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कौन हैं इस देश की दुर्दशा के जिम्मेदार?

चंचलपिछले महीनों में करीब दो लाख करोड़ रूपए से भी अधिक की राष्ट्रीय लूट की खबर आई जो कि लोकतंत्र के लिये बेहद लज्जाजनक व राष्ट्रीय शर्म की बात है। ताजातरीन 2जी स्पेक्ट्रम घोटाला एवं कामनवेल्थ गेम्स घोटाला, आदर्श हाउसिंग सोसायटी कांड (महाराष्‍ट्र) और बैंगलोर भूमि घोटाला। 2जी स्‍पेक्‍ट्रम घोटाले में जितनी लूट हुई, उसके आकलन में अनुमान है कि उससे अगले पांच सालों में सभी भारतीयों को खाद्यान्न सुरक्षा सुलभ कराई जा सकती है। यह राशि इस साल के स्वास्थ्य बजट 22,300 करोड़ से आठ गुनी ज्यादा है। कहने का तात्पर्य यह कि आज पूरे देश पर जिसका आतंक छाया हुआ है वह है भ्रष्टाचार। यह शब्द अब शासन-प्रशासन के साथ चिपका सा रहता है। इसके साथ धनबल, बाहुबल आदि सब जुड़ जाते हैं। जो भी इसकी चकाचौंध में आता है बाहर होने की सोचता भी नही हर कोई अब अर्थ के क्षेत्र में ही जीना व रहना चाहता है, जिसके चलते भ्रष्टाचार सम्पूर्ण सरकारी तंत्र में व्याप्त हो गया है। इस देश में जो भी राष्ट्रीय राजनीतिक दल हैं- चाहे कांग्रेस हो भाजपा या अन्य सभी, भीतर से एक जैसे ही हो गए हैं। बाहरी आवरण बस अलग-अलग जान पड़ता है। सदन में राष्ट्रीय महत्व के मुद्दों पर सभी का एक सा रूख रहता है। यही कारण है कि वो चाहे कश्मीर का मुद्दा हो या पाकिस्तान से होने वाली वार्ताएं, सारे मामले वर्षो से खटाई में पड़े हैं। क्योंकि हमारे सांसदों की प्राथमिकता अब देश न रहकर निजी स्वार्थ होते जा रहे हैं।

चंचल

चंचलपिछले महीनों में करीब दो लाख करोड़ रूपए से भी अधिक की राष्ट्रीय लूट की खबर आई जो कि लोकतंत्र के लिये बेहद लज्जाजनक व राष्ट्रीय शर्म की बात है। ताजातरीन 2जी स्पेक्ट्रम घोटाला एवं कामनवेल्थ गेम्स घोटाला, आदर्श हाउसिंग सोसायटी कांड (महाराष्‍ट्र) और बैंगलोर भूमि घोटाला। 2जी स्‍पेक्‍ट्रम घोटाले में जितनी लूट हुई, उसके आकलन में अनुमान है कि उससे अगले पांच सालों में सभी भारतीयों को खाद्यान्न सुरक्षा सुलभ कराई जा सकती है। यह राशि इस साल के स्वास्थ्य बजट 22,300 करोड़ से आठ गुनी ज्यादा है। कहने का तात्पर्य यह कि आज पूरे देश पर जिसका आतंक छाया हुआ है वह है भ्रष्टाचार। यह शब्द अब शासन-प्रशासन के साथ चिपका सा रहता है। इसके साथ धनबल, बाहुबल आदि सब जुड़ जाते हैं। जो भी इसकी चकाचौंध में आता है बाहर होने की सोचता भी नही हर कोई अब अर्थ के क्षेत्र में ही जीना व रहना चाहता है, जिसके चलते भ्रष्टाचार सम्पूर्ण सरकारी तंत्र में व्याप्त हो गया है। इस देश में जो भी राष्ट्रीय राजनीतिक दल हैं- चाहे कांग्रेस हो भाजपा या अन्य सभी, भीतर से एक जैसे ही हो गए हैं। बाहरी आवरण बस अलग-अलग जान पड़ता है। सदन में राष्ट्रीय महत्व के मुद्दों पर सभी का एक सा रूख रहता है। यही कारण है कि वो चाहे कश्मीर का मुद्दा हो या पाकिस्तान से होने वाली वार्ताएं, सारे मामले वर्षो से खटाई में पड़े हैं। क्योंकि हमारे सांसदों की प्राथमिकता अब देश न रहकर निजी स्वार्थ होते जा रहे हैं।

भ्रष्टाचार की गणित ने राजनीति एवं धर्म को भी व्यापार बना दिया है। अब कोई नेता देश के लिए जीवन न्योछावर करने को तैयार नहीं। स्थित यह है कि 40 करोड़ लोगों को दो वक्त का भोजन भी मयस्सर नहीं है, देश में 77 प्रतिशत लोगों की प्रतिदिन आमदनी 20 रू. से भी कम है, जबकि भारत दुनिया के नक्शे में एक ऐसा देश है जिसके पास अपनी विशेष प्राकृतिक सम्पदायें हैं। एक तरफ विशाल उपजाऊ भूमि है तो दूसरी तरफ खनिज पदार्थों से भरपूर पर्वतीय श्रृंखलाएं, विशाल जंगल, देश भर में फैली नदियों की जल धारा, अभेद्य हिमालय, सागर की लहरें, प्राकृतिक सम्पदा के साथ ही अपार श्रमसम्पदा भी देश के कोने-कोने में प्रचुर मात्रा में बिखरी पड़ी है। देश में सबसे कठिन से कठिन शारीरिक श्रम करने वाले लोग हैं, वहीं हर तरह की बौद्धिक चुनौतियों का सामना करने वालों की भी कमी नहीं है। कोई दो राय नही यदि बौद्धिक व शारीरिक शक्ति का विवेक व न्यायपूर्ण, समतामूलक सामंजस्य स्थापित कर दिया जाए तो भारत के पास इतनी क्षमता है कि वह न सिर्फ सभी भारतीयों की खुशहाली व जरूरतों को पूरी करते हुए पूर्ण प्रगति कर सकता है बल्कि दुनिया की एक तिहाई भूख व गरीबी से तिलमिला रही मानवता के लिए सहायक भी बन सकता है।

किन्तु आज भारत की स्थिति है क्या, यह किसी से छिपा नही है? एक तरफ बढ़ती अमीरी की चमक से कुछ लोगों की आंखें चकाचौंध हो रही हैं तो दूसरी तरफ करोड़ों-करोड़ भरतीयों की आंखों का अपनी गरीबी व मजबूरी पर आंसुओं में डबडबा जाना रोजाना की कहानी है। हकीकत तो ज्यादा बदतर है। यदि हम सरकारी आंकड़ों की ही माने तो देश में 37.2 प्रतिशत यानी 40 करोड़ लोगों को दो वक्त का भोजन भी मयस्सर नहीं है। सरकार द्वारा गठित अर्जुन सेन गुप्त कमेटी की रिपोर्ट बताती है कि देश में 77 प्रतिशत लोगों की प्रतिदिन आमदनी 20 रू. से भी कम है। कालाबाजारियों के राज में आसमान छूती महंगाई में 20 रू. में करोड़ों लोग कैसे जिंदगी गुजर कर रहें हैं, इसका अंदाजा सहज लगाया जा सकता है। ऐसे हालात में जी रहे लोग अपने बच्चों को कैसे शिक्षा दे पायेंगे? कैसे उनके स्वास्थ्य की देख-रेख करेगें? उनके भविष्घ्य को कैसे बेहतर बना पायेंगे? यह आप खुद सोच सकते हैं। भारत के पास सभी क्षमता रहने के बावजूद अगर 90 प्रतिशत भारतीय इस हालत में घुट-2 कर जीने के लिए मजबूर हैं, तो फिर आप ही सोचें कि कौन हैं इस देश की दुर्दशा के जिम्मेदार ? इतना ही नही अगर गहराई में देखें तो हालात और भी बदतर हो चुके हैं। पूरा देश विदेशी व देशी बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के कब्जे में आता जा रहा है। जिनका मूल मकसद विकास व रोजगार का लालीपाप दिखाकर भारत से अधिक से अधिक मुनाफा लूट कर विदेशी बैंको में जमा करना बन चुका है।

आज अंग्रेजों के समय की गुलामी से ज्यादा खतरनाक हालात पैदा हो चुके हैं। विशेष आर्थिक क्षेत्रों के नाम पर दस-दस हजार एकड़ तक के साढ़े पांच सौ जगहों पर इन कंपनियों द्वारा कम पैसे देकर किसानों को जबरदस्ती बेदखल करके जमीनें हड़पी जा रही हैं। छत्तीसगढ़, झारखण्ड, उड़ीसा व पश्चिम बंगाल के जंगलों के नीचे अपार खनिज पदार्थों का दोहन करने के लिए पूरा जंगल इन कंपनियों को बेच दिया गया है। यहां अनादिकाल से रहने वाले आदिवासियों को बन्दूक की नोक पर जंगल छोड़कर भागने के लिए मजबूर किया जा रहा है। जो भागने के लिए तैयार नहीं हैं उनको इन कम्पनियों के इशारे पर सरकार सुरक्षा बल या फौज लगाकर गोलियों से शिकार (ग्रीन हण्ट) बनाया जा रहा है। उत्तराखण्ड में पूरी की पूरी नदियों को ये कम्पनियां खरीद कर अपने कब्जे में कर रही हैं। पेप्सी, कोका कोला जैसी बोतल बन्द पानी की व्यापारी कम्पनियां बेचने के लिए जमीन से इतना अधिक पानी निकाल रही हैं, जिससे जल स्तर इतना नीचे चला गया है कि लोगों को हैण्ड पम्प से पीने के लिए मिलना पानी मिलना भी मुश्किल होता जा रहा है। भारत के इतिहास में कभी भी पानी बिकने का उदाहरण नहीं मिलता। लेकिन पृक्रति प्रदत्त अमूल्य जल की बूंदें आज सोलह रुपये लीटर की दर से बिक रही है। अगर 20 रू. दिन भर में आमदनी करने वाला इन्सान भरपेट पानी भी पीना चाहे तो जरा सोचिये कैसे पी सकता है?

अंग्रेजों के राज में हमारे किसान इतने गुलाम कभी नहीं हुए, क्योंकि उनके पास अपने बीज थे। वे अपनी मेहनत से खेत की जुताई करके अपनी फसल उगा सकते थे। लेकिन आज किसानों के हाथ से बीज छीन लिया गया। वे कम्पनियों से बीज खरीदने के लिए मजबूर हो चुके हैं। इन बीजों के साथ पैदा हुए नये-नये रोगों के लिए दवाईयां खरीदना इनकी मजबूरी बन चुकी है। बड़े-बड़े ख्वाब दिखाती कम्पिनयों के बीजों के चक्कर में आकर बर्बाद हुए लाखों किसानों की आत्महत्या की दास्तान हमारे सामने है। जरा सोचिए! यदि ये विदेशी कम्पनियां बीज देना बन्द कर दें तो हमारी खेती का क्या हाल होगा? संकट के बादल केवल किसान, मजदूर, छात्र व नौजवानों पर ही नहीं मंडरा रहे हैं बल्कि सबसे ज्यादा खतरा व्यापार तथा लघु व मध्यम उद्योगों पर छाया हुआ है। हर क्षेत्र में घुसपैठ कर रही विदेशी व देशी बहुराष्‍ट्रीय कम्पनियों की पूंजी के सामने छोटी पूंजी से उद्योग करने वालों को अपने आप को टिकाये रखना मुश्किल होता जा रहा है। उनके सामने सिर्फ दो ही विकल्प बचे हैं या तो वो बरबाद हो जाएं या फिर अपने आप को विदेशी कम्पनियों को सौंप दें। इसका उदाहरण कोल्ड ड्रिंक्स के क्षेत्र में देखा जा सकता है।

भारत के अन्दर पेप्सी व कोका कोला के अलावा जितनी भी कम्पनियां थी या तो बर्बाद हो गईं या उन्हें पेप्सी, कोक ने खरीद लिया। आज बाजार में चाहे किसी भी नाम या रंग की कोल्ड ड्रिंक्घ्स मिलती है, उसके मालिक पेप्सी या कोका कोला हैं। व्यापार के क्षेत्र में इन बड़ी कम्पनियों के जगह-जगह खुल रहे माल रूपी बुल्डोजर ने छोटे-छोटे व्यापारियों के अरमानों को कुचलना शुरू कर दिया है। देश में चौतरफा बढ़ती लूट, बरबादी, बेरोजगारी व गरीबी भारत में कई गुना ज्यादा बढ़ चुकी है। इस लूट के खिलाफ भारतीयों का कोई प्रतिरोध न पैदा हो इसके लिए साम्राज्यवादी गुलाम सांकेतिक चेतना का प्रसार चौतरफा किया जा रहा है। जिसके मूल में दो बातें हैं- पहला नैतिक पतन, दूसरा भारतीय समाज में फूट। नैतिक पतन के अभियान के तहत हर इन्सान को स्वार्थी बनाने की कोशिश की जाती है। सबको सीख दी जा रही है कि अगर आगे बढ़ना चाहते हो तो मेहनत की कमाई से कुछ नहीं होगा। विकास के लिए लूट में शामिल होने के रास्ते तलाशो! सिर्फ अपने बारे में सोचो! परिवार, समाज व देश के बारे में सोचने की बात बेवकूफी है। इसलिए आज भारतीयों का मूलमंत्र ऊपर से शुरू होकर नीचे तक अपने हिस्से के हिन्दुस्तान को लूटना बनता जा रहा है। अपवादों को छोड़ दें तो शीर्ष पद से लेकर गांव के चौकीदार तक को किसी भी काम के लिए सुविधा शुल्क (रिश्वत) चाहिए ऐसी परम्परा बन गई है,  तभी तो देश की सर्वोच्च अदालत को यह कहना पड़ा कि बेहतर होता कि सरकार इसे वैध घोषित कर संवैधानिक मान्यता दे देती।

जरा सोचें सर्वोच्च न्यायालय को ऐसा इसलिए कहना पड़ा, क्योंकि भ्रष्टाचार रूपी कैंसर की कोशिकाएं हमारे प्रशासन के अंत:करण तक फैल गई हैं। नौकरशाही के बाबू उच्च स्तर पर कमजोर और निचले स्तर पर भावशून्य हैं, चुनावी व्यवस्था भी शुरूआती दौर से ही भ्रष्टाचार की जननी रही है, चुनाव में धन उपलब्ध कराने की प्रक्रिया ऐसा प्रेरक तत्व है, जिससे व्यवस्था में बीमारी फैल गई है। यह एहसान से शुरू होती है और बदले में तरह-तरह से कर्ज उतारती है। भूमि खरीदने, भूमि की सौदेबाजी और उसका अधिग्रहण ऐसी रहस्यमय व्यवस्था है, जिससे एक दूसरी समानान्तर अर्थव्यवस्था को खुराक मिलती है। हमारी सतर्कता व्यवस्था का तंत्र भी कमजोर है, जिसमें आप केवल इसके गोले में ही चक्कर काटकर रह जाते हैं। कोई भी सतर्कता या भ्रष्टाचार रोधी इकाई स्वतंत्र और अंतिम नहीं है। इस तरह की एजेन्सियां या तो सिफारिश के आधार पर काम करती हैं अथवा राजनीतिक प्रभाव में आकर  कोई घाव भरने के लिए। पुलिस थाने गरीबों के लिए हैं, जबकि सीबीआई, सीवीसी और कैग धनाढ्य वर्ग के लिए। धनी वर्ग को जमानत, पैरोल और यहां तक कि अग्रिम जमानत भी कानूनी कवच के रूप में सुलभ हो जाती है, और तो और ऐसे लोगों को वातानुकूलित अस्पताल की सुविधा भी मुहैया करा दी जाती है, जबकि गरीबों को जेल की बदबूदार बैरक नसीब होती है। कहने का तात्पर्य यह कि सुविधा इस पर निर्भर करती है कि आप सुविधा हेतु कितनी कीमत चुका सकते हैं।

सशस्त्र सेना और न्यायपालिका के कुछ न्यायाधीशों के नाम भी हाल ही उजागर हुए हैं, जब कि इस वर्ग को अभी तक स्वच्छ- पवित्र और सम्मान की निगाह से देखा जाता रहा है। स्पष्ट है, हमारे देश में न्याय भी दो तरह के हैं (कुछ थोड़े अपवाद छोड़कर)। भ्रष्टाचार नियम है और सहज होना ईमानदारी। हमने वर्तमान में मान लिया है कि भ्रष्टाचार जितना ज्यादा होगा, सम्पत्ति का ढेर लगाने में उतनी आसानी होगी। अपराध जितना छोटा होगा, अपराधी के पकड़े जाने, निलम्बित होने, गिरफ्तार होने की आशंका उतनी ज्यादा रहेगी। धन में बढ़ोतरी करने और यहां तक कि प्रशासन में दबदबा कायम करने का सबसे आसान तरीका बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार में लिप्त होना भी है। कुछ को छोड़ दीजिए, तो देश के प्रति वफादारी और देश सेवक, सब बिकाऊ हो रहे हैं। लोगों को मालूम है कि भ्रष्ट कौन है और निरंकुश कौन है, बावजूद इसके उसे समय आने पर बार-बार चुनते जाते हैं, ऐसा करके हम आप भी उसे बार-बार वैधता प्रदान करते रहते हैं, ताकि वह और अधिक धन व राजनीतिक ताकत हथिया सके।

भारतीय समाज में फूट डालने के अभियान के तहत भारतीय समाज के विभिन्न धर्म, जाति, भाषा, क्षेत्र के विविध समुदायों को एक दूसरे के खिलाफ खड़ा करके उनके अन्दर अविश्वास पैदा किया जा रहा है। आज इनके विभिन्न ऐजेंटों के द्वारा इस गरीबी को पैदा करने वाली अमेरिकी गैंग की लूट के असली चेहरे को छिपाने के लिए यह प्रचारित किया जा रहा है कि हिन्दू इसलिए पिछड़ रहे हैं क्योंकि सारी छूट मुसलमानों को दी जा रही है। मुसलमानों को यह समझाया जा रहा कि मुसलमान इसलिए पिछड़ रहे हैं क्योंकि सब कुछ हिन्दुओं के हाथ में हैं।

सवर्णों को समझाया जा रहा है कि तुम इसलिए पिछड़ते जा रहे हो क्योंकि सारा अवसर दलितों और पिछड़ो को आरक्षण के कारण मिलता जा रहा है। दलितों, पिछड़ों को यह समझाया जा रहा है कि चूंकि वर्षों से सभी जगह अगड़ों का कब्जा है इसलिए तुम आगे नही बढ़ पा रहे हो। मराठियों और असमियों को यह समझाया जा रहा है कि तुम्हारे रोजगार इसलिए छिनरहे हैं कि हिन्दी भाषी तुम्हारे यहां आकर सब हड़प ले जा रहे हैं। यूपी, बिहार वासियों को यह समझाया जा रहा है कि तुम इसलिए पिछड़ रहे हो, क्योंकि दूसरे राज्य तुम्हारा हक हड़प ले रहे हैं। लेकिन यह सच का एक गौड़ पहलू है, असली सच तो यह है कि पूरे देश के हर जाति, धर्म, भाषा, क्षेत्र के लोगों का एक बड़ा तबका लगातार गरीब, बेरोजगार बदहाल होता जा रहा है। कोई थोड़ा कम या कोई थोड़ा ज्यादा।

जिसका सिर्फ एक कारण है, भारत की प्राकृतिक संसाधनों व मानवीय श्रम की चौतरफा लूट। इस तरह पूरे देश को बाहर व अन्दर से लूटने का ऐसा गोरखधन्धा जारी है, जिससे अमीर और अमीर होते जा रहे हैं, गरीब और गरीब होते जा रहे हैं। इसका मूल कारण है भारत में बढ़ती अमेरिकी गैंग का राजनितिक, आर्थिक नियंत्रण यानी नई साम्राज्यवादी गुलामी। जब तक नई साम्राज्यवादी गुलामी से भारत व भारतीयों को मुक्ति नहीं मिलती तब तक गरीबी से मुक्त, सबकी खुशहाली व विकास का रास्ता नही खुल सकता। इसी लिए गरीबी व गुलामी से मुक्त पूर्ण आजाद, भारतीय जनराष्ट्र की स्थापना के लिए जरुरी है जनजागरण। लोकतंत्र की अवधारणा जनता राज पर टिकी थी। आज यह अवधारणा भी एक मजाक बनकर रह गई। इसका एकमात्र कारण है जनता का उदासीन हो जाना। वोट डालकर पांच साल के लिए सो जाना।

भारत में आकंठ तक व्‍याप्त हो चुके भ्रष्टाचार से निपटना भी अब एक और आजादी की लड़ाई के लड़ने के समान है। यह समस्या बेहद गम्भीर है। इससे पार पाने के लिए पूरे मनोभाव के साथ वीर सपूतों की भांति जिहाद छेड़ना होगा। महात्मा गांधी ने भी इस सिद्धांत का समर्थन किया है लेकिन यह क्रान्ति अकेले नही हो सकती इस क्रांति में सभी की जरूरत है, पत्रकारों, कवियों, साहित्यकारों, सच्चरित्र लोकप्रतिनिधियों, युवाओं, प्रबुद्ध नागरिकों, समाजसेवियों, अधिवक्ताओं, चिकित्सकों, शिक्षकों, प्रशिक्षकों को ही नहीं बल्कि आमजनों को अब राष्ट्र व बेहतर समाज के निर्माण के लिए ‘‘भ्रष्टाचार के खिलाफ’’ आगे आना ही होगा, यही समय की मांग भी है। देश की प्रगति, गरीबी,  बेरोजगारी उन्मूलन और साफ सुथरी राजनीति तथा पारदर्शी प्रशासन के लिए ऊपर से नीचे तक पैर जमा चुके भ्रष्टाचार के खिलाफ मुंह खोलना ही होगा, तभी देश की खुशहाली सम्भव है और सही अर्थो में लोकतंत्र भी। जब तक सरकारी और जन कल्याणकारी योजनाओं का फायदा आम आदमी तक नहीं पहुंचेगा तथा आंवटित धनराशि ईमानदारी के साथ योजनाओं के अमल पर खर्च नहीं की जायेगी, बीच में ही बंदरबांट की जाती रहेगी, तब तक देश में खुशहाली आना मुश्किल ही नहीं असम्भव भी है। यह तभी मुमकिन है जब शासक और प्रशासक जवाब देही के साथ पारदर्शिता बनायें।

हम अधिकांश भारतीयों के लिए यह भी जानना जरूरी है कि वर्तमान व्यवस्था में चाहे वह राज्य की भ्रष्टाचार रोधी इकाई हो या सतर्कता इकाई जैसे सीवीसी, कैग, सीबीआई आज कोई भी पूरी तरह शक्ति सम्पन्न नहीं है। हाल ही में सेवा निवृत हुये सतर्कता आयुक्त प्रत्युष सिन्हा भी ऐसा मान चुके है। कुल मिलाकर हम सबको ऐसा बनना होगा कि कोई हमारा उत्पीड़न न कर सके। हमें मांग करनी होगी कि लूट की राशि वापस सरकारी खजाने में आए और लुटेरे जेल के सीखचों में हों। गौर करें 1937 में सीमित किस्म की स्वायत्तता के तर्क से कई प्रांतों में कांग्रेसी सरकारें बनी थीं. पूर्ण स्वतंत्रता अभी दशकों दूर थी, लेकिन सत्ता का नशा सर चढ़ कर शोखी और सुरूर के रंग दिखाने लगा था. कांग्रेसी मंत्रिमंडल तकरीबन 28 महीनों तक राजकाज का जिम्मा संभाले रहा और इसी बीच फर्जी सदस्यता के किस्से उड़े. निजी फायदा दे सकने लायक पदों और नौकरियां देने-दिलाने के मामले में कांग्रेसजनों की आपसी होड़ की खबरें आम हुईं. राजनीतिक सत्ता को निजी आचरण की पवित्रता की कसौटी माननेवाले महात्मा गांधी का मन कुर्सी पर काबिज कांग्रेसजनों के नैतिक विचलन से परेशान हो उठा और इसी परेशानी में उन्होंने कांग्रेस को दफना देने तक की बात कह डाली। वर्ष 1939 के दौर में महात्मा गांधी को ‘हरिजन अखबार’ के अपने कालम में लिखना पड़ा- ‘जो भ्रष्टाचार चल रहा है, कांग्रेस को उसी के बीच खड़ा रखने की जगह मैं उसे इज्जत के साथ दफना देने की हद तक जा सकता हूं।’ निजी आचरण की पवित्रता पर जोर देनेवाले महात्मा का मन उस समय कुर्सी पर काबिज कुछ कांग्रेसजनों के भ्रष्टाचार से क्षुब्ध था।

सरकार ने 1962 में जब भ्रष्टाचार की परख के लिए संथानम कमेटी बैठायी तो उसने अपनी 1964 की रिपोर्ट में भ्रष्टाचार की आलोचना की। कमेटी ने लिखा कि जनमानस की सोच है कि कुछ मंत्रियों में ईमानदारी का अभाव है, जो लोग पिछले सोलह साल से पदों पर काबिज हैं उन लोगों ने गैरकानूनी ढंग से खुद की जेब भरी है, अपने पुत्रों और रिश्तेदारों के लिए भाई-भतीजावाद के जरिए अच्छी नौकरियां जुटायी हैं और सार्वजनिक जीवन की पवित्रता की किसी भी धारणा को ताक पर रख कर अन्य कई किस्म के फायदे कमाये हैं। अब भ्रष्टाचार का यह पुराना विचार आज बुनियादी तौर पर बदल सा गया है, अब भ्रष्टाचार की बात जिम्मेदार व्यक्ति के नैतिक आचरण से जोड़ कर उतनी नहीं देखी जाती,  जितनी रुपये-पैसे के मामले में हुए सरकारी राजस्व के फायदे-नुकसान से। ए राजा का किस्सा इसका सबसे बड़ा प्रमाण है, जिसकी एक बड़ी आलोचना यह कह कर की जा रही है कि राजा के फैसलों से राजस्व को जो घाटा पहुंचा, वह कितने साल के रक्षाबजट या फिर कितने साल के मनरेगा के बजट के बराबर है। यह सही है कि बड़े भ्रष्टाचार का एक सिरा अब भी किसी न किसी मंत्री से जुड़ता है, मगर उसका दूसरा सिरा अब किसी भाई-भतीजे से न जुड़ कर सीधे-सीधे व्यवसायी कंपनियों से जुड़ता है, आम आदमी ठीक से जान ही नहीं पाता कि गलत किस कोण से हुआ है। ए राजा पर कई कंपनियों को फायदा पहुंचाने के आरोप है और अखबार अपने पाठकों को अभी तक यह समझाने में लगे हैं कि आखिर यह टू जी स्पेक्ट्रम है क्या बला?

लेखक रिजवान चंचल रेड फाइल के संपादक और जनजागरण मीडिया मंच के महासचिव हैं.

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