नेट पर लन्दन से एक लेखिका की लिखी रिपोर्ट ने वास्तव में भारतीय होने पर शर्मिंदगी का भाव पैदा किया है. उस रिपोर्ट के अनुसार लन्दन में अभी ओलम्पिक गेम होने में करीब साल भर का समय शेष है लेकिन उस आयोजन की लगभग सारी तैयारियां पूरी हो चुकी है. स्टेडियम बनकर तैयार हैं. बस अन्दर की कुछ सजावट बाकी है जो जल्दी ही पूरी कर ली जाएगी. और ये स्टेडियम इंतज़ार करेगा 1 साल ओलम्पिक के शुभारम्भ का, जिसमें पूरी दुनिया के 205 देशों के 14,700 प्रतिभागी हिस्सा लेने वाले हैं. अब इस खबर के बरक्श भारत में आयोजित हुए राष्ट्रकुल खेलों को याद कर लें. ‘अभी भी हम लन्दन के गुलाम ही हैं’ ऐसा याद दिलाने वाले इस खेल में हमने अपने महारानी के देश से ही कोई सबक नहीं लिया! इस गरीब देश का पैसा गंदे पानी की तरह बहाने के बावजूद उस खेल के नाम पर भारत में कितने ‘खेल’ हो गए यह सबको पता है.
आज भी आप नयी दिल्ली के कनाट प्लेस घूम आइये. खुले हुए मैनहोल, कीचड़ से सना गलियारा, हल्की बारिश में भी ज़मा घुटने भर पानी आपको शर्म से पानी-पानी होने को मजबूर कर देगा. देश की राष्ट्रीय राजधानी के ह्रदय स्थल कहे जाने वाले इलाके के हालात बड़ी संख्या में वहां पहुंचने वाले विदेशियों को शेष भारत की चुगली करता ही करता दिखेगा. यह जान कर तो आपको और ताज्जुब होगा कि कनाट प्लेस नर्क इसलिए बना है कि वहां ‘काम’ चल रहा है. वे काम जो राष्ट्रकुल खेल के आयोजनों का हिस्सा है. तो खेल कब का खत्म हो चुका है. तम्बू उखड़ चुके हैं. विजेतागण अपनी पदकों के साथ अपने-अपने देश रवाना हो चुके हैं. कलमाडी साहब भी जहां का माल वहां पहुंचा कर सरकार की लाख राहत कोशिशों के बावजूद भी ‘तिहाड़’ में आराम फरमा रहे हैं. दिल्ली की शीला सरकार इस मामले में लोकायुक्त और ‘कैग’ की प्रतिकूल टिप्पणियों के बावजूद अड़ी और डटी हुई है. लेकिन राष्ट्रकुल खेलों की तैयारी चल रही है. आपकी जेब इस नाम पर तो कब के साफ़ हो गए लेकिन शहर की सफाई बदस्तूर जारी है. आस्ट्रेलिया से आये मजदूर भी अब अपने वतन को लौट चुके हैं. सौ रुपये के सामान का हज़ार रुपये किराए वसूलने वाली कंपनिया भी अपना बैलेंस शीट चमका कर अगले शिकार की तैयारी में जुट गयी होंगी. लेकिन खामोश…काम जारी है.
अब आप लन्दन और यहां की परिस्थितियों की तुलना करें. अपने देश में बेरोजगारों की लंबी फौज, फलतः श्रम का काफी सस्ता होना. विशेषज्ञों की बहुतायत. जबकि लन्दन में कई गुना ज्यादे महंगी सारी चीज़. बावजूद उसके वहां काम नियत समय से पहले पूरा होना और ओलम्पिक समिति द्वारा तत्काल हरी झंडी भी दिखा देना. लेकिन याद कीजिये कोमनवेल्थ के समय कितनी छीछालेदर हुई थी अपनी जब खेल की शुरुआत से कुछ दिन पहले तक उसे अधूरी तैयारियों के कारण कामनवेल्थ कमिटी द्वारा हरी झंडी मिलना मुश्किल हो गया था. आखिर कारण क्या है इसके? केवल और केवल राजनीतिज्ञों की अक्षमता और भ्रष्टाचार. बात केवल इस एक आयोजन की नहीं है. हर तरह की योजनाओं में जब तक नेताओं-अधिकारियों का हिस्सा सुरक्षित न हो जाय तब-तक काम की रफ़्तार इसी तरह रहनी होती है. लेकिन जहां भी उनका टुकड़ा सुनिश्चित हो वहां रफ़्तार को पंख लग जाते हैं. अभी दिल्ली हाई कोर्ट के सामने आतंकी हमले के बाद गृह मंत्री चिदंबरम का एक बयान यह भी था कि हाई कोर्ट में लगाने के लिए क्लोज सर्किट कैमरा खरीदने के लिए, चार बार टेंडर निरस्त करने के बावजूद पीडब्लूडी इस लिए कैमरा खरीदने का निर्णय नहीं कर पाया क्योंकि उसे डर था कि भ्रष्टाचार के आरोप लग जायेंगे.
इस ‘मासूमियत पर कौन न मर जाय ऐ खुदा’ कौन भरोसा करेगा उनकी अपनी लापरवाही को ढंकने वाली इस दलील पर? जिस सरकार में तमाम नियमों को ताक पर रख अनावश्यक रूप से 111 हवाई ज़हाज़ खरीदने के लिए कैग की फटकार के बावजूद सत्ताधारियों के पेशानियों पर बल भी नहीं पड़े हों. जहां काफी हड़बड़ी में बहुमूल्य 2G स्पेक्ट्रम को अपनी चहेती कंपनियों को लुटा कैग की ही रिपोर्ट के अनुसार देश को 1 लाख 76 हज़ार करोड रुपये का चूना लगाया गया हो, जहां इसी राष्ट्रकुल खेल में दस रुपये के मेट्रेस की खरीदी बीस-बीस गुना कीमत पर की गयी हो. इसी आयोजन में जहां कई रसूख वालों, नेताओं पर कथित कंसल्टेंसी फीस के नाम पर ही करोड़ों रूपये लुटा दिए गए हों. वहां सुरक्षा के लिए ज़रूरी महज़ कुछ लाख की खरीदी करने में ही डर गया सरकारी अमला? वाह कितने मासूम तर्क हैं. बात महज़ इतनी थी कि थोड़े से रकम से हो जाने वाली कैमरे की खरीदी के लिए कोई क्यूं कर माथा-पच्ची करता? इतनी उर्जा का खर्च कर तो इससे सैकड़ों गुना बड़े ‘सौदे’ हो सकते थे न? तो न केवल लालफीताशाही, भ्रष्टाचार बल्कि नेताओं द्वारा इस देश के खजाने को जी भर कर लूटने की बेशर्मी भी हमारे बार-बार शर्मसार होने पर मजबूर होने के कारण हैं.
मुश्किल तो ये है कि हार बात में विदेशों का अंधानुकरण करते रहने वाले कर्णधारगण वहां की ऊपर वर्णित अच्छी बातों से कोई सबक सीखने को तैयार तो नहीं ही होते बल्कि अपने देश के भी इक्के-दुक्के उदहारण से इसलिए नहीं सीखना चाहते क्यूंकि नेताओं के नीयत में ही खोट है. इसी दिल्ली में मेट्रो परियोजना के प्रमुख श्रीधरन का उदाहरण ही देख लेते. केवल इस एक व्यक्ति के अच्छे और ज़िम्मेदार होने के कारण आज काफी महात्वाकांक्षी और मुश्किल मेट्रो की हर परियोजना न केवल तय समय से पहले बल्कि अनुमानित लागत से कम पैसों में ही पूरी हुई. उसके लिए निर्धारित बजट से काफी कम रकम खर्च कर ही अच्छी क्वालिटी का काम होना संभव हुआ और लाखों-करोड की लागत के बावजूद कहीं भी किसी भी तरह के भ्रष्टाचार की कोई बातें सामने नहीं आयी. तो देश के वर्तमान हालात से बिलकुल अनभिज्ञ ये लिलिपुटीयन सत्ताधारी आज भी सबक लेने को तैयार हैं, ऐसा कोई संकेत नज़र नहीं आता. हर तरह के हथकंडे अपना कर सत्ता प्राप्त करने वाले अपने स्वार्थ में इस कदर अंधे हो चुके हैं कि उन्हें देश के स्वाभिमान, जनता की आकांक्षाओं को भी जानने में भी कोई दिलचस्पी नहीं होती. अपने ही मतदाताओं के बारे में इतने ‘मजाकिये’ कि ये सोच कर ही निश्चिंत है कि बस बत्तीस रुपया मिल जाय जनता को, वह ‘अमीर’ हो जायेगी. क्या फर्क पड़ता है इससे कि खुद के एक डिनर पार्टी पर ही लाखों खर्च कर लिया जाय. आज भी इन्हें यह तय करने की फुरसत नहीं है कि उन्हें कलमाडी माँडल चाहिए या श्रीधरन का माँडल. जनता के लिए तो बस एक सन्देश. खामोश्श्श….काम जारी है, और खेल भी.
लेखक पंकज झा छत्तीसगढ़ बीजेपी के मुखपत्र दीपकमल के संपादक हैं.

