: भय, भूख और गरीबी से लड़ने का फैसला करें : आपने सन 92 का अयोध्या काण्ड पढ़ा है। ये वो अयोध्या काण्ड नहीं है। जिसका जिक्र तुलसीदास जी ने रामचरित मानस में किया है। जिसे पढ़कर आप शान्ति और सुख का अनुभव करेंगे। मैं तो बात सन 92 के उस अयोध्या काण्ड की कर रहा हूं जिसके सारे अध्यायों को लिखने के लिए उन्माद की स्याही का इस्तमाल किया गया। एक ऐसा अंध धार्मिक उन्माद जिसमें इंसान ने इंसान को मारा, मारने वाला भी इंसान था और मरने वाला भी। देश भर में जमकर खून-खराबा हुआ, कई लोग मरे, सैकड़ों घर जले, न जाने कितने लोगों का आशियाना उजड़ गया रोजी-रोटी छीन गई। इंसान के लिए इंसान से होने से ज्यादा जरूरी है हिन्दू या मुसलमान होना, यही इस काण्ड की पहली और अंतिम शिक्षा है।
ये काण्ड आपको ऐसी जगह ले जाकर खड़ा करेगी जहां आपको आगे जाने के सारे रास्ते बंद मिलेंगे। लेकिन शायद ही लोग कभी इस बात को जान पायेंगे कि 92 के अयोध्या काण्ड ने आम आदमी को गुलाम बनाए रखने का दस्तावेज लिए उदारीकरण को अपनी जड़े जमाने के लिए वो जमीन दी, जिसने आगे चलकर आम आदमी का जीना दुःश्वार कर दिया। आदमी के कीमत पर मुनाफा कमाने का खेल इसी के बाद शुरू हुआ। आज हालत ये है कि देश उसका है जिसके जेब में पैसा है, अगर पैसा नहीं है तो सिवाय जलालत, अपमान, बेगारी, बेरोजगारी और मौत के जन साधरण को देने के लिए इस व्यवस्था के पास कुछ नहीं है। हैरत की बात ये है कि कदम-कदम पर ठगे जाने के बाद भी एक बार फिर लोग नये सिरे से ठगे जाने के लिए व्यवस्था के डुगडुगी का इंतजार करते है। एक सी जरूरत, एक सा एहसास और एक सी अधिकारों की लड़ाई लड़ने के बजाए करोड़ों लोगो का ये विशाल जन समुदाय कभी धर्म के नाम पर हिन्दू-मुसलमान में बंटकर तो कभी अगड़े-पिछड़े के नाम पर जमकर लड़ता है, और विकास के राहों से कोसों दूर अपने समसामयिक लड़ाई से कट जाता है।
यहीं से शुरू हो जाता है उसके शोषण का सिलसिला। धर्म, इलाके, जात, बोली भले ही जुदा हो लेकिन आज का सबसे बड़ा सच ये है कि मुठ्ठी भर लोगों के हाथों करोड़ों-करोड़ जन समुदाय का जीवन कैद है। मुठठी भर ये लोग जब चाहे चुटकी बजाते ही करोड़ों लोगो का इस्तेमाल अपने हक में कर लेते है। इनके मतलब की भट्ठी इन्हीं करोड़ों जिन्दगियों के ईंधन पर सुलगती रहती है और ये गिरोहबंद लोग मजा काटते रहते हैं। जबकि जनसाधारण की जिदंगी सजा में तब्दील हो जाती है। न जाने हम धर्म के नाम पर कितनी बार लड़े-कटे है। कितने बेगुनाहों का खून हमने बहाया है। पर इन सबका हासिल क्या हुआ। क्या इक सुबह होने से लेकर शाम ढलने तक इस देश का विशाल जन समुदाय जिन समस्याओं से लड़ता है, उनमें से एक भी हल हो पायी।
क्या इस शाइनिंग इंडिया में वो सारे बुनियादी हक, जो आदमी के जिंदा रहने के लिए बेहद जरूरी हैं, मिल गए! चौबीस घंटे 365 दिन हम जिस साझा जिंदगी को जीते है। एक दूसरे के सुख-दुःख, हंसी-खुशी में शरीक होते है, क्या उस साझा जिदंगी की डोर इतनी कमजोर होती है कि अंतत: वो उन्माद का शिकार होकर अपनों को ही निशाना बना लेती है। अब जब देश भर के लोगों की निगाह 24 सितंबर को अयोध्या मामले में आने वाले हाईकोर्ट के फैसले पर टिकी हुई है, वो ही मुठठी भर लोग जंग लग चुके सड़े-गले विचारों पर सान चढ़ाने के फिराक में जुट गए है। उनका इरादा साफ है शांति उन्हें भाती नहीं, वैसे भी देश में चल रहे नवउदारीकरण और उसके एजेंटों को एक बड़े मौके की तलाश है कि बचे-खुचे छोटे-मोटे उद्योग-धंधे का बेड़ा गर्क हो जाए ताकि उनके विस्तारीकरण के लिए कोई रूकावट न रह जाए।
ऐसे में न्यायालय जो भी फैसला सुनाये, आपका फैसला क्या होगा। बेहतर यही होगा कि न्यायालय के फैसले से पहले हम और आप एक फैसला लें। वो फैसला है एक दूसरे का हाथ पकड़कर, एक बेहतर जिंदगी की लड़ाई लड़ते हुए आने वाले कल को एक बेहतर कल में बदल डालने का फैसला। इसलिए ये वक्त भय और चिंता का शिकार बनकर एक दूसरे से ये पूछने का वक्त नहीं है कि यार 24 को क्या होगा! ये वक्त है आपसी समझदारी और मजबूत करने का। डर या खौफ से बाहर आकर साम्प्रदायिक ताकतों को हमेशा के लिए बाहर का रास्ता दिखाने का। सो फैसला लीजिए और बढ़िए आने वाले कल की ओर, ये याद रखिए-
‘‘ वो सूफी का कौल हो या पंडित का ज्ञान
जितनी बीती आप पर उसको ही मान’’
लेखक भास्कर गुहा नियोगी वाराणसी के निवासी हैं तथा हिन्दी दैनिक युनाइटेड भारत से जुड़े हुए हैं.

