: महामना मालवीय इंस्टीच्यूट आफ टेक्नॉलाजी फॉर गंगा मैनेजमेंट स्थापित करने की तैयारी : बीमार ही नहीं मृत्यु शैया पर करवटें ले रही मां गंगा को बचाने का संकल्प लेकर साधु, संतों, गंगा विशेषज्ञों, इंजीनियरों, न्यायविदों का समूह आगे आ रहा है। मई 2010 में काशी में इन संतो व बुद्धिजीवियों की उपस्थिति में गंगा की अपनी व्यवस्था के लिए महामना मालवीय इंस्टीच्यूट आफ टेक्नॉलाजी फॉर गंगा मैनेजमेंट की स्थापना का खींचा गया गया खाका अब आकार लेने लगा है। फिलहाल काशी में ही सामनेघाट के निकट गंगोत्री विराट नामक छोटे भवन में संस्था की शुरुआत करने की तैयारी चल रही है लेकिन मूल प्लान वाराणसी और आसपास में सौ एकड़ भूमि में संस्थान स्थापित करने की है। इसके लिए 15 दिसंबर को वाराणसी में ही साधु-संतो, बुद्धिजीवियों, विशेषज्ञों की दो दिवसीय बैठक होने जा रही है। इसमें संस्थान को मूर्तरूप देने की अबतक की तैयारियों की समीक्षा की जाएगी। इस संस्था के ट्रस्टी हैं शंकराचार्य स्वामी ज्येंद्र सरस्वती, वासुदेवानंद सरस्वती, नरेंद्रानंद सरस्वती, विश्वेश तीर्थ, हंसदेवाचार्य, न्यामूर्ति गिरधर मालवीय, केएन गोविंदाचार्य, पूर्व मुख्य सूचना आयुक्त ओपी केजरीवाल, पूर्व अध्यक्ष केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड परितोष त्यागी, निदेशक गंगा रिसर्च सेंटर – बीएचयू के प्रो. यूके चौधरी।
यह संस्था महामना पं. मदनमोहन मालवीय द्वारा स्थापित गंगा महासभा का अभिन्न अंग होगा। इस परिसर में प्रदूषण, बाढ़, मृदाक्षरण, जल बंटवारा, प्रदूषण मॉडलिंग और शोध-प्रशिक्षण की उच्च स्तरीय व्यवस्था होगी। साथ ही समय-समय पर गंगा के हितों को लेकर शासन-प्रशासन पर दबाव बनाने का भी प्रयास किया जाएगा। संस्था के ट्रस्टी प्रो. यूके चौधरी कहते हैं कि विश्व की सारी नदियों की तूलना में गंगा जल की पैथोजेन से लड़ने की क्षमता सर्वाधिक है। दुःखद यह है कि गंगा के उद्गगम स्थल का सारा जल हरिद्वार के निकट निकाल लिया जाता है। दूसरा यह कि अधिकतर ट्रीटमेंट प्लांट गंगा के बाढ़ क्षेत्र में ही बनाए जा रहे हैं। ऊपर से अवजल निस्तारण गलत ढंग से किया जा रहा है। दुःखद यह भी है कि कहीं भी नदी की उर्जा शक्ति का उपयोग नहीं हो रहा है। फरक्का बैराज एवं अन्य बांधों के दूरगामी नतीजों का परीक्षण करने की जरूरत नहीं समझी जा रही है। गंगा के न्यूनतम बहाव के सिद्धांत का अनुसरण नहीं किया जा रहा है। और तो और गंगा के बालू क्षेत्र के प्रदूषण को नियंत्रित करने की क्षमता का मूल्यांकन भी नहीं किया जा रहा है। लिहाजा एक-एक कर गंगा के सारे गुण प्रायः नष्ट होते जा रहे हैं। ऐसे में गंगा को पुनः जागृत किए जाने की जरूरत है।
ग्रेट प्लेन आफ इंडिया नाम से विशाल समतलीय गंगा बेसिन विश्व विख्यात है। प्राकृतिक बेसिन से त्वरित न्यूनतम जल प्रवाह ही गंगा में होता है। यह न्यूतम बाढ़ एवं मृदाक्षरण का द्योतक है। यही मिट्टी के उपजाऊ पन का कारण है। यही संतुलित गंगा वातावरण को व्यवस्थित करती है। गंगा बेसिन ही विश्व में मात्र एक ऐसा बेसिन है जिसमें मिट्टी के परत की मोटाई किलोमीटर में है। यह चरित्र सूचित करता है कि गंगा बेसिन में भूमिगत जल अवशोषण की क्षमता विश्व की सारी नदियों की अपेक्षा सबसे ज्यादा है। गंगा बेसिन की यह शक्ति परिभाषित करती है कि गंगा बेसिन में रहने वाले लोग अकाल की समस्या से कम प्रभावित होंगे। यहां पेयजल की उपलब्धता सतह से कम गहराई में सदा रहेगी। गंगा मुख्य धारा का उद्गम स्थान गो मुख है। उसकी ऊंचाई सात हजार दस मीटर है। यह प्रायः विश्व की सभी नदियों के उद्गगम स्थान की ऊंचाईयों से अधिक है। यही स्थैतिक ऊर्जा विभिन्न नदियों को अपने में मिलने के लिए प्रेरित करती है। इनमें ब्रह्मपुत्र देश की सबसे शक्तिशाली नदी है। गंगा में मिलने वाली विभिन्न नदियों का जल गंगा में मिलने के उपरांत गंगा जल हो जाता है। गंगा अपने जल गुण महत्ता के कारण विश्व में प्रसिद्ध है। यह जल विभिन्न रोग पैदा करने वाले जीवाणुओं को नष्ट कर देता है। इसका जल कई वर्षों तक शुद्ध बना रहता है। इसमें दुर्गन्ध न आने के कारण गंगा के जल को अमृत स्वरूप समझा जाता है। गंगा ऐसी जीती जागती ऐतिहासिक नदी है जो चैतन्य स्वरूप व्यवहार करती आ रही है लेकिन गंगा के हितों को नजरंदाज कर लिए जा रहे निर्णय से इसके विभिन्न विशिष्ट चरित्र नष्ट होते जा रहे हैं और शक्तिशाली गंगा नदी सूख रही है।
यह प्रत्यक्ष है कि इसके सारे जल को भीमगौड़ा वैराज एवं नरौरा वैराज से नहर द्वारा निकाला जा रहा है। नरौरा के डाउस्ट्रीम में गंगा का मौलिक जल है ही नहीं। गंगा में जो जल दिखाई दे रहा है वह विभिन्न जगहों पर नदी में आ रहे भूमिगत जल तथा अन्य नदियों एवं नालों का अवजल ही है। साथ ही कई अन्य जगहों पर अवैज्ञनिक तरीकों से जल निकाला जा रहा है। तथा इसमें प्रदूषक को डाला जा रहा है। कहीं भी यह नहीं सोचा जा रहा है कि कितना कहां से और कैसे जल को निकाला जाए। आज तक कहीं भी तकनीकी दृष्टि से नदी में उपलब्ध इसके रिनीवल एनर्जी का उपयोग प्रदूषक निवारण के लिए नहीं किया जाता है। नदी अपने जल के लिए साल मैं नौ महीने तक तरसती रहती है। बाढ़ एवं मृदाक्षरण तीब्रतर होता जा रहा है। मिटटी की उर्वरा शक्ति विलुप्त होती जा रही है और गंगा बेसिन का तापमान बढ़ता चला जा रहा है। आकाल की समस्या भी गहराती जा रही है क्योकि वर्षा की मात्रा प्रतिदिन घटती जा रही है। गंगा के पानी में घुलित आक्सीजन की मत्रा कम हो गई है। बीओडी लोड अपेक्षा से काफी बढ़ गया है। गंगा न्यूनतम जल स्तर हर साल घटता जा रहा है। इस तरह 40 करोड़ लोग जो गंगा से जुड़े हैं वे बुरी तरह प्रभावित हो रहे हैं। इन सब के अतिरिक्त हिमालय के पहाड़ी क्षेत्र की ढाल को नजरअंदाज करते हुए टिहरी सहित बड़े-बड़े बांधों का निर्माण किया गया है। और कितने बांधों का निर्माण कार्य चल रहा है तथा साथ ही कितने बांध बनाने की योजनाएं चल रही हैं। इस तरह जलाशय के भाग डेड स्टोरेज के कार्य की अनदेखी और सीपेज एवं भूमिक्षरण की अनदेखी के साथ ही नदी में मृदाबहाव की अनदेखी की जा रही है। इससे नदी तल ऊंचा होता चला जा रहा है। फलतः बिना ज्यादा वर्षा के बाढ़ नदी के कटाव, आदि से उजड़ते गांव कटती ऊपजाउ भृमि एवं विभिन्न समस्याएं विकराल होती जा रही हैं।
लेखिका रीता जायसवाल वाराणसी की निवासी हैं तथा स्वतंत्र लेखन करती हैं.

