मैं और वेश्या
थोड़ा सा भ्रमित हूं। आज से नहीं बल्कि उसी दिन से जब से अखबार की नौकरी शुरू की। अब इससे पहले की पूरी तरह
भ्रमित हो जाऊं, सोचा अपने खयालों को सबके साथ बांट लूं। भ्रम मेरे पत्रकार होने को लेकर है। दरअसल, मुझे जानने वाले सभी लोग मुझे पत्रकार ही मानते हैं। एक बड़े अखबार में काम करता हूं और मेरे पदनाम के साथ संपादक जैसा विशेषण लगता है, शायद इसलिए। लेकिन जिसे ठीक कहा जा सकता है, वह बस इतना ही है। इसके आगे-पीछे, अगल-बगल, ऊपर-नीचे जो कुछ भी है, वह सब गड्मड् हो चुका है। कैसे, अभी बता देता हूं।
दिक्कत ये है कि इन दिनों मुझे अखबारों और चैनलों से जुड़े जितने भी स्वनामधन्य पत्रकार हैं, उन सबमें अपनी शक्ल दिखाई देती हैं, अजीब-व-गरीब सी। इस शक्ल पर दिल और दिमाग का खोखलापन साफ झलकने लगा है क्योंकि संवेदनाएं खत्म सी हो चुकी हैं। बाजारवाद और व्यावसायिकता की दौड़ में शरीर भी खोखला हो चला है। इस खोखलेपन के साथ हावी हो चली हैं कुंठाएं।
पत्रकार या संपादक होने का अभिमान मुझ पर इस कदर हावी हो गया है, कि अपनी ही शिष्या के यौन शोषण की बात न सिर्फ सोच लेता हूं बल्कि उसकी कोशिश भी कर डालता हूं। अपने कुकृत्य पर पर्दा डालने के लिए उस छात्रा को न सिर्फ धमकाता हूं बल्कि करियर खत्म करने की चेतावनी भी दे डालता हूं। इसके चन्द रोज पहले जब पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को वेंटिलेटर पर रखा गया तो उनके निधन की आशंका में पूर्व तैयारी के नाम पर पेज बनाकर रख लेने वाला संपादक और उप संपादक मैं ही हूं। अब जब वाजपेयी का वेंटिलेटर हटाया गया तो मायूसी के साथ यह कहने वाला भी मैं ही हूं कि अरे यार पूरी तैयारी खराब हो गई। कोई पूछेगा कि इस तरह की पूर्व तैयारी की जरूरत ही क्या थी तो इसका सीधा सा जवाब है कि मेरा दिवालिया दिमाग ऐन मौके पर किसी विपरीत परिस्थिति में बेहतर प्रोडक्ट बाजार में नहीं ले जा सकता। प्रोडक्ट पिटा तो मेरी नौकरी पर भी बन आ सकती है।
मेरी महिमा अभी यहीं खत्म नहीं होती। आगे सुनिए। खबरें लिखने और रोकने के बदले बड़े-छोटे स्तर की दलाली खाना मेरे बाएं हाथ का खेल है। इसकी एक बानगी यूं है कि कानपुर से प्रकाशित एक बड़े अखबार के संपादक के तौर पर मैंने अपने एक रिपोर्टर की खबर को बड़ी बेशर्मी से यह कहकर रोक लिया कि इस घोटाले से जिस संस्था को लाभ हुआ है, उससे अखबार के लिए एक करोड़ का विज्ञापन मांगा जाएगा। रिपोर्टर को यकीन दिलाया कि ऐसा अगर हुआ तो संस्थान का प्रबन्धन उससे और मुझसे बहुत खुश हो जाएगा। मैं जानता था विज्ञापन नहीं मिलने वाला लेकिन मैं यह भी जानता था कि क्या मिलने वाला है। उत्तर प्रदेश औद्योगिक विकास निगम में 11 करोड़ के घोटाले की यह खबर लाने वाला रिपोर्टर भी जानता था कि क्या होने वाला है और क्या हुआ है। यही वजह थी कि उस रिपोर्टर ने उस दिन के बाद से फील्ड में जाना ही छोड़ दिया लेकिन मुझे क्या फर्क पड़ता है इससे कि एक पत्रकार उभरने से पहले ही निपट गया।
चंडीगढ़ में अपने संपादकीय सहयोगियों को पैर की जूती समझने वाला दंभी संपादक भी मैं ही था और जयपुर में राजनेताओं के आगे अपनी कलम का समर्पण करने वाला संपादक भी मैं ही हूं। अपनी कुंठाएं शान्त करने के लिए संपादकीय विभाग के कुछ पुरुष सहयोगियों के साथ शारीरिक संबंध बनाकर उन्हें उचित-अनुचित लाभ दिलाने वाला संपादक भी मैं हूं और खबरें छापने न छापने के लिए 100 रुपए से लेकर लाखों की दलाली खाने वाला रिपोर्टर भी मैं ही हूं। इसके बहुत पहले 2003 में विधानसभा चुनाव के दौरान भोपाल में उमा भारती के लिए कांग्रेस की जासूसी करने वाला मठाधीश मैं ही था। अपनी इस सेवा के बदले उमा ने मुख्यमंत्री बनते ही मुझे एक कैमरा मोबाइल और क्वालिस गाड़ी से नवाजा था। अपने मालिकों को जयपुर-इन्दौर में करोड़ों की जमीन पर अवैध कब्जा और दारू के ठेके और छत्तीसगढ़ में कोयले की खदानों पर वैध-अवैध खदानें दिलवाने वाला कथित पत्रकार भी मैं ही था।
टीवी चैनलों में भी मैं ही हूं। एक बड़े चैनल में वह संपादक मैं ही था, जिसके बारे में कहा जाता है कि वह बाथरूम में उसी चैनल की एक टीवी एंकर के साथ आपत्तिजनक अवस्था में पकड़ा गया था। दूसरे टीवी चैनल पर मैं देश-दुनिया के सामने लालू यादव से बातचीत करते हुए यह दंभ भर रहा था कि जिस तरह से वे भारतीय रेल को पटरी पर लाने की जिम्मेदारी उठा रहे हैं, उसी तरह मैं भी चैनल को पटरी पर लाने की जिम्मेदारी के बोझ से दबा पड़ा हूं। मैं खुद इन चैनलों में अखबारी पत्रकारिता करते हुए आया हूं लेकिन किसी अन्य को ऐसा करने की इजाजत कभी नहीं देता। अगर कोई अखबार से न्यूज चैनल में आने की गुस्ताखी कर भी देता है तो उसे छह-आठ महीनों में गालियां दे-देकर, उसकी अखबारी पत्रकारिता वाली मानसिकता पर लानत भेज-भेजकर उसे चैनल से रुखसती लेने पर मजबूर कर देता हूं। अपने चैनल पर एक ही खबर को घसीट-घसीट कर दिन भर दिखाने वाला और बड़े सेलिब्रिटीज के छींकने-खांसने की खबरें भी ब्रेकिंग न्यूज की तरह दिखाने वाला संपादक मुझमें ही कहीं है।
टीआरपी बढ़ाने के लिए सॉफ्ट पोर्न, अपराध जगत का नाट्य रूपान्तरण टाइप की खबरें चलाने-दौड़ाने से भी मैं नहीं चूकता। अब इनसे आने वाली पीढ़ी की मानसिकता विकृत हो तो हो, मुझे क्या फर्क पड़ता है। मालिक के सामने मेरे नंबर तो बढ़ रहे हैं न। राज्यसभा सांसद बनने और पद्मश्री अवार्ड पाने के लिए बन्द कमरों में नेताओं के पैरों पर लोट लगाने वाला मैं हूं और बाहर आकर मूल्य आधारित पत्रकारिता, नैतिकता की दुहाई देते हुए इस पेशे में नई पीढ़ी के पतन पर चिन्ता जताने वाला भी मैं। `मैं अनन्त, मेरी कथा अनन्ता…बानगियां इतनीं हैं कि मैं बताते-बताते थक जाऊं और आप सुनते-सुनते। सो वापस लौटता हूं अपने भ्रम पर, जिसके बारे में आप समझ गए होंगे कि यह भ्रम मुझमें मेरे क्रियाकलापों से ही उपजा है। उपज तो गया लेकिन दूर कैसे हो, यह समझ नहीं आ रहा, इसलिए जो कुछ भी था सबको सच-सच कह सुनाया ताकि आप यह बता सकें कि मैं क्या से क्या हो गया हूं। क्या मैं कहीं किसी कोने से भी पत्रकार रह गया हूं।
कई बार मुझे तो अपनी दशा उस वेश्या से भी गई-गुजरी लगती है जो हर शाम पाउडर लिपिस्टिक लगाकर अपने ग्राहकों को लुभाने के लिए दरवाजे पर खड़ी हो जाती है। रात भर अपनी अस्मत लुटाकर अपना और अपने से जुड़े लोगों का पेट पालती है लेकिन दिन हो या रात, वह अस्मत के साथ अपनी संवेदनाएं नहीं लुटाती। दूसरों के दुख से उसे तकलीफ होती है। जरूरत पड़ने पर गैरों की मदद से भी नहीं चूकती। किसी के मरने से पहले उसके मरने की कामना में तैयारियां नहीं करती। इसकी देह की दलाली दूसरे खाते हैं लेकिन अपने काम के लिए यह खुद कभी दलाली नहीं खाती। लेकिन मैं ठप्पे के साथ इसी तरह के सब काम करता रहता हूं और खुद को मूर्धन्य विद्वान, पत्रकार, साहित्यकार वगैरह की श्रेणी में शुमार मानता हूं। हकीकत में मैं क्या हूं, आप खुद ही तय करें और हो सके तो मुझे भी बता दें।
लेखक नीलेश कुमार राजस्थान पत्रिका, जयपुर में स्पेशल सेल में सीनियर सब एडीटर हैं। इनसे संपर्क 09928638244 के जरिए या फिर [email protected] के जरिए किया जा सकता है।

