
गोपाल
आज मीडिया किस जगह पहुंच गयी है, ये तो शायद ही किसी से छुपा है. घर घर की कहानी को लोगो के सामने पेश करने में मीडिया को कभी शर्म नहीं आती, उल्टा अपने पीठ को खुद ही थपथपाने में लगी रहती है. पर मुझे एक बात समझ नहीं आती, आखिर क्या सारी बुराइयां सिर्फ लोकतंत्र और राजनीति में ही है, बाकी सबका दामन पाक साफ़ है. आज इस देश के सिस्टम में शायद ही ऐसी कोई व्यवस्था बची है, जो भ्रष्ट नहीं हुई हो, पर मीडिया को और बुद्धिजीवियों को ये सब नज़र नहीं आता है. उस सेमिनार में एक बात आई जिसमे कहा गया की आज के लोकतंत्र का मतलब है कि कुछ चुने हुए द्वारा चलायी जा रही सरकार, जो सिर्फ उन प्रतिनिधियों के लिए ही काम करती हो.
एक आंकड़ा भी पेश किया गया, जिसमे उल्लेख किया गया कि देश के सर्वोच्च संस्थान लोकसभा और राज्यसभा में परिवारवाद और पैसा का ही बोलबाला है. पर ये बात किसी ने नहीं कही कि देश के आज़ाद होने 60 साल के बाद भी देश का मतदान प्रतिशत 60% से आगे नहीं बढ़ पाया और किसी ने कोशिश भी नहीं की इसे बढ़ाने की. ये भी हो सकता है कि मंच पर लोकतंत्र के बारे में जो आग उगलते है, वो भी अपने आप को मतदान करने से वंचित रखते हों! मतदान वाले दिन शायद ही कोई मीडियाकर्मी अपनी ऊँगली में स्याही दिखा पाता है और दूसरों को प्रेरित कर पाता हो मतदान के लिए. अगर ध्यान से देखा जाए, तो समझ आता है कि एक सोची समझी साज़िश के तहत एक वृहद कोशिश चलाई जा रही है, इस देश में राजनीति और लोकतंत्र को बदनाम करने की. ताकि आम आदमी इससे दूर रहने में ही अपनी भलाई समझे.
आज देश की परिस्थिति ये है की नब्बे प्रतिशत लोग राजनीति को गन्दा कहने से भी परहेज़ नहीं करते और उच्च वर्ग और कॉर्पोरेट जगत तो मतदान को भी समय की बर्बादी समझता है. ऐसे में लोकतंत्र का मतलब ही क्या रह जाता है. आज बच्चा जब स्कूल जाता है तो उसके माँ-बाप की एक ही ख्वाहिश होती है कि वो बड़ा होकर डॉक्टर, इंजीनियर, अधिकारी या कोई प्रोफेशनल बनें, विदेश में सेटल हो, डॉलर की कमाई करे. लेकिन क्या कोई माँ-बाप सोचता है कि उसकी संतान देश के सिस्टम के लिए कुछ करे, शायद इसके जवाब में ‘हां’ कभी सुनने को नहीं मिलेगा! क्या कोई बच्चा एमबीए की पढाई करते समय देश में मंत्री या जनप्रतिनिधि बनकर काम करने की सोचता होगा, शायद इस प्रश्न के उत्तर में भी ना में ही मिलेगा. तो अब लोकतंत्र का क्या दोष है, जब काबिल आदमी इस ओर कदम बढ़ायेंगे ही नहीं तो सिस्टम में खराबी आएगी ही.
सारे लोग एक बात जरूर कहते नज़र आते है की राजनीति में तो कोई भी आ सकता है, इसके लिए किसी डिग्री या डिप्लोमा की जरूरत नहीं पड़ती. पर क्या डिग्री या डिप्लोमा पाने के बाद कोई राजनीति में आने की चाहत रखता है, ये सवाल कोई नहीं पूछता. क्या गन्दगी सिर्फ राजनीति में ही है? ये सवाल मैं उन सभी बुद्धिजीवियों से पूछना चाहता हूं, क्या कॉर्पोरेट जगत, मीडिया जगत, शिक्षा जगत या ऐसी सारी जगह पाक साफ़ हैं? इन पर कोई ऊँगली क्यों नहीं उठाता? राखी सावंत के ठुमकों को बेचने वाली मीडिया भी राजनीति के पीछे ऐसे हाथ धोकर पड़ी रहती है, जैसे मानो राखी सावंत से ठुमके लगवाने के लिए भी लोकतंत्र और राजनीति ने ही मीडिया को प्रेरित किया हो. टीआरपी के अंधी दौड़ में भागते भागते आज मीडिया जो परोस रही है, शायद इसकी कल्पना किसी ने भी नहीं की होगी.
कुछ सालों पहले ऐसी कई प्रतिबंधित किताबें छपती थी, जो सभ्य समाज के लिए उपयुक्त नहीं मानी जाती थी, आज वैसी कहानियां सारे चैनलों के लिए प्राइम टाइम खबरें हैं. क्यों इन बुद्धिजीवियों को ये सब नहीं दिखता. शायद इन लोगों ने कसम खा ली है कि देश के लोकतंत्र और राजनीति को इतना बदनाम कर देंगे कि 110 करोड़ से ज्यादा जनसंख्या वाले इस देश में राजनीति में आने वालों का टोटा लग जाए और परिवारवाद का वृक्ष पूरी तरह से इस देश को अपने आगोश में ले ले. मुझे तो इन लोगों के समझदारी पर बड़ा तरस आती है और उनके देशप्रेम के ढोंग से नफरत होती है.
जिस लोकतंत्र के बल पे वे बुद्धिजीवी कहलाते हैं, उसी को दिलखोल कर गाली देते हैं. तो ऐसे में इन बुद्धिजीवियों को देशद्रोही या गद्दार क्यों न कहा जाये! आज वो वक़्त आ गया है, जब युवावर्ग को कमान अपने हाथ ले लेना चाहिए और इन देशद्रोहियो को बेनकाब कर देना चाहिए. इनके विचारों को सिरे से खारिज कर इनसे बुद्धिजीवी कहलाने का हक छीन लेना चाहिए. मीडिया की भी क्या कहे, वो इस युवा वर्ग को बिग बॉस संस्कृति में इस तरह फंसाना चाहती है कि इससे ऊपर उठ कर युवा कुछ देख ही न पाए. एक बड़े पत्रकार ने उसी मंच से एक बड़ी अनोखी बात कही कि तकनीक के साथ संस्कृति भी बदलती है. पर क्या किसी देश की तकनीकी विकास ने उसे मजबूर किया कि वो अपने संस्कृति को बदल दे. इसका उत्तर उनके पास शायद ही होगा?
क्या किसी तकनीक ने मजबूर किया की टीवी पर इमोशनल अत्याचार देखें या स्वयंवर का तमाशा देखें. इस मीडिया को तो किसी जवान के बहते खून में भी सिर्फ टीआरपी दिखती है. तभी तो उसके बहते खून के आगे एक्सक्लूसिव का टैग लगा देते है और उसमें इन्हें कोई शर्म भी नहीं आती. मीडिया कैसे कौडि़यों के भाव बिकने लगी है, इसके तो न जाने कितने उदाहरण हैं, पर मैं जिस प्रदेश में रहता हूं वहां भी मीडिया किसी धंधे से कम नहीं है. इस प्रदेश के चार बड़े मीडिया हॉउस क्रमश: केमिकल, स्टील, पॉवर और कोयले के धंधे में व्यस्त है. कमोवेश पूरे देश का ही हाल ऐसा है, सारे बड़े चैनल किसी न किसी उद्योग को बढ़ावा देने में लगी रहती है. तो फिर क्यों सिर्फ लोकतंत्र को ही निशाना बनाया जाता है, इसमें अगर बुराई है तो अच्छाई भी है. अब देशवासियो पर ये छोड़ दिया जाना चाहिए कि वो तय करे की आखिर लोकतंत्र का असली गद्दार है कौन ?
लेखक गोपाल सामंतो युवा ब्लागर हैं.

