योगगुरु बाबा रामदेव और गांधीवादी समाजसुधारक अन्ना हजारे के आमरण अनशन से देश में कई राय दिखाई पड़ती है. एक तरफ दोनों के आन्दोलन को बड़ी संख्या में देश, समाज, गैरसरकारी संसथान, गैर राजनितिक लोगों, दिग्गज, युवाओं को समर्थन मिला. तो दूसरी और कानून के जानकार, कांग्रेस पार्टी के वरिष्ठ नेताओं का ये मानना है कि अन्ना हजारे और बाबा रामदेव के आन्दोलन से देश के संविधान और पार्लियामेंटरी डेमोक्रेसी को ख़तरा हो सकता है. अन्ना हजारे और बाबा रामदेव जिस तरीके से अपनी मांगें मानने के लिए हथियार अख्तियार कर रहे, वो एक जमाने में महात्मा गांधी ब्रिटिश सरकार के खिलाफ किया करते थे .किन्तु दोनों आन्दोलान में जमींन आसमान का अंतर दिखाई पड़ता है. महात्मा बापू जी ने जिन ब्रिटिशों के खिलाफ आन्दोलान चलाया था उस में देश की आज़ादी ही केवल प्रमुख लक्ष्य था. अन्ना हजारे और बाबारामदेव के आन्दोलन में देश और समाज से ज्यादा खुद की पब्लिसिटी पाने में ज्यादा दिलचस्पी है.
पिछले रविवार को मैं कुछ मीडियाकर्मियों के साथ रालेगनसिद्धि गया. बेशक अन्ना हजारे ने रालेगनसिद्धि को चेहरा बदला है. स्वास्थ सुविधा, गाँव का विकास, पानी की समस्या, पाणलोट क्षेत्र में भी काफी काम अन्ना हजारे ने किया है. किन्तु इससे कई ज्यादा काम महाराष्ट्र के एक समाजसेवी आमटे परिवार और उनसे परिवार के लोगों ने किया है. जिसमे बाबा आमटे, विकास आमटे, मंदाताई आमटे और उनके बेटे शामिल है. गडचिरोली से 200 किलोमीटर दूर हेमलकसा जैसे आदिवासी गाँव में ये काम निरंतर जारी है. जहां काम करना मतलब मौत को गले लगाना है. जैसे की आप सभी जानते हैं कि ये नक्सल प्रभावित क्षेत्र है. किन्तु आमटे परिवार ने कभी भी अपने रसूख का फायदा नहीं लिया. वो निरंतर समाजसेवा का काम कर रहे. राजनीति से उनका दूर दूर तक ताल्लुक नहीं है.
समाजसेवक अन्ना हजारे और बाबा रामदेव बेशक अपने क्षेत्र में अच्छा काम कर रहे है. देश की राजीनीति में अन्ना हजारे और बाबा रामदेव का दखलअंदाजी करना उनके व्यक्तिव्य पर कई सवालिया निशान खड़ा करती है. क्या अन्ना हजारे और बाबा रामदेव को बीजेपी, आरएसएस और हिंदुवादी संगठन आन्दोलन करने के लिए उकसा रही? क्या बीजेपी इसका राजनितिक फायदा उठान में लगी है? क्या बीजेपी को ये बात पता है कि देश के अहम मुद्दों पर कांग्रेस सरकार के खिलाफ जनमत तैयार करना उनके लिए टेढ़ी खीर साबित हो रही है? क्या अन्ना हजारे और बाबा रामदेव को आगे करके अगले साल उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव के लिए बीजेपी-आरएसएस इसका राजनीतिक फायदा उठाना चाहती है? क्या देश में बढ़ती बेरोज़गारी, महंगाई, पेट्रोल-डीज़ल के बढ़ते दाम को जन-आन्दोलन में परिवर्तित करने में बीजेपी विफल हुई है? क्या बीजेपी को कोई ऐसे चहरे की तलाश थी जिसका चरित्र साफ़ है? इन सभी सवालों का जवाब हमें हां में मिलता है.
समाजसेवक अन्ना हजारे के कारण देश में सूचना के अधिकार का कानून आया इसको कोई नकार नहीं सकता. लेकिन दोनों कानूनों में जमीन आसमान का अंतर है. भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ने के लिए हमारे देश में कानून है. जिसको केवल सख्ती से अमल में लाने की जरुरत है.जनलोपाल बिल का ड्राफ्ट पढ़ने से पता चलता है कि ये बिल देश के डेमोक्रेटिक सिस्टम एवं संविधान को आने वाले समय में ख़तरा उत्पन्न कर सकता है. क्यूं कि इस कानून में कई ऐसे प्रावधान है जिस से हमारा लोकतंत्र खतरे में आ सकता है.
अन्ना हजारे और बाबा रामदेव दोनों भी पब्लिसिटी के लिए कुछ भी कर गुजरने के लिए तैयार हैं. जिस लोकपाल बिल को लेकर अन्ना हजारे आमरण अनशन पर बैठे थे और उनको लोकपाल बिल के ड्राफ्टिंग कमिटी का मेम्बर बनाना हमारे संविधान और पर्लियामेंटरी डेमोक्रेसी के खिलाफ है. क्यूं कि ये देश के दोनों सदन के ना तो सदस्य हैं, ना ही किसी राजनीतिक पार्टी के मुखिया. ये सबको पता है कि जब देश का संविधान बनाने की बात आई तो संविधान के निर्माता को ड्राफ्टिंग कमिटी के चेयरममैन पद पर नियुक्त करने के लिए किसी सदन का सदस्य होना जरुरी था. डॉ. अम्बेकर किसी सदन का सदस्य नहीं होने के कारण उनको महाराष्ट्र के भंडारा जिले से चुनाव लड़ना पडा. जब चुनाव में हार गए तो पश्चिम बंगाल से चुनाव लड़के जितना पडा. फिर कहीं जाकर उनको देश के संविधान की ड्राफ्टिंग कमिटी का चेयरमैन बनाया गया. अब यहाँ सवाल ये उठता है कि क्या अन्ना हजारे, प्रशांत भूषण, अरविन्द केजरीवाल, शांतिभूषण को लोकपाल बिल जैसे देश के महत्वपूर्ण बिल के कमिटी का सदस्य बनाना हमारे देश के संविधान और लोकतंत्र के खिलाफ नहीं है? क्या किसी ऐसे आदमी को लोकपाल बिल जैसे कमिटी में रखना देश की पर्लियामेंटरी डेमोक्रेसी की धज्जियां उड़ाने जैसा कदम नहीं है?
वर्ष 1942 में महात्मा गांधीजी द्वारा ब्रिटिश सरकार के खिलाफ चलाया गया आन्दोलन, सत्याग्रह केवल अहिंसात्मक रास्तों से चलाया गया आन्दोलन था. उस में किसी भी तरीके से अलोकतांत्रिक मांगें नहीं रखी गई थीं. लेकिन अन्ना हजारे और बाबा रामदेव द्वारा की जा रही मांगें अलोकतांत्रिक ही नहीं देश के संविधान और पर्लियामेंटरी डेमोक्रेसी के खिलाफ है. तो क्या अब अन्ना हजारे और बाबा रामदेव देश को चलाने वाले हैं?
लेखक सुजीत थमके पुणे में पीआरओ के रूप में कार्यरत हैं.

