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खुदा का घर भी हुआ सरकारी दफ्तर, जहां देर तो है ही अंधेर भी है

पंडित सुरेश नीरवन जाने कैसी ये हवा चली है कि आजकल वे लोग ज्यादा परेशान रहते हैं जो कि ईमानदारी से काम करना चाहते हैं। और जो न खुद खाते हैं और न किसी को खाने देते हैं। ईमानदारी के जुनून से त्रस्त ऐसे अधिकारियों के सबसे बड़े दुश्मन वे लोग होते हैं, जो बेचारे दुर्भाग्य से ऐसे अफसर के अंतर्गत काम करते हैं। और जिनकी बेईमानी का कुटीर उद्योग ये खड़ूस अफसर बंद कर देते हैं। खीज मिटाने को ये बेचारे, बिना सहारे, वक्त के मारे कुछ टिटपुंजियां अखबारों में थोड़ा ले-देकर खबरें छपवाते रहते हैं। और अपने मन की भड़ास निकलते रहते हैं।

पंडित सुरेश नीरव

पंडित सुरेश नीरवन जाने कैसी ये हवा चली है कि आजकल वे लोग ज्यादा परेशान रहते हैं जो कि ईमानदारी से काम करना चाहते हैं। और जो न खुद खाते हैं और न किसी को खाने देते हैं। ईमानदारी के जुनून से त्रस्त ऐसे अधिकारियों के सबसे बड़े दुश्मन वे लोग होते हैं, जो बेचारे दुर्भाग्य से ऐसे अफसर के अंतर्गत काम करते हैं। और जिनकी बेईमानी का कुटीर उद्योग ये खड़ूस अफसर बंद कर देते हैं। खीज मिटाने को ये बेचारे, बिना सहारे, वक्त के मारे कुछ टिटपुंजियां अखबारों में थोड़ा ले-देकर खबरें छपवाते रहते हैं। और अपने मन की भड़ास निकलते रहते हैं।

इनकी हर चंद कोशिश ऐसे ईमानदार जीव की हवा निकालने की होती है। इनकी प्रशंसा के लिए तो बस यही कहा जा सकता है कि-

बने अगर तो पथ के रोड़ा, करके कोई ऐब ना छोड़ा
असली चेहरा दीख न जाए इसीलिए हर दर्पण तोड़ा।

ये लोग भूल जाते हैं कि हजार बेईमान मिलकर भी एक अदद अन्ना हजारे नहीं बन सकते। इनके कुटिल षडयंत्र तभी तक जारी रह पाते हैं जब तक कि शेर सो रहा होता है। शेर की एक हुंकार काफी होती है हजार गीदड़ों और कुत्तों को भगाने के लिए। तभी तो किसी विद्वान ट्रकधर्मी शायर ने कहा है-कि-

है किसमें हिम्मत जो छेड़े दिलेर को
गर्दिश में तो कुत्ते भी घेर लेते हैं शेर को।

मैं उन लोगों को जो हमेशा बुराई के पक्ष में ही लामबंद होते हैं,  देखकर बाकायदा विस्मित होता हूं। सोचता हूं कि कैसे एक सूरज के ताप से तिलमिलाए ये तिलचट्टे गलबहियां डाले एक सूरज को बुझाने की जुगत में लगे रहते हैं। और फिर अंत में वक्त के पैरों तले रौंद दिए जाते हैं। उनके अरमान पूरे नहीं हो पाते मगर ये जब तक जिंदा रहते हैं, अच्छाई के विरुद्ध किलमिलाते और बिलबिलाते ही रहते हैं। इसके अलावा ये कर भी क्या सकते हैं। कोई भलाई का काम तो इनके खानदान में किसी ने किया ही नहीं। आजादी से पहले क्रांतिकारियों की मुखबरी करके अपनी जेबें भरनेवाले गद्दारों की औलादों पर आज देश की किस्मत चमकाने का दारोमदार है। देश की किस्मत चमके या नहीं मगर इनकी किस्मत हर हाल में चमकनी चाहिए। और जो इनकी किस्मत को रिश्वत के जल से सिंचित होने से रोकने की कोशिश करता है वही इनकी निगाह में देशद्रोही है। बेईमान है। इनके कंधे पर लटके झोले में सैंकड़ों षडयंत्र हैं, किसिम-किसिम के षडयंत्र। ऐसे सनकी ईमानदारों के खिलाफ।

अगर आप ईमानदार हैं तो सावधानीपूर्वक इनसे हट-हटकर बच के रहें। क्योंकि कल गाज आप पर भी गिर सकती है। क्योंकि ये बेईमान अब अन्ना हजारे की रात-दिन प्रशंसा करके अपने को ईमानदार दिखाने की मशक्कत करने लगे हैं। इसी नौटंकी के तहत आजकल इन्होंने अपने एक अफसर पर आऱटीआई डाल दी है, सार्वजनिक रूप से यह जानने के लिए कि काजल की कोठरी में बैठने के बावजूद इसके बाल सफेद क्यों हैं। उन्हें भरोसा है कि इसकी ईमानदारी की अकड़ के पीछे जरूर किसी विदेशी शक्ति का हाथ है। वरना आजकल तो शरीफ लोग हमारी ही तरह चिरकुट होते हैं। दुमहिलाऊ और तलवा चाटू। हम बौनों के बीच कौन है ये ईमानदारी का हिंसक डायनासौर। ये एलियन आखिर है किस ग्रह का प्राणी। कुत्सित ईमानदारी से फुफकारता एक भयानक ड्रेगौन।

भ्रष्ट द्वीप के बौने मुट्ठियां भींचते हैं। तभी एक दिव्य आकाशवाणी होती है- प्यारे…अच्छा होना भी बुरी बात है, इस दुनिया में। और तभी कभी मेरे दिल में ये खयाल आता है कि भैया, अब तो आसमान की आकाशवाणी का भी यही राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय प्रसारण है। ओछेपन का जानदार-शानदार लाइव प्रसारण। भ्रष्टाचारी तंत्र बेईमानों को अंधे की रेवड़ियों की तरह बाबा रामदेव और अन्ना हजारे के समाचार देता है, प्रसारण के लिए। और उधर बौने एक सड़ियल से अखबार को उस खिसके दिमाग के, सनकी ईमानदार के खिलाफ मनगढ़ंत बेईमानी की स्टोरी प्लांट करने को दे देते हैं, जिसने कि उन सबकी दुकाने बंद कर रखीं हैं। वे कोरस में भुनभुनाते हैं- बेवकूफ न खुद खाए और न खाने दे। खुदा के तेवर भी सरकारी दफ्तर से ही हो गये हैं, जहां अब देर भी है और अंधेर भी। तभी तो इसका अभी तक न ट्रांसफर हुआ और न कोई इंन्क्वारी बैठी। कब तक होती रहेगी धर्म की हानि। कब तक चलेगी इस अफसर की मनमानी। बौने परेशान हैं.ये सोचकर कि कैसा और किस डिजायन का कलयुग आया है। जहां किसी को ईमानदारी से बेईमानी भी नहीं करने दी जा रही है।

व्यंग्य लेखक पंडित सुरेश नीरव हिंदी काव्यमंच के लोकप्रिय कवि हैं. 16 पुस्तकें प्रकाशित. 7 धारावाहिकों का पटकथा लेखन. अंग्रेजी, उर्दू, फ्रेंच में अनुवाद. 30 वर्ष तक कादम्बिनी के संपादन मंडल से संबद्ध. छब्बीस देशों की विदेश यात्राएं. भारत के राष्ट्रपति से सम्मानित. आजकल स्वतंत्र लेखन और यायावरी. उनसे संपर्क सुरेश नीरव, आई-204, गोविंद पुरम, गाजियाबाद या मोबाइल नंबर 09810243966 के जरिए किया जा सकता है.

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