स में दर्ज की जानी चाहिए। उन्होंने कहा कि आज ये जगह हिन्दू-मुस्लिम एकता का राष्ट्रीय राजमार्ग बन गई है। उन्होंने कहा कि भारत में संतों की वजह से सांप्रदायिक सद्भाव की एक महान परंपरा कायम है। सूफी संत और ऋषि मुनि में कोई फर्क नहीं है। कश्मीर में एक प्रसिद्ध सूफी संत हुए हैं नूरुद्दीन, जिन्हें हम आज भी ऋषि नूरुद्दीन के नाम से जानते हैं।
मुरारी बापू ने बाबा कयामुद्दीन द्वारा 325 वर्ष पूर्व भारतीय वेदांत और कुरान का समन्वय करते हुए लिखी गई पुस्तक ‘नूर-ए-रोशन’ के नए संस्करण का लोकार्पण करते हुए कहा कि देश में लोक सभा, राज्य सभा और विधान सभा की तर्ज पर एक ‘सद्भावाना सभा’ भी होना चाहिए। जहाँ देश के बुद्धिजीवी, संत और विद्वान बैठकर देश की समस्याओं पर चिंतन कर सकें। मुरारी बापू ने कुँअर बाराबँकी के शेर में अपनी बात यों कही-
न हारा है इश्क़ न दुनिया थकी है,
दिया जल रहा है और हवा चल रही है।
वो जहाँ भी रहेगा रोशनी फैलाएगा,
चिरागों का कोई मकाँ नहीं होता।
तसबी छोड़दी मैने इस खयाल से,
गिनकर नाम क्या लेना, वो तो बेहिसाब देता है।
मुरारी बापू ने भी अपने उद्बोधन में एक घटना सुनाते हुए कहा कि बरसों पहले जब मैं ऋषिकेश में अकेला रहता था और प्रतिदिन यज्ञ करता था तो यज्ञ समाप्त होने के बाद देर रात एक बजे गंगा नदी पार कर एक सूफी फकीर यज्ञ की वेदी पर आता था। ये सिलसिला सात दिन तक चलता रहा। एक दिन मैंने उससे पूछा कि तुम इतनी रात को यज्ञ की वेदी के पास आकर क्यों बैठते हो, तो उसने कहा, ‘मैं एक मुसलमान फकीर हूँ और कहीं मेरी वजह से हिन्दू लोग नाराज न हो जाए इसलिए रात के अंधेरे में आकर इस पवित्र अग्नि के पास आकर बैठता हूँ।’ मुरारी बापू ने कहा कि इसके बाद हम दोनों देर रात को अकेले ही चुपचाप यज्ञ की वेदी पर बैठे रहते थे, कभी हमने कोई बात नहीं की, मगर ऐसा लगता है कि उस सूफी फकीर ने मुझ पर अपनी सारी करुणा बरसा दी और मैं आज तक उसमें भिगा हुआ हूँ।
मुरारी बापू ने कहा कि बंगलादेश जैसे मुस्लिम देश में लोग गाय का दूध पीते हैं और वहाँ भी गाय की हत्या पर प्रतिबंध लगा हुआ है। समारोह में जाने माने इतिहासकार श्री इब्राहिम कादरी ने गुजरात की सूफी परंपरा पर किए गए अपने शोध के महत्वपूर्ण अंश प्रस्तुत कर सूफी परंपरा पर एक नई दृष्टि डाली।
समारोह को संबोधित करते हुए पीर कयामुद्दीन चिश्ती की मजार के गद्दीनशीं कदीर पीरज़ादा ने कहा कि जब मजार की ओर से गौशाला शुरु किए जाने की बात गाँव के सरपंच को बताई गई तो गाँव के सरपंच ने रातोंरात पंचायत की बैठक आयोजित कर मात्र 24 घंटे में गौशाला के लिए गाँव में जमीनी आवंटित कर इसके कागजात श्री मुरारी बापू को सौंप दिए। समारोह में एकलबारा गाँव के सरपंच ठाकुर जयपाल सिंह को भी सम्मानित किया गया।
कदीर पीरज़ादा ने कि पीर कयामुद्दीन चिश्ती ने 325 साल पहले गौ हत्या को रोकने की पहल की थी। उनका मानना था कि एक गाय एक परिवार को ही नहीं बल्कि पूरे समाज को, और पूरी संस्कृति को बचाकर रखती है। उन्होंने मात्र 8 साल की उम्र में पवित्र कुरान कंठस्थ कर ली थी। उनके बारे में कहा जाता है कि वे मुस्लिम होने के बावजूद शुद्ध शाकाहारी थे और सभी धर्मों के लोग उनको आदर देते थे। उन्होंने देश भर में यात्राएँ की। एक बार यात्रा के दौरान वे तेज बारिश की वजह से एक शिव मंदिर में शरण लेने पहुँच गए। मंदिर के पुजारी ने कहा कि उन्हें मंदिर में आश्रय नहीं मिल सकता क्योंकि वे दूसरे धर्म के हैं। इस पर उन्होंने पुजारी से कहा कि क्या वे मंदिर में नंदी की प्रतिमा को घास खिला सकते हैं, तो पुजारी ने हँसकर कहा कि मूर्तियाँ क्या कोई चीज खा सकती है। इस पर पीर कयामुद्दीन ने पास से घास उठाई और नंदी के मुँह के पास ले गए, पुजारी ये देखकर चौंक गया कि नंदी ने उनके हाथ से मजे से घास खाई। वह पुजारी उसी दिन से उनका भक्त हो गया।
आफताब आलम की रिपोर्ट.

