एक टेलीविजन पत्रकार ने दरियागंज, दिल्ली के सर्वोदय कन्या विद्यालय की एक शिक्षिका उमा खुराना के खिलाफ वे तमाम सबूत जुटाये थे जिसमें वह साबित करने में सफल रहा कि वह अपनी छात्राओं को बहला फुसलाकर उनके अश्लील एमएमएस बना लेती थी। बाद में वह छात्राओं को वेश्यावृत्ति में शामिल होने को बाध्य करती थी। इस खुलासे से भड़की हिंसा को शांत करना दिल्ली पुलिस के लिए बेहद मुश्किल साबित हुआ। बाद में उस शातिर खबरची की कारगुजारी सामने आयी। पूरा स्टिंग ऑपरेशन उस पत्रकार के खुराफाती दिमाग की उपज थी, जो खबरों से खेलने का शौकीन रहा है। इस सच को आज पूरी दुनिया जानती है।
पत्रकारिता में वह टेलीविजन पत्रकार न तो आश्चर्य है और न ही शर्म। चूँकि स्टिंग ऑपरेशन तो धोखे का ही खेल है,जो किसी को विश्वास में लेकर उसके सच को उजागर करने की एक संस्थागत साजिश होती है। इस वजह से उसके जैसे लोग चाहे-अनचाहे ‘सबसे तेज’, ‘आपको रखे आगे’, ‘खबर हर कीमत पर’ जैसे महायुद्ध में वीर अभिमन्यु और दुस्साहसी घटोत्कच माने जाते हैं। यह सच है कि स्टिंग की जब छीछालेदर होती है तो ऐसे घटोत्कच ‘वीरगति’ पाते हैं। स्टिंग ऑपरेशन खबरिया चैनलों के लिए विवशता बन चुके हैं। बल्कि ये दृश्य माध्यमों के लिए संजीवनी हैं,मकर ध्वज हैं जो उनमें प्राण फूँकते हैं। उन्हें ऊर्जस्वी और तेजस्वी बनाते हैं। तभी तो हफ्ते-पखवाड़े के अंदर किसी न किसी समाचार चैनल पर किसी न किसी की थूकम फजीहत का बंदर तमाशा दिखाता कोई न कोई मदारी सबसे पहले की डुगडुगी पीट रहा होता है। वह सूचना जगत में ताकत की गोलियाँ बेचनेवाला एक सफल नीम-हकीम बन जाता है।
खुलासे का खेल कोई नया नहीं है। भंडाफोड़ पत्रकारिता की जननी टेलीविजन पत्रकारिता नहीं है। खबरों के बाजारवाद की होड़ में इसके बगैर टिकाऊ नाम की कल्पना बेमानी बात हो चुकी है। अमेरिका में 19वीं सदी के आखिरी पहर में न्यूयार्क वर्ल्ड और न्यूयार्क जर्नल के बीच जब व्यावसायिक शत्रुता मची थी तो जोसफ पुलिव्जर और विलियम रेनडोल्फ हर्ट्स जैसे खबरिया जगत के महानायकों ने स्कैंडल, दुष्प्रचारों, अफवाहों और सनसनी की शैली में खबर परोसने का काम शुरू किया। इसका तात्कालिक प्रभाव उन पत्रों की बेतहाशा वृद्धि के रूप में सामने आया। इसके बाद समाचार पत्रों के अर्थशास्त्र में इन हथकंडों को अपनाना बेहद जरूरी समझा जाने लगा। तभी से अफवाहों को नमक-मिर्ची लगाकर समाचार पत्र छापने में विश्व के प्राय: सारे अखबार समूह जुट गये। यहीं से पीत पत्रकारिता की शुरुआत हुई।
पीत पत्रकारिता प्रतिद्वंदिता का नतीजा है। मगर यह इंसान की उस कुत्सित मानसिकता की भी उपज है जो किसी उमा खुराना नामक अबला को सड़कों पर भीड़ द्वारा पीटे जाने, उसके कपड़े फाड़े जाने से आत्म मुदित होती है। वह सड़क पर लुटती पिटती इंसानियत को बचाने के बजाय कैमरे से कयामत ढ़ाने में मशगूल रहती है। जेम्स एडवर्ड राजर्स ने अपनी पुस्तक अमेरिकन न्यूज पेपर्स`में इसी मानसिकता के बारे में लिखा है कि मानवीय विचारों के सांस्कृतित पहलुओं को तो गौण स्थान दिया जाता है, इससे समाज की नैतिकता पर जो प्रभाव पड़ता है वह सनसनी के प्रति अनुराग और विशुद्ध भौतिक पदार्थों में दिलचस्पी की दिशा तय करता है।`इससे जो मानसिकता बनती है वह येन-केन प्रकारेण आगे बढ़ने की संस्कृति का पालनहार बन जाती है। इस संस्कृति से जुड़ी पत्रकारिता का स्वरूप बड़ा ही वीभत्स है जो जज्बा के बदले जुगाड़ करने को उकसाता है। खास तौर से इस तरह की पत्रकारिता युवा पीढ़ी को प्रतिबद्धता और प्रामाणिकता से दूर करने से भी बाज नहीं आती। एक युवक पत्रकार इसलिए बनता है क्योंकि वह चैनल के ग्लैमर्स से बुरी तरह प्रभावित हो जाता है। वह किसी रिपोर्टर को यह कहते सुनता है कि मेरे उनसे`व्यक्तिगत ताल्लुकात है। वह पत्रकारों को सत्ता के गर्भगृह में घुसते देखता है, हर जगह पत्रकार की पहुँच देखता है तो उसे पत्रकारिता समाज का सबसे प्रभावशाली और पैसा कमाने का सर्वशक्तिशाली पेशा लगता है।
आज हालात बेहद भयावह और चिंताजनक है। स्टिंग के मौसेरे भाई ब्रेकिंग न्यूज ने समाज को हिंसक और उत्पाती बनाया है। ऐसी घटनाएँ आम हो चुकी हैं कि दुर्घटना के बाद संयम बरते जाने के बजाय भीड़ इस वजह से बेकाबू हो जाती है, क्योंकि भीड़ को चैनल रिपोर्टर यह कहकर भड़काते हैं कि हिंसक विजुएल दिखाये जाने से शासन-प्रशासन सक्रिय होगा। पिछले महीने आगरा में हिंसा भड़कानेवाले टीवी पत्रकार ही थे। उसके पहले वाराणसी में आंदोलित वेंडर्स को जहर पीकर विरोध प्रकट करने की सलाह देने वाले पत्रकार ही थे। उल्लेखनीय है इसमें पाँच वेंडर्स जहर पीने से मर गये थे। अगस्त महीने में शिलांग (मेघालय) के एक अंग्रेजी पाक्षिक ने गारो पहाड़ियों में दुधारू पशुओं की तस्करी में प्रशासन की कथित भूमिका का खुलासा जिस गंभीरता से किया, उससे स्थानीय आबादी भड़क उठी। बाद में पत्र ने खंडन छापकर इस मामले से अपना पल्ला झाड़ लिया। उत्तराखंड आंदोलनकारियों में शामिल कुछ महिलाओं के साथ रामपुर तिराहे क्रासिंग के समीप पुलिस द्वारा छेड़छाड़ पर जिलाधीश अनंत कुमार सिंह के छपे वक्तव्य पर जमकर बवेला मचा। अपनी टिप्पणी में जिलाधीश ने उक्त छेड़छाड़ को इस दलील के साथ जायज और सामान्य घटना माना था क्योंकि अकेले में कोई भी व्यक्ति वही व्यवहार किसी औरत के साथ करेगा जैसा पुलिसवालों ने किया। बाद में तहकीकात से यह बात सामने आयी कि जिलाधीश ने कोई साक्षात्कार किसी पत्रकार को दिया ही नहीं। उल्लेखनीय है कि पिछले महीने ही आरोपी पत्रकारों और उक्त समाचार पत्र के प्रकाशक को अदालत ने दोषी पाया और उनहें जेल भेजने का आदेश भी दिया है।
आज के पत्रकार अपेक्षाकृत अधिक दुस्साहसी बन चुके हैं। बंगलोर में जन्में किसी गौतम प्रसाद ने राष्ट्रपिता के रूप में नंगा होकर जो नृत्य किया, उसे दो राष्ट्रीय समाचार चैनलों ने प्रमुखता से दिखाया। “लीलता और अश्लीलता के बीच के अंतर को पाटते पत्रकार समाज और सत्ता में अपनी ऐसी दखल चाहते हैं जिन पर न तो सरकार का और न ही न्यायलय का नियंत्रण हो। खबरों के आखेटक हकीकत जैसी खबर, सब की खबर ले सबको खबर दे`और आपको रखे आगे`का दमामा पीटते हुए बेडरूम से लेकर बाथरूम में ताकने-झाँकने को अपने पेशे का फर्ज मानते हैं। मगर उन्हें शायद ही इस बात का अहसास हो कि पत्रकारिता का मूल उद्देश्य आज कहीं खो गया है। अब चाहे भूख एवं बीमारी से मरे लोगों की लावारिश लाश बहाने की घटना की तस्वीर कालाहांडी का कोई पत्रकार छापकर वाहवाही बटोरे और बाद में यह पता चले कि उक्त तस्वीर दो साल पुरानी है या बोस्निया त्रासदी में सर्बिया मनमानेपन को उजागर करते हुए क्रोसियाई सैनिकों की जुल्मी गतिविधियों पर चुप्पी साधनेवाले पत्रकार न जाने किसका भला कर रहे हैं- देश का, समाज का, पत्रकारिता का या फिर अपना।
पत्रकारिता के जरिए अभी बहुत कुछ होना बाकी है। याद करें, बीती सदी में एक अमेरिकी ‘युद्वपोत मायनी’ के क्यूबा जाते वक्त दुर्घटनाग्रस्त होने के बाद इस घटना के पीछे स्पेन का हाथ बताया गया। त्वरित प्रतिक्रिया में स्पेन के उपनिवेश पर अमेरिका ने कब्जा कर लिया। मगर बाद में पता चला कि यह खबर पीत पत्रकारिता के जरिए फैली है। युद्व के लिए भड़काने वाली सनसनीखेज पत्रकारिता की चपेट में उमा खुराना का आना महज घटना है। उमा जी साधन हैं, साध्य नहीं। समाज में चलने वाले न जाने कितने पत्रकार अभी क्या-क्या कर गुजरेंगे, यह तो भविष्य बतायेगा। खबरों से खेलने की दुष्प्रवृत्ति समाज को अपराध अपनाने को बाध्य कर दे, समाज में सनसनी फैला दे और खुद आतंक का पर्याय बन जाये, तो लोकतंत्र के रथ का पहिया अराजकता के कीचड़ में फंसेगा ही। यदि पत्रकारिता का यही हाल रहा तो वह दिन दूर नहीं जब हमें निहबले की उस टिप्पणी को अपने देश के संदर्भ में स्वीकार करने की विवशता होगी कि ‘न्यूयार्क के प्रशांत तट तक पढ़े जाने वाले समाचार पत्रों से संसार का कोई भी सभ्य देश संतुष्ट नहीं है।’
अमरेंद्र किशोर स्वतंत्र पत्रकार हैं। दिल्ली में रहते हैं। भारत समेत दक्षिण पूर्व एशिया के कई देशों के जनजातीय समाज के बीच रहकर इन्होंने कई महत्वपूर्ण शोध कार्य किया है। आदिवासियों से संबंधित कई वृत्तचित्र के निर्माण में इनकी भूमिका रही है। उड़ीसा की अनब्याही माताओं पर उनकी पुस्तक ये माताएं अनब्याही इन दिनों चर्चा में है। अमरेंद्र से संपर्क करने के लिए आप उन्हें [email protected] पर मेल कर सकते हैं या फिर 09810747000 पर काल कर सकते हैं।

