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मीडिया मंथन

गमलों में खेती कर रहा है भारतीय मीडिया

: पाश्‍चात्‍य संस्‍कृति की पिछलग्‍गू बन चुकी है भारतीय मीडिया : भारतीय मीडिया का समग्र ढांचा कहीं न कहीं पाश्चात्य मीडिया के अनुसरण पर आधारित है। इतिहास गवाह है मीडिया शब्द को वैश्विक स्तर के अनेक पत्रकारों ने खून-पसीने से सींचा है। प्रख्यात ‘द टाईम्स’ ने एक सिद्धान्त बनाया था कि समाचार पत्र भण्डाफोड़ से जीवित रहते हैं। ‘द टाईम्स’ को सरकार की आवाज कहा जाता था। सरकारों द्वारा ‘द टाइम्स’ को अपने पक्ष में करने की कोशिश की गई थी तब इसने इस सिद्धान्त को बनाया था। अमेरिका के निक्सन जैसे राष्ट्रपति को ‘वाशिंगटन पोस्ट’ ने इस्तीफा देने पर विवश कर दिया था। साहस, दिलेरी, हौसला, हिम्मत, निडर, अटल आदि शब्द पहले पत्रकारों के लिए प्रयोग किये जाते थे। अब ये कुछ पत्रकारों के लिए विलोमार्थी बनकर रहे गये है।

: पाश्‍चात्‍य संस्‍कृति की पिछलग्‍गू बन चुकी है भारतीय मीडिया : भारतीय मीडिया का समग्र ढांचा कहीं न कहीं पाश्चात्य मीडिया के अनुसरण पर आधारित है। इतिहास गवाह है मीडिया शब्द को वैश्विक स्तर के अनेक पत्रकारों ने खून-पसीने से सींचा है। प्रख्यात ‘द टाईम्स’ ने एक सिद्धान्त बनाया था कि समाचार पत्र भण्डाफोड़ से जीवित रहते हैं। ‘द टाईम्स’ को सरकार की आवाज कहा जाता था। सरकारों द्वारा ‘द टाइम्स’ को अपने पक्ष में करने की कोशिश की गई थी तब इसने इस सिद्धान्त को बनाया था। अमेरिका के निक्सन जैसे राष्ट्रपति को ‘वाशिंगटन पोस्ट’ ने इस्तीफा देने पर विवश कर दिया था। साहस, दिलेरी, हौसला, हिम्मत, निडर, अटल आदि शब्द पहले पत्रकारों के लिए प्रयोग किये जाते थे। अब ये कुछ पत्रकारों के लिए विलोमार्थी बनकर रहे गये है।

अमेरिका, रूस, फ्रांस, ब्रिटेन, जापान, इटली एवं भारत सरीखे देशों में मीडिया का निडर इतिहास स्पर्णाक्षरों में अंकित है। वर्तमान में मीडिया को कुछ लोग गिरगिट के रंग तरह इस्तेमाल कर रहे है, बाहर कुछ अन्दर कुछ। चाहे पीआईबी अथवा राज्य स्तर पर मान्यता प्राप्त पत्रकार बनने का मामला हो, अथवा विज्ञापन सहेजने में सर्कुलेशन, अथवा टीआरपी का तिलिस्म हो, अथवा मीडियाई दादागीरी का चस्का हो, अथवा सरकारी घपलों को बाईपास करने की कला हो, अथवा थानों से कुछ मिलने का इंतजार हो, अथवा चुनावी रणभेरी में चैपाया कार सहित दूध का स्वाद हो। कुछ लोग इस शब्द का बखूबी इस्तेमाल कर रहे हैं, जो कि मीडिया के लिए लाईलाज बीमारी सदृश है। मीडिया आखिर चुप क्यों है? मीडिया आखीर मजबूर क्यों है? इस प्रश्न के जवाब के लिए अकबर इलाहाबादी का शेर ‘हिस्ट्री देखी तो कामील यकीं आया, उसे जीना नहीं जिसे मरना नहीं आया’ ही पर्याप्त है। शायद मीडिया के कुछ लोगों के लिए समाज से ज्यादा अपना परिवार प्यारा हो गया है अथवा मीडिया अपने नैतिक जिम्मेदारियों को सीमा पर तैनात सैनिको की भांति नहीं निभा पा रही है।

मीडियाई नैतिकता से कहीं ज्यादा अपनी जान प्यारी हो गयी है। युद्ध में जब सैनिक जाते हैं तो वे पीछे जीते जी नहीं हटते और शायद इसी वजह से किसी भी देश की सीमा सुरक्षित है। देश के भीतर की जिम्मेदारी मीडिया की है। जनता को जगाना मीडिया का काम है। लेकिन मीडिया पाश्चात्‍य शोधों पर चल रही है और चलेगी क्यो नहीं? यहां गमले में खेती जो हो रही है। गमले बराबर जनसंख्या अंग्रेजी जानने वाले वर्ग की है। और समूचा देश अंग्रेजी झेलने पर विवश है। इतिहास गवाह है पिछले एक हजार साल में यहां कोई भी महत्वपूर्ण आविष्कार नहीं हुये और ना ही ट्रांसलेशन से कोई आविष्कार होने भी वाला है। जनता विषयज्ञान से अधिक भाषाज्ञान में अपनी उर्जा नष्ट कर रही है। स्वदेशी का दमन अपने चरम पर है। जापान, चीन बिना अंग्रेजी के अपने स्वदेशी भाषा से ही चोटी पर मौजूद हैं। लेकिन यहां थूथूरलोजी व्याप्त है, राममनोहर लोहिया, महात्मा गांधी, बाल गंगाधर तिलक सरीखे बुद्धिजीवी, जिनका पुरजोर कोशिश था कि हिन्दी सबकी भाषा हो, को कुछ बुद्धिजीवी अपने थुथुरवाद से दरकिनार रख छोड़े हैं और कामिल बुल्के, भार्गवा एवं ऑक्सफोर्ड की अंग्रेजी डिक्सनरियां, अंधों की भांति चश्मा खंगालने में लगे हैं और गमले में खेती करवा रहे हैं।

मीडिया को यह नहीं भूलना चाहिए कि देश का आंतरिक पक्ष मीडिया पर निर्भर है। असहाय जनता मीडिया से आशान्वित है कि मीडिया के होते हुए प्रजातंत्र कायम रहेगा। लेकिन मीडिया अपने दायित्वों का पालन नहीं कर पा रही है। मीडिया के बुद्धिजीवी पत्रकार मीडिया में काम तो करते हैं लेकिन तोप मुकाबिल हिम्मत उनमें नहीं बचा है। मीडिया व्यापार बन चुका है। देशहित से ज्यादा विज्ञापन हित मायने रखने लगा है। बहुत कम लोग देशहित में मीडिया में लिख रहे हैं। और शायद उन्हीं लोगों की वजह से मीडिया की मर्यादा कायम है। उन सपूतों पर देश गर्वान्वित है। राहुल गांधी का वक्तव्य आया है कि राजनीति में आम आदमी का प्रवेश आसान नहीं है। इससे स्पष्ट है कि राजनीति में भ्रष्टाचार, लूट-खसोट अपने चरम पर है। राजीव गांधी सरकारी धन के जनता तक पहुंचने का प्रतिशत पहले ही बता कर गये थे।

मीडिया के विभिन्न माध्यमों में आजकल वही छप रहा है जो प्रशासन ने मीडिया को लिखवाया है। मीडिया सरकार का पिछलग्गू हो गया है। पहले पत्रकार आम जनता एवं सरकारों तक जाते थे लेकिन अब आम जनता पत्रकारों के पीछे भाग रही है। मीडिया के पास आम जनता के लिए समय नहीं है। समाचार की परिभाषायें छह ककहरों सहित कुछ पाश्चात्य सिद्धान्त रूपी तत्वों में तब्‍दील हो गईं हैं। पहले चमचागीरी, घूसखोरी जैसे शब्द जबान लड़खड़ा देते थे। लेकिन आज के परिवेश में सच्चाई बोलने में मीडिया सहित सबकी जबानें लड़खड़ाने लगी हैं। नल, चापाकाल, पुल खराब है जैसे न्यूज में रत्ती भर भी दिलेरी नहीं है? और मीडिया इन्हीं समाचारों, और सरकारी आदेशों एवं न्यूज एजेन्सियों से मिले समाचारों को छापकर अपने कर्तव्यों का इतिश्री कर रही है।

कानून मंत्री से लेकर मुख्य न्यायधीश तक न्यायपालिका में व्याप्त भ्रष्टाचार की चर्चा कर चुके है। जबकि हाल ही में 6 मुख्य न्यायधिशों के भ्रष्ट होने का मामला प्रकाश में आया है। भ्रष्टाचार के कीड़े कैंसर सदृश हो गये हैं। नानावती आयोग, कृष्णा आयोग, मुखर्जी आयोग सरीखे आयोगों को समय का घुन खोखला कर चुका है। अफजल की फांसी, कसाब एवं मुम्बई सरीखे अनेकों मामलों में समूचा देश शर्मिन्दा हैं। कांग्रेस सरकार हर मोर्चे पर विफल रही है। मनमोहन सरकार महंगाई नियंत्रित करने में अक्षम है। जनसंख्या मुद्दा जाति नामक कैंसर से मर चुका है। जातिवाद के विषबेल अपना पैर फैला चुके हैं। और मीडिया चुप है। महंगाई अपने चरम पर है। और कुछ वरिष्ठ पत्रकार सम्पादकीय लिखकर अपनी इतिश्री कर रहे हैं।

गरीब और अमीर की खाई निरंतर घटने के बजाय लगातार उन्‍नति की ओर अग्रसर है। मीडिया तबका पूंजिपतियों के विज्ञापन के अंधकार तले शान्त है। एनजीओ और अधिकारियों की बंदरबांट में निरंतर वृद्धि जारी है। वोटबैंक का जीन राजनीति का खंभा बन गया है। बुद्धिजीवी पत्रकार ये सब जानते हुए चुप हैं। कौआ मोती चुन रहा है और हंस दाने-दाने को मोहताज है। स्लमडॉग मिलेनियर सरीखे फिल्म भारत की बजाय हॉलीवुड द्वारा निर्मित हो रहे हैं। पीपली लाईव सरीखी फिल्में आसमान में धूल सरीखी हैं। दंड संहिता सहित अनेको अधिनियम अंग्रेजों के बनाये अभी भी हुबहू मौजूद हैं। सीबीआई के कर्मचारी फर्जी एचआरए ले रहे हैं। सरकारी बजट कारू का खजाना बन रह गया है। सरकारी गाड़िया घर की हो गई हैं। बीबी, बच्चे, रिश्तेदार गाड़ियों पे मेहरबान है। टीए, एलटीसी, मानदेय तो अलग अध्याय है। घूसखोरी के अध्याय बनने शुरू हो गये हैं और उन अध्यायों का भगवान मालिक है।

सरकार और बुद्धिजीवी प्रचार में लगे हैं कि इंफ्रास्ट्रक्चर का विकास हो रहा है, वो भी शीशे इटली से, इलेक्ट्रॉनिक सामग्री चीन आदि से मंगवाकर। अपने देश में सुपर कम्प्यूटर परम 10000 बन रहा है, पर यहां एक ढंग की मोबाईल निर्माता कंपनी तक नहीं है। सब डुप्लीकेट है। हवाई जहाज के पुर्जे यहां बनते हैं और सांचे विदेश से आते हैं और जो आते हैं बस उन्हीं पर बनाकर अपना नाम करना है। अधिकतर इलेक्ट्रॉनिक, स्वास्थ्य उपकरण चीन से थोक में अपने मनचाहे नाम से बनवाकर यहां बिक्री कर रहे हैं। और चीन मास प्रोडक्शन का फायदा ले रहा है। जिस वैश्विकरण का विरोध सत्तर-अस्सी के दशक में सभी विकासशील देशों द्वारा किया जाता रहा, उसी को आज विकास का जीन मान लिया गया है।

मीडिया जनता की परेशानियों के बजाय छह ककारों और वरिष्ठ पत्रकारों द्वारा मिले समाचार की परिभाषाओं पर ध्यान लगाये हुये हैं। माफिया और सरकार मीडिया का गला घोंटने पर उतारू है। शायद यही वजह है कि कुछ बुद्धिजीवी पत्रकार सब जानते हुए चुप हैं। और यही चुप्‍पी खतरनाक है। आपातकाल एवं आजादी की लड़ाई में भी जिस मीडिया ने घुटने नहीं टेके वो आज टेक रही है। स्टिंग ऑपरेशन बंद हो चुके हैं। अपराधी हत्या का करोबार त्याग, शैक्षिक संस्थाओं, एनजीओ को अपने कमाई का जरिया बनाने लगे हैं। तानाशाही का दौर शुरू हो चुका है। गरीब के जबान पर ताला लग चुका है। पूंजीपति और प्रख्यातों के बोल सहित, संशय आदि समाचार बन जाते हैं क्योंकि पाश्चात्य मीडिया ने इस सिद्धान्त को बनाया है। पीपली लाईव, गजनी सरीखे फिल्म मीडिया के लिए न्यूज के पिटारे हो जाते हैं।

देश में पहली बार हिन्दी में पत्र व्यवहार करने पर मंत्रालयीय नौकरशाहों द्वारा माफी मांगना न्यूज नहीं बनता। प्रधानमंत्री कार्यालय राजभाषा का अनादर पर अनादर किये जा रहा है और समाचार-पत्र कार्यालय जाने पर पत्रकार मिलने को तैयार नहीं। पत्रकारों को जनता से नहीं उनके प्रेस विज्ञप्ति से ज्यादा सरोकार हो गया है। अगर कोई अनपढ़ है और समाचार कार्यालय जाता है तो अखबार कार्यालय के चैकीदार ही उसको टरका देते हैं, तो कैसी मीडिया कैसा न्याय? दरअसल मीडिया को रेडिमेड न्यूज की आदत लग गई है। न्यूज एजेन्सी, प्रेस विज्ञप्ति, सरकारी आदेश, टीए, डीए, बोनस वृद्धि, आयकर सरीखे सरकारी आदेश और फीचर एजेन्सी के तलवों पर मीडिया चलने को आतुर हो चुकी है। न्यूज और विज्ञापन परस्पर मिल गये हैं। एडवरटोरियल और न्यूज का परस्पर सामंजस्य स्थापित हो चुका है। हो रहे भ्रष्टाचार, अत्याचार पर आवाज उठाने पर विज्ञापन न मिलने सहित अन्य संशयों जैसे- सूचना मांगने वाले उन वीरों के हुये हश्र से भी कुछ लोग परेशान है।

शायद इसी डर से मीडिया चुप है। कारर्पोरेटिज्म का भूत सभी क्षेत्रों में सर चढ़ कर बोल रहा है। भारतीय जनता चिन्तामग्न है कि कोई भ्रष्टाचार नापने का यंत्र बने ताकि भ्रष्टाचारियों का विनाश हो सके। अथवा कोई अवतार हो वो चाहे किसी धर्म से हो लेकिन भ्रष्टाचार, जातिवाद खत्म हो। डिग्रियां बिक रही हैं। समानता का गला कबका घोंटा जा चुका है। एक ही कोर्स के अनेकों फीस है। एक ही पद के अनेकों भर्ती नियम हैं। अफसरशाही, चमचागरीरी, हरामखोरी अपने शबाब पर है। सरकारी कर्मचारियों को मिलने वाले वेतन और प्राइवेट कालेज एवं संस्थाओं के वेतन के अनुपात में जमीन-आसमान का अन्तर आ गया हैं। खीचों न कमानों को न निकालों तलवार, जब तोप मुकाबिल हो तो निकालों अखबार में ही मीडिया की नींव होनी चाहिये। मीडिया का झुकने का मतलब है भ्रष्टाचारियों की आजादी।

लेखक विकास भारतीय पत्रकारिता के छात्र हैं.

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