वर्ष 2010 को विदा करने के साथ-साथ नये वर्ष का आगाज हो चुका है। नई उम्मीदों, नये सपनों को लेकर साल 2011 हमारे सामने है। अब बीते एक वर्ष के समीक्षा कर नये समय के लिए ठोस योजना बनाने का समय है। पर जब समीक्षा करनी हो तो सिर्फ एक साल की क्यों नवोदित राज्य उत्तराखण्ड के दस साला जीवन की क्यो न हो। बीते दस वर्षों में उत्तराखण्ड ने काफी उथल-पुथल देखी। राज्य की स्थापना के पीछे पहाड़ की अस्मिता को बचाने की सोच थी। पहाड़ के संसाधनों का दोहन यहां के समुचित विकास के लिए हो, जल, जंगल, जमीन, पर स्थानीय जनता का हक कायम रहे। सरकारी नीतियां सरल व सहज हों। आम आदमी को राजकीय कार्यों में सहजता लगे। पलायन कम हो रोजगार के अवसरों में वृद्धि हो। हाशिये पर जी रहे समुदायों को उचित अवसर मिले। आदि कई मुद्दे थे जिनके आधार पर 2000 में उत्तराखण्ड का गठन किया गया। आन्दोलनकारियों की शहादत और राज्य निर्माण के सपने कहीं धूमिल से हो गये। बीते एक दशक में भाजपा, कांग्रेस, यूकेडी की खुली लूट ने आम आदमी को हतप्रभ सा कर दिया। बेतहाशा गति से पदों की बंदरबांट, जमीनों का सौदा, माफियाओं को संरक्षण, ठेकेदारी और कमिशनखोरी जैसी गतिविधियों ने उत्तराखण्ड को आन्तरिक तौर पर झकझोर दिया।
विकास के तमाम सरकारी दावे खोखले साबित हुए। नवोदित राज्य को सर्वशिक्षा अभियान से जोड़ा गया। लेकिन आज भी दर्जनों प्राथमिक विद्यालयों की हालत जीर्ण-शीर्ण है। हालिया प्राकृतिक आपदा में सबसे अधिक नुकसान सरकारी स्कूलों को उठाना पड़ा। स्कूलों से शिक्षकगण नदारत रहने लगे और भाड़े के मास्टर साहब नौनिहालों का भविष्य दांव पर लगाने की पुरजोर कोशिश कर रहे हैं। स्वास्थ महकमे की हालत बेहद नाजुक है। केन्द्र सरकार द्वारा संचालित आशा कार्यकत्री योजना का मजाक उड़ाया जा रहा है। अस्पताल तो हैं पर दवाईयां, नहीं। मशीनें हैं भी तो स्टॉफ गायब। स्वास्थ महकमे की खस्ता हालत में 108 सेवा ने थोड़ा बहुत पैबंद जरूर लगाये हैं। हालिया 2010 की आपदा राहत राशि को जिस प्रकार हवाई दौरों में उड़ाया गया वह तो जग जाहिर है। खैर अपने नेतागणों ने विगत एक दशक में उत्तराखण्ड को उजड़ाखण्ड बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी।
आज देहरादून से लेकर दूर-दराज के गॉव तक तमाम छोटे-बड़े नेताओं की पौ-बारह हो रही है। जिसकी सरकार उसको ठेके, विधायक, सांसद निधि का बजट गधेरों और रास्तों में खर्च हो रहा है। मनरेगा की हालत और भी दयनीय है। विकासखण्ड स्तर पर मनरेगा को लेकर ग्राम प्रधानों के साथ प्रशिक्षण हुआ होता तो गॉव स्तर पर विकास अवश्य होता, पर 90 प्रतिशत प्रधानों को तो मनरेगा के बारे में जानकारी तक नहीं है। यानी विकास का मॉडल कैसा हो इस प्रश्न पर सरकार, प्रशासन, प्रतिनिधि सब मौन साधे हुए हैं। जिसे जहां से मौका मिला वह शुरू हो गया लूटने में।
उनकी ऊंगलियों में कीमती नगों की चमक और बैंक बैलेंस की दमक ने राज्य को कितना घाटा दिलाया है, इस बात पर न तो कोई बोलता है न ही हमारा मीडिया तंत्र अपना लालची मुंह खोलता है। चलो जब जिक्र आ ही गया तो बात पत्रकार मित्रों की भी होनी चाहिए। दैनिक अखबार के पत्रकारों से तौबा, इनमें से अधिकांश मित्रों ने दीन-इमान जैसे शब्द अपनी जीवन शैली से ही हटा दिये हैं। रही बात साप्ताहिक और मासिक, पाक्षिक पत्रों की तो ये तो हर हफते एक नई छप रही है। कुछ दो-चार पत्र-पत्रिकाओं को छोड़ दें तो अन्य की हालत कुछ यूं है। कई सारे पत्रकार मित्र महीने में एक अदद पत्रिका प्रकाशित करवाने के लिए नेताओं, ठेकेदारों, अधिकारियों, ऊंचे रसूखदारों के आगे-पीछे मडराते नजर आते हैं कि अल्ला के नाम पर एक विज्ञापन दे दे वर्ना देख लेना अगला अंक…। अब ऐसे में क्या खबर क्या खबर की बात। हमारे माननीय नेतागण, अधिकारी, कर्मचारी, ठेकेदार भ्रष्टता की हदों को पार करते हुए अपनी जीवन आलीशान बनाने में जुटे हैं तो हमारी जिम्मादार मीडिया बिरादरी के कुछ भ्रष्ट पत्रकार बन्धुओं ने कौन सी क्रांति ला दी है। कलम, कैमरा, माइक की ताकत का इस्तेमाल ठीक-ठीक नहीं होगा तो मीडिया से बहुत जल्द जनता का विश्वास उठ जायेगा जो धीरे-धीरे उठ ही रहा है।
बीते 10 वर्षों में गैर-सरकारी संगठनों ने भी राज्य को दीमक की तरह चाट लिया है। पानी का संरक्षण, वृक्षारोपण, शिक्षा, खेती-बाड़ी, महिला शक्ति, दलित उत्थान, जलवायु परिवर्तन, वैकल्पिक राजनीति, महिला स्वास्थ, बाल अधिकार, जैसे कमाऊ मुद्दों पर काम करने वाली गैर सरकारी संस्थाओं ने करोड़ों के वारे-न्यारे कर दिये। आज राज्य में दो तरह के गुट संस्था संचालन की फेहरिस्त में हैं। एक तरफ ब्यूरोकेट्स, बुद्धिजीवियो की जमात है जो विशुद्ध रूप से अंग्रेजियत में रचे-बसे हैं। दूसरी तरफ ठेकेदार, दुकानदारों की जमात है। इन दोनों जमात ने जनता की आंख में धूल झोंकी है बस तरीके और प्रोजेक्ट का फर्क है। लूटा दोनों ने है। अभी पिछले सप्ताह क्लाइमेट चेंज पर हुई राष्टीय सेमीनार में लाखों का बजट प्रतिभागियों को सिर्फ यह बताने में खर्च किया कि दुनियां गर्म हो रही है। ग्लेशियर पिघल रहे हैं। संस्थाओं के कार्यकर्ता 200 की जगह 700 का यात्रा भत्ता बनाते देखे गये। लेकिन इसमें कार्यकर्ताओं का दोष नहीं है। वो तो जैसा देखते हैं उसी का अनुकरण कर लेते हैं। और इतना एडजस्ट तो करना ही पड़ता है। अरे इन बेचारे स्वयं सेवियों की छोड़ो जरा उन ऊंचे रसूख वाले संस्था संचालकों के बारे में सोचिये जो किराये की एसी कार से भारत भ्रमण कर लेते हैं और बिल चिपकाते हैं फंडदायी एजेंसी पर। इस तरह की फर्जीवाड़ा कम्पनियों से समाज के भले की उम्मीद करना व्यर्थ है।
सच में उत्तराखण्ड बहुत दयनीय और दर्दनाक स्थिति से गुजर रहा है। इस पर दरकते पहाड़ और डूबती घाटियों का दर्द भी है, जो सोचने पर विवश करता है। कि क्या यही है जीत बहादुर गुरंग की शहादत का उत्तराखण्ड, क्या यही है बेलमती चौहान और हंसा धनाई की शहादत का राज्य। यदि ऐसा ही नया राज्य चाहिए था तो यूपी में हम क्या बुरे थे। हमारे शीर्षस्थ नेताओं के चरित्र खराब हो गये हैं। उनकी नीयत बदलने लगी है। वर्ना शहीदों की शहादत का और आम जन के सपनों का उत्तराखण्ड इतनी दयनीय हालत में न होता।
लेखक विपिन जोशी पत्रकार हैं तथा बागेश्वर के रहने वाले हैं.

