Connect with us

Hi, what are you looking for?

Local News Community

मीडिया मंथन

खबर की कीमत और पत्रकारिता का स्‍याह पन्‍ना

तांत्रिक: एक पत्रकार का दर्द : इसके लिये वो महिला को नग्न करता था : बदमाश मुझ पर भूखे भेडि़यों की तरह टूट पड़े : इस बार मुझसे इस्तीफा ले लिया गया : मीडिया जब भी अपना मुंह खोलता है या अपनी कलम से बोलता है तो अपने लिए नहीं बल्कि इस गूंगे-बहरे समाज के लिए. एक मीडियाकर्मी के लिए ख़बर की चाहत जुनून के किस हद तक होती है, इस सवाल का जवाब पत्रकार बंधु अच्छी तरह जानते हैं. समाज का दर्द हम देख नहीं सकते और अपने दर्द में कभी उफ तक करना हमें मंजूर नहीं होता. कुछ दर्द ऐसा भी होता है जो बदलते समय के साथ और गहरा होता जाता है. और कई बार यही दर्द जेहन से निकल कर कागज के पन्‍नों पर उतर आता है. और फिर पन्‍ना कभी कभी बहुत सीख दे जाता है. मैंने भी इन पन्‍नों से बहुत कुछ सीखा है. इन्‍हीं यादों का झरोखा आज मैं खोलने को मजबूर हुआ हूं.

तांत्रिक

तांत्रिक: एक पत्रकार का दर्द : इसके लिये वो महिला को नग्न करता था : बदमाश मुझ पर भूखे भेडि़यों की तरह टूट पड़े : इस बार मुझसे इस्तीफा ले लिया गया : मीडिया जब भी अपना मुंह खोलता है या अपनी कलम से बोलता है तो अपने लिए नहीं बल्कि इस गूंगे-बहरे समाज के लिए. एक मीडियाकर्मी के लिए ख़बर की चाहत जुनून के किस हद तक होती है, इस सवाल का जवाब पत्रकार बंधु अच्छी तरह जानते हैं. समाज का दर्द हम देख नहीं सकते और अपने दर्द में कभी उफ तक करना हमें मंजूर नहीं होता. कुछ दर्द ऐसा भी होता है जो बदलते समय के साथ और गहरा होता जाता है. और कई बार यही दर्द जेहन से निकल कर कागज के पन्‍नों पर उतर आता है. और फिर पन्‍ना कभी कभी बहुत सीख दे जाता है. मैंने भी इन पन्‍नों से बहुत कुछ सीखा है. इन्‍हीं यादों का झरोखा आज मैं खोलने को मजबूर हुआ हूं.

ये बात कुछ साल पहले की है. मैं उस समय एक टीवी न्यूज़ एजेंसी में काम कर रहा था. मेरे लिये ये सौभाग्य की बात थी पूरे जिले में मै अकेला टीवी पत्रकार था, पर परेशान कर देने वाली बात ये थी, काफी हाथ-पांव मारने के बाद भी मेरे हाथ महीने में महज पांच-छह ख़बरे ही लग पाती थी। खबरों के लिए कई बार तो सैकडों किलोमीटर का सफर भी तय करना पडता था. लेकिन न कभी रास्ते छोटे हुए और ना ही मेरी हिम्मत कम हुई. ख़बर खोजने की चाहत में मैं हमेशा अपने कान और आंख खुली रखता, एक बार अचानक मेरे हाथ एक ऐसा कागज लगा जिसमे लिखा था हर समस्या का समाधान है हमारे पास, साथ ही ये भी कि वो तांत्रिक निःसंतान को मनचाहा बच्चा भी दे सकता है.

मैंने ये सारी जानकारी अपने न्यूज़ डेस्क तक पहुंचाई मुझे कहा गया ख़बर बना कर भेजो.मैंने तुरंत जाल बिछाया क्योंकि ये ख़बर मेरे लिये चुनौती भरी थी, एक जोड़े को मैने उस तांत्रिक के पास भेजा. उन लोगों ने संतान ना होने की बात तांत्रिक को बताई. तांत्रिक ने कहा बिल्‍कुल बच्चा हो जायेगा, बस रोज मेरे पास आना होग, क्‍योंकि थोड़ा इलाज करना पड़ेगा. एक बार मैं खुद भी उस तांत्रिक बाबा के पास पहुंचा क्योंकि मैं मामले का जायजा खुद लेना चाहता था. इस बार भी उसने वही बात कही. तांत्रिक के पास मेरे अलावा और कई महिलाएं भी आई हुई थी, जिनके साथ बाबा पर्दे के अन्दर क्या कुछ करता था, ये कहना यहां पर मेरे लिये आसान नहीं है.

दरअसल ये बाबा सभी महिलाओं को बोलता था उनके अन्दर कोई आत्मा घुस गयी है, जिसे वो निकाल सकता है. इसके लिये वो महिला को नग्न करता था, आगे क्या होता होगा ये समझने के लिये दिमाग पर ज्यादा जोर डालने की जरूरत नहीं है. मैंने ये बात भी अपने न्यूज़ डेस्क को बता दी अब बारी अपने मिशन को अंजाम तक पहुंचाने की थी. इस बार मै एक लड़की के साथ उस तांत्रिक के पास पहुंचा ही था कि वहां पहले से मौजूद कुछ बदमाश मुझ पर भूखे भेडि़यों की तरह टूट पड़े. दस लोगों के बीच में मैं अकेला था. जहां जहां उनका दिल किया वहां वहां वो अपनी ताकत की अजमाइश किए. मैं भी अपने सामर्थ्‍य के हिसाब से मुकाबला करता रहा.

किसी तरह बचकर मैंने वहां से डीएसपी को फोन किया, क्योंकि आगे उन सब का मुकाबला कर पाना संभव नहीं था, फिर एक पत्रकार होने के नाते इस तरह मारपीट करना मेरी नज़रों में न कल सही था और ना ही आज है. इस दौरान अपने बचाव में मैं जो कुछ मुझ से हो सका वो सब किया.जख्मी हालत में मैं तुरंत थाने पहुंचा मुझ पर हमला करने वाले भी भाग चुके थे. अभी थाने के अन्दर बैठे मुझे चंद मिनट भी नहीं हुये थे कि अचानक मोबाइल की घंटी बज उठी. ये कॉल मेरे एजेंसी के न्यूज़ डेस्क, नोयडा से थी. बात करने वाले वो अधिकारी थे जो कभी हमें ख़बरों के लिए जूझना सिखाते थे. महोदय ने मुझसे यह नहीं पूछा कि हालत कैसी है, क्या हुआ तुम्हारे साथ, बल्कि  सीधा फरमान सुनाओ दिया गया कि चुपचाप नोएडा पहुंचो.

पुलिस मुझे जख्मी हालत में अस्पताल ले गयी. वहां मेरा मेडिकल कराया गया. तभी वहां के डॉक्टर को पता चला कि मै पत्रकार हूं तो उन्‍होंने धीरे से कहा भाई साहब एक टीवी पत्रकार है संजीव शर्मा, उनकी ख़बरें बड़ी अच्छी होती हैं, मैं उन्‍हें जानता तो नहीं परंतु वो आपकी मदद कर सकते हैं. ये सुनने के बाद मैं रोने लगा. मैंने डॉक्‍टर को बताया कि मैं ही संजीव शर्मा हूं. फर्क सिर्फ इतना है कि खबर बनाने वाला आज खुद खबर बन गया है. डॉक्टर साहब ने कहा आप मेरे बेटे जैसे हो इसलिए एक सलाह देता हूँ, इस समाज की बुराइयों से लड़ना बड़ा कठिन है. ये सब आगे भी होता रहेगा लेकिन कभी हार मत मानना. एक बार पेज थ्री फिल्म जरूर देखना, आपको बहुत कुछ सीखने को मिलेगा. मैंने डॉक्टर को धन्‍यवाद कहा और बाहर निकला. डॉक्‍टर साहब की सीख आज भी मेरे अंदर जिंदा है और जिंदा रहेगी. एक पल मुझे लगा शहर की मीडिया और मीडियाकर्मी मेरा साथ देंगे. लेकिन यहां मैं गलत था, कोई मेरे साथ खड़ा नहीं हुआ. जिनसे मुझे सबसे ज्यादा उम्मीद थी उन्‍होंने ही सबसे पहले मेरा साथ इस मुश्किल घड़ी में छोड़ दिया. लेकिन मैंने हार नहीं मानी तांत्रिक और तांत्रिक के गुंड़ों के खिलाफ थाने में मामला दर्ज करवा दिया. हां, लेकिन एक पत्रकार होने की हैसियत से नहीं बल्कि एक आम नागरिक की हैसियत से.

अगले रोज मैं नोएडा रवाना हो गया. न्यूज़ एजेंसी ने मेरे इस बहादुरी के लिए पुरस्‍कार पहले से ही तैयार रखा हुआ था. मुझसे कहा गया आप कुछ समय के लिये रिपोर्टिंग नहीं करेंगे. मुझे ये समझ में नहीं आया आखिर कंपनी ने ये फैसला क्‍यों लिया है. फिर पता चला कि मुझ पर आरोप लगाया गया है कि मैंने तांत्रिक से दस हजार रूपये मांगे थे. मैंने न्‍यूज एजेंसी ज्‍वाइन करने के बाद प्रॉपटी खरीदी. इन आरोपो का जवाब मैंने कम्पनी को नहीं दिया. कारण साफ है जब उनके नज़रों में हम बेईमान हैं तो इमानदारी का सबूत देने की जरूरत क्या है. हां, मैंने पांच बिस्वा जमीन खरीदी, लेकिन ये पैसे मेरे उस पिता के थे, जो आर्मी में लम्बे समय से गुमशुदा है. ये पैसा मेरी माता जी को आसाम राईफल्स ने दिया था. और ये जमीन सिर्फ एक लाख चालीस हजार रूपये की थी,  न की करोड़ों की. क्या बीस साल की नौकरी में मेरे पिता ने इतने पैसे भी नहीं कमाये होंगे कि वो अपने बच्चो के लिए पांच बिस्‍वा जमीन खरीद सकें.

मैंने अपने बेगुनाही का जवाब नहीं दिया, लेकिन असलियत सामने आने के बाद खुद तांत्रिक ने पुलिस में लिखित बयान दिया कि गलती मेरी है. मुझे माफ कर दिया जाये, मैं शहर छोड कर चला जाउंगा. मेरा मकसद ही था उस तांत्रिक को शहर से बाहर करना ताकि अंधविश्‍वास में अंधी होकर फिर कोई महिला उस हैवान के हवस की शिकार न बनें. ये अलग बात है कि इस कामयाबी के बदले मेरी नौकरी और इज्जत दोनों दांव पर लग गयी. मेरी इमानदारी के दस्तावेज थाने में आज भी मौजूद है.

इधर, नोयडा से बहादुरी का खिताब लेकर मैं अपने घर वापस पहुंच चुका था. फिर कम्पनी से फोन आया, मुझसे एक बार फिर नोयडा में हाजिरी दर्ज करवाने के लिये कहा गया. इस बार मुझसे इस्तीफा ले लिया गया और कहा गया आपके खिलाफ काफी शिकायतें हैं. मेरे खिलाफ शहर के ही एक नेता ने कम्पलेंट की थी, जिसके साइबर कैफे में बीएफ चलती थी. उसके खिलाफ हुई जांच की सीआईडी की टीम में मैं भी शामिल था. वर्तमान में ये मामला न्यायालय में विचाराधीन है. कम्पनी ने मुझे नौकरी से निकाल दिया. मैं कई महीने बेरोजगार रहा. लेकिन हर काली रात के बाद जिस तरह नई सुबह होती है, उसी तरह मेरी जिंन्दगी में उजाला आया. मुझे दिल्ली के एक उभरते एनसीआर न्यूज चैनल में नौकरी मिल गयी. इस चैनल में भी मेरे खिलाफ काफी कंम्पलेंट गयी लेकिन मुझे चैनल की तरफ से कभी कुछ नहीं बोला गया, क्योंकि उन्हें मुझ पर और मेरे इमान पर भरोसा था.

मेरा उस न्यूज़ एजेंसी से आज सिर्फ चंद सवाल हैं-

1. क्या एक मिशन में फेल होने का मतलब नौकरी से हाथ धौना होता है ?
2. स्कूल में जाने वाला बच्चा भी फेल हो जाता है, इसका मतलब क्या वो गद्दार है ?
3. इंडिया क्रिकेट टीम भी हमेशा नहीं जीतती, इस हार को मैच फिक्सिंग कहा जाए ?
4. किसी की चंद झूठी लाइनें क्या हमारे कैरियर को खत्म कर सकती हैं?
5. दो साल का रिश्ता चैबीस घंटे में कैसे टूट सकता है ?
6. विश्वास नहीं था तो अपना पत्रकार क्यो बना दिया ?
7. क्या हम पत्रकार आप के लिए चवीइंगम हैं, चूसों और थूक डालो ?

एक रिपोर्टर से न्यूज़ रूम के डेस्क इंचार्ज और रिपोर्टर से एसआईटी हेड का रास्ता आसान नहीं होता. मैंने ये रास्ता तय किया और अपने आपको साबित भी किया. लेकिन अपने दस साल के छोटे से अनुभव में बहुत कुछ सीखा, जहां विश्वास है वहां सबकुछ है, जहां विश्वास नहीं वहां कुछ नही. अगर मैं तांत्रिक वाले मिशन में कामयाब नहीं हुआ तो इसके पीछे सबसे बड़ा कारण ये था कि मैंने ये जानकारी उस इंसान के साथ शेयर की जिन्‍हें बहुत कुछ मानता था. लेकिन वो मेरी बात को रोटी की तरह पचा नहीं सके और उन्होंने ये जानकारी तांत्रिक को दे दी. खैर हर मोड़ हर दिन हर लम्हां हमें कुछ सीखाता है और हमे सीखना भी चाहिए इसी का नाम है जिन्दगी लाइव.

लेखक संजीव शर्मा पत्रकार हैं.

Pahad Ki Dada: Hill Mail Uttarakhand
CosmoQuick: AI Recruitment For Media Jobs
Click to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

You May Also Like

मेरी भी सुनो

अपनी बातें दूसरों तक पहुंचाने के लिए पहले रेडियो, अखबार और टीवी एक बड़ा माध्यम था। फिर इंटरनेट आया और धीरे-धीरे उसने जबर्दस्त लोकप्रियता...

राजनीति-सरकार

मोहनदास करमचंद गांधी यह नाम है उन हजार करोड़ भारतीयों में से एक जो अपने जीवन-यापन के लिए दूसरे लोगों की तरह शिक्षा प्राप्त...

साहित्य जगत

पूरी सभा स्‍तब्‍ध। मामला ही ऐसा था। शास्‍त्रार्थ के इतिहास में कभी भी ऐसा नहीं हुआ कि किसी प्रश्‍नकर्ता के साथ ऐसा अपमानजनक व्‍यवहार...

मेरी भी सुनो

सीमा पर तैनात बीएसएफ जवान तेज बहादुर यादव ने घटिया खाने और असुविधाओं का मुद्दा तो उठाया ही, मीडिया की अकर्मण्यता पर भी निशाना...