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गण से दूर होता तंत्र

[caption id="attachment_2558" align="alignleft" width="94"]अंकुर अंकुर[/caption]“26 जनवरी को मैंने सोचा है कि आराम से सुबह उठूंगा, फिर दिन में दोस्तों के साथ फिल्म देखने जाना है, इसके बाद मॉल में जाकर थोड़ी शॉपिंग और फिर रात में दोस्तों के साथ दारू के दो-दो घूंट। क्यूं तुम भी आ रहे हो ना अंकुर।” अब आप बताएं कि इतना अच्छा मौका कोई हाथ से जाने देगा। हालांकि मेरे संपादक ने मुझे राष्ट्रपति के भाषण का अनुवाद करने के लिए ऑफिस आने को कहा है लेकिन, फिर भी मैंने इस कार्यक्रम के लिए हामी भर दी है। अधिकांश लोग शायद मुझे गाली देंगे कि देश अपना 62वां गणतंत्र दिवस मनाने की तैयारियां कर रहा है और ये महाशय फिल्म और दारू पर ही अटके हुए हैं। पर जनाब कौन सा गण और कौन सा तंत्र। मेरे जैसे युवा ही नहीं बल्कि देश की आधी आबादी को भी शायद अब इन राजकीय उत्सवों से ज्यादा सरोकार नहीं है। लेकिन इसके जिम्मेदार देश का गण नहीं अपितु तंत्र है।

अंकुर

अंकुर

अंकुर

“26 जनवरी को मैंने सोचा है कि आराम से सुबह उठूंगा, फिर दिन में दोस्तों के साथ फिल्म देखने जाना है, इसके बाद मॉल में जाकर थोड़ी शॉपिंग और फिर रात में दोस्तों के साथ दारू के दो-दो घूंट। क्यूं तुम भी आ रहे हो ना अंकुर।” अब आप बताएं कि इतना अच्छा मौका कोई हाथ से जाने देगा। हालांकि मेरे संपादक ने मुझे राष्ट्रपति के भाषण का अनुवाद करने के लिए ऑफिस आने को कहा है लेकिन, फिर भी मैंने इस कार्यक्रम के लिए हामी भर दी है। अधिकांश लोग शायद मुझे गाली देंगे कि देश अपना 62वां गणतंत्र दिवस मनाने की तैयारियां कर रहा है और ये महाशय फिल्म और दारू पर ही अटके हुए हैं। पर जनाब कौन सा गण और कौन सा तंत्र। मेरे जैसे युवा ही नहीं बल्कि देश की आधी आबादी को भी शायद अब इन राजकीय उत्सवों से ज्यादा सरोकार नहीं है। लेकिन इसके जिम्मेदार देश का गण नहीं अपितु तंत्र है।

लोगों के अंदर गुस्सा है, प्याज और पेट्रोल की बढ़ती कीमतों से, अफजल को फांसी न होने से, आदर्श सोसायटी और कॉमनवेल्थ घोटालों से, राजा और नीरा राडिया की दलाली से और यहां तक की नेताओं की शक्ल से लेकर उनकी अक्ल तक। लेकिन सब चुप हैं। क्यूंकि बोलने की आजादी हमें सिर्फ संविधान में ही दी गई है, वास्तविक जिंदगी में नहीं। आप बोल सकते हैं लेकिन सरकार के हक में। खिलाफत शासन को भी मंजूर नहीं है। आप घर के बाहर आवाज उठाइये और घर के अंदर आपकी बीबी या बहन के साथ बलात्कार हो जायेगा या फिर आपकी सड़क चलती बेटी को नेता के गुंडे उठाकर कार में गैंग रेप कर डालेंगे या फिर आपके जवान बेटे की लाश आपको चौराहे पर टंगी मिल जायेगी। और ये सब नहीं तो निपटाने के लिए तो आप हैं ही। कब तक साहब कब तक। कब तक तंत्र अपनी तानाशाही चलाता रहेगा और गण चुपचाप सहता रहेगा। ये गुस्सा किसी पत्रकार का नहीं है जनाब बल्कि ये गुस्सा तंत्र की तानाशाही में पिसते एक आम आदमी का है।

जाति, धर्म, भाषा, क्षेत्र आदि के नाम पर हिंदुस्तान तथा हिंदुस्तानियों को बांटते रहनेवाले अवसरवादी राजनेता अपनी घिनौनी हरकतें करते ही रहेंगे। केवल वोट की राजनीति करनेवाले भ्रष्ट, चरित्रहीन तथा स्वार्थी राजनेता अपना स्वयं का हित करने के चक्कर में देश और देशवासियों का अहित करते ही रहेंगे। झोपड़ी बनवाना, झोपड़ी बढ़वाना, फेरीवालों को जमा करना, अनधिकृत निर्माण कार्य करवाना, असामाजिक तत्वों तथा गुंडों को संरक्षण देना तथा ऐसे ही ग़ैर-क़ानूनी कार्यों को बढ़ावा देना, उन्हीं राजनेताओं का मुख्य उद्देश्य बन गया है, जो दूसरों के लिए क़ानून बनाते हैं, परंतु अपने आपको क़ानून के दायरे से दूर ही रखते हैं। शायद विश्वभर में हिंदुस्तान ही एक ऐसा महत्वपूर्ण गणतंत्रीय राष्ट्र होगा, जहां के अधिकतर राजनेता बलात्कार, दुराचार, हत्या, भ्रष्टाचार, व्यभिचार आदि में ही लिप्त रहते हैं फिर भी अपने आपको चरित्रवान, निष्ठावान, समाजसेवी, राष्ट्रसेवी तथा ईमानदार ही घोषित करते रहते हैं।

यह भी एक अति कड़वी सच्चाई है कि आतंकवादी, नक्सली तथा अन्य इसी प्रकार के उग्रवादियों के जन्मदाता तथा पालनकर्ता वास्तव में हमारे सफ़ेदपोश शांति के पुजारी कहलानेवाले राजनेता ही तो होते हैं। आजकल के दिखावे के समय में नागरिकों और देश की सुरक्षा के स्थान पर अपनी निजी सुरक्षा के प्रति अत्यधिक चिंतित रहनेवाले राजनेता पता नहीं क्यों, उन्हीं लोगों से डरे हुए रहने लगे हैं, जो उन्हें वोट देकर चुनते रहते हैं। ये राजनेता ही अधिकांश शिक्षा संस्थानों के प्रमुख होते हैं और इन्होंने ही शिक्षा को व्यापार बना रखा है। मैं यह समझ नहीं पाता हूं कि जो स्वयं संस्कारहीन होते हैं, वो दूसरों को किन संस्कारों की शिक्षा दे सकेंगे और जो खुद ही पथभ्रष्ट हो गये हैं, वो दूसरों का मार्गदर्शन कैसे कर सकते हैं। इन्हीं के प्रोत्साहन के कारण हिंदुस्तान जैसे महान गणतंत्र को `गण तंत्र’ बना देनेवाले लोग फल-फूल रहे हैं।

ग़रीब लोग देश के अनेक भागों में आत्महत्या करने पर मजबूर होते जा रहे हैं। कर्ज के बोझ के तले अनगिनत परिवार दबे हुए हैं। बढ़ती महंगाई ने आम आदमी की कमर ही तोड़ दी है, परंतु फिर भी दावा यही किया जा रहा है कि हिंदुस्तान और हिंदुस्तानी प्रगति कर रहे हैं। बेरोज़गारी बढ़ती ही जा रही है, परंतु आंकड़ों के जरिये यही प्रमाणित किया जा रहा है कि अधिकतर लोगों को रोज़गार उपलब्ध कराये जा रहे हैं। अनेक प्राकृतिक आपदाओं के कारण खेती को भीषण नुकसान उठाना पड़ रहा है, परंतु दावा यही किया जाता रहा है कि हिंदुस्तान में कृषि पैदावार बढ़ रही है। आवश्यक वस्तुओं के दाम सारी सीमाएं तोड़ते जा रहे हैं, परंतु घोषणा यही की जाती है कि मूल्यों को नियंत्रण में रखा जा रहा है। स्वास्थ्य सेवाएं हिंदुस्तान में अचानक आसानी से धन लूटने का साधन बनती जा रही हैं। कुपोषण के कारण लाखों बच्चे और बड़े असहाय तथा जर्जर अवस्था में पड़े हैं और मृत्यु का इंतजार कर रहे हैं और राजनेता चिल्ला-चिल्लाकर यही कहते रहते हैं कि किसी भी व्यक्ति को भूख या कुपोषण का शिकार नहीं होने दिया जायेगा।

भारत के 60 साल गणतंत्र की अनेक उपलब्धियों पर हम फख्र कर सकते हैं। लोकतंत्र में हमारी चरित्रगत आस्था का इससे बड़ा सबूत क्या हो सकता है कि दुनिया के सबसे बड़े और जटिल समाज ने सफलतापूर्वक 15 राष्ट्रीय चुनाव संपन्न किए। सरकारों को बनाया और बदला। विशाल और सशक्त सेना जनप्रतिनिधियों के आदेश पर चलने के अलावा कुछ और सोच भी नहीं सकती। पिछले एक दशक से हमारी आर्थिक विकास की रफ्तार लगभग 9 फीसदी बनी हुई है। 1975 के आपातकाल के कुछ महीनों के अलावा देश के नागरिक अधिकारों और मीडिया की स्वतंत्रता पर कोई राष्ट्रीय पाबंदी नहीं लग सकी, आदि।

दूसरी ओर, गैर बराबरी और भूख से हुई मौतों, किसानों द्वारा आत्महत्याओं, महिलाओं की असुरक्षा और बलात्कार, जातिवाद, सांप्रदायिकता, भ्रष्टाचार, अशिक्षा आदि कलंक भी हमारे लोकतांत्रिक चेहरे पर खूब दिखाई देते हैं, किंतु इन सबमें सबसे अधिक शर्मनाक देश में चलने वाली बच्चों की गुलामी और बाल व्यापार जैसी घिनौनी प्रथाएँ हैं। बाल वेश्यावृत्ति, बाल विवाह, बाल मजदूरी, बाल कुपोषण, अशिक्षा, स्कूलों, घरों और आस-पड़ोस में तेजी से हो रही बाल हिंसा से लगाकर शिशु बलात्कार जैसी घटनाएँ हमारी बीमार और बचपन विरोधी मानसिकता की परिचायक हैं। भारत में लगभग दो तिहाई बच्चे किसी न किसी रूप में हिंसा के शिकार हैं। 5 वर्ष से कम उम्र के लगभग 47 प्रतिशत बच्चे कुपोषित हैं। गैर सरकारी आँकड़ों के अनुसार 6 करोड़ बच्चे बाल मजदूरी और आर्थिक शोषण के शिकार हैं और इतने ही बच्चे स्कूलों से बाहर हैं।

कभी-कभी लगता है कि हम आज भी गुलाम हैं। बस पराधीनता का स्वरूप बदल गया है। हजारों साल पुरानी हमारी इस सभ्यता को कई बार गुलाम बनाया गया और कई वंशों और सभ्यताओं ने हम पर शासन किया। पर कभी-कभी ऐसा लगता है कि आज भी कोई हम पर शासन कर रहा है। शायद हमारी अपनी ही बनाई व्यवस्था के अधीन कभी-कभी हम अपने आप को जकड़ा हुआ महसूस करते हैं। पता नहीं हमारे सत्ताधीशों को इस पर शर्म आएगी कि नहीं? वे गणतंत्र दिवस समारोह की चकाचौंध में उस गण की दशा की ओर शायद ही देखना चाहें, जिसके बूते वे भारतीय गणतंत्र के स्तंभ बनने का दंभ पाले हुए हैं। वास्तव में देश भी महान है, देशवासी भी महान हैं, देशवासियों की सहनशीलता भी महान है और अत्याचार करनेवालों की कर्तव्यपरायणता भी महान है। अपनी लाचारी, मजबूरी, निष्क्रियता, संवेदनहीन आलसीय प्रवृत्ति, टालने की आदत और अपने भाग्य को कोसते रहने की आदत को नतमस्तक हो प्रणाम करनेवाले हम सब हिंदुस्तानियों को एक और गणतंत्र दिवस की “हार्दिक बधाई”।

हाल ही में मेरे प्रिय कवि विनीत चौहान की कुछ पंक्तियां यू-टयूब के माध्यम से मुझे सुनने को मिली। इस गणतंत्र के मौके पर पंक्तियां सटीक बैठती हैं-

सांप, नेवले और भेडि़ये एक दूजे के मीत मिले,
सारे सिंह मुलायम निकले मिमियाते सुरजीत मिले,
चरण चाटते हुए मिले सब राजनीति की ड्योडी पर,
और पीएम शीश झुकाये बैठे दस जनपथ की सीढ़ी पर।।।

लेखक अंकुर विजयवर्गीय हिन्‍दुस्‍तान टाइम्‍स, दिल्‍ली में वरिष्‍ठ कॉपी एडिटर हैं.

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