: कुछ बातें बेमतलब : सुबह-सुबह पता चला कि एम जी रोड के मालिक मो क गांधी हाथ में लाठी लिये अंतरराष्टीय अहिंसा दिवस 2 अक्तूबर हो गए हैं। समझ में नहीं आता कि यह देश मो क गांधी का बुनियादी संदेश क्यों नहीं मानता। मानता होता तो देश के राजचिन्ह में एक छिपा और तीन दिखा सिंह नहीं होता। सिंह तो अहिंसा का प्रतीक नहीं है। अहिंसा का प्रतीक तो मो क गांधी का तीन बंदर हैं। यह और बात है कि बंदरबांट इस देश का बुनियादी फार्मूला है। देखा नहीं कि कैसे सबको सनमति देते हुए न्यायपालिका ने बंदरबांट कर दी। अगर देश मो क गांधी के तीन बंदरों को मानता तो क्या होता। पहला संदेश होता बुरा मत देखो।
किसी को नहीं दिखता का़मनवेल्थ खेल का बंदरबांट। राजनीतिक दलों के टिकट बंटवारे में परिवारवाद नहीं दिखता। गंदगी नहीं दिखती। हम सब लोग जो देखते रहते हैं, वह सब नहीं दिखता। जब कुछ दिखता ही नहीं तो हम क्या होते। वही कहावत होते कि सावन के नेत्रहीन को सब हरा-हरा ही दिखता है। अब सवाल है कि जब बुरा दिखता ही नहीं तो बुरा बोलते ही नहीं। और जब बुरा बोलते ही नहीं तो क्या बोलते। जैसे चिदंबरम को अयोध्या फैसले के समय सबको सनमति दे भगवान याद आता है, वैसा ही कुछ बोलते। कितना लाभ होता देश का कि जब कोई बोलता ही नहीं तो लगातार कचर-कचर बकर-बकर करने वाले टीवी चैनल बोलते रहते कि दे दी हमें आजादी तूने बिना खडग बिना ढाल, साबरमती के संत तूने कर दिया कमाल !
अब तीसरे बंदर की बारी। दरअसल इसके लिए कुछ काम ही नहीं बचा है। बुरा कोई देखता नहीं, बुरा कोई बोलता नहीं – तो यह बेचारा बुरा सुनता कहां से। तब देश में सच्चा लोकतंत्र होता। आज जैसा वोट तंत्र नहीं होता। एक वोट क्या दे दिया सब कुछ बुरा-बुरा ही दिखता है। दिखता ही नहीं बोलने भी लगते हो। यह भी कोई बात हुई। कोई सबक ही नहीं सीखा मो क गांधी से अहिंसा का। इसलिए मो क गांधी की बात मानो। कायदे की बात यह भी है कि मो क गांधी की बात कभी मत मानो। इसके लिए उनके तीन बंदर में से बुरा मत सुनो को अपना सकते हो। जब सुना ही नहीं तो मानने न मानने का सवाल ही नहीं पैदा होता।
अब मो क गांधी की लाठी पर बौद्धिक बहस भी होनी चाहिए। लाठी वृद्धजन का सहारा भी है, इसे हम 1 अक्तूबर को मान चुके हैं क्योंकि यह वृद्ध जन दिवस है। चूंकि मो क गांधी लाठी भांजते नहीं थे, इसलिए उनकी लाठी चली या नहीं चली पर कोई बहस नहीं हो सकती। पर जिसकी लाठी उसकी भैंस चली। इसी लिए मो क गांधी बकरी का दूध पीते थे। उन्हें पता था कि भैंस का कोई भरोसा नहीं है। जिसके पास लाठी होगी ले जाएगा। अब जब हम 1 अक्तूबर को वृद्धजन दिवस, 2 अक्तूबर को अहिंसा दिवस मना ही चुके हैं तो 3 अक्तूबर को नेशनल भ्रष्टाचार दिवस भी मनाना चाहिए। शायद हमसे प्रेरणा ले कर यह कभी इंटरनेशनल करप्शन डे के तौर पर मनाया जाए। कम से कम मो क गांधी महात्मा गांधी मानने से तो इनकार कर ही दिया उनके भारत वर्ष ने।
जुगनू शारदेय हिंदी के जाने-माने पत्रकार हैं. ‘जन’, ‘दिनमान’ और ‘धर्मयुग’ से शुरू कर वे कई पत्र-पत्रिकाओं के संपादन/प्रकाशन से जुड़े रहे. पत्रकारिता संस्थानों और इलेक्ट्रोनिक मीडिया में शिक्षण/प्रशिक्षण का भी काम किया. उनके घुमक्कड़ स्वभाव ने उन्हें जंगलों में भी भटकने के लिए प्रेरित किया. जंगलों के प्रति यह लगाव वहाँ के जीवों के प्रति लगाव में बदला. सफेद बाघ पर उनकी चर्चित किताब “मोहन प्यारे का सफ़ेद दस्तावेज़” हिंदी में वन्य जीवन पर लिखी अनूठी किताब है. इस किताब को पर्यावरण मंत्रालय ने भी 2007 में प्रतिष्ठित “मेदिनी पुरस्कार” से नवाजा. फिलहाल दानिश बुक के हिन्दी के कंसल्टिंग एडिटर हैं तथा पटना में रह कर स्वतंत्र लेखन कर हैं.

