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गोलियों की परवाह न करते हुए छात्रों ने तिरंगा फहरा दिया

: 12 अगस्‍त पर विशेष : वैसे तो साल के हर दिन और हर माह आजादी कि जंग के गवाह हैं लेकिन अगस्त के महीने का १२ तारीख क्रांतिवीरों की शहादत की गाथा को इतिहास के पन्नों में लिखे अक्षरों को कुछ ज्यादा ही चमकदार बना दिया है.  फ़रवरी १९४२ में जब गान्धी जी ने आजादी की अंतिम लडाई के लिए हुंकार भरी तो क्रांतिवीरों का खून अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ खौल उठा. फ़रवरी १९४२ से जुलाई १९४२ तक इन ५ महीनों में जंगे आजादी की धार को तेज करने कि रणनीति बनायीं गयी. अंग्रेजी हुक्मरानों को जब गांधी जी की इस योजना की जानकारी हुयी तो वह आन्दोलन को नष्‍ट करने के लिए देश के हर हिस्से से छोटे-बड़े नेताओं को गिरफ्तार करना शुरू कर दिया. नेताओं कि गिरफ्तारी ने हिन्दुस्तान के युवाओं की रग़ में बह रहे खून की गति को बढ़ा दिया.  १२ अगस्त १९४२ के दिन  युवाओं के निशाने पर आ गए सरकारी भवनों पर फहर रहे अंग्रेजी यूनियन जैक.

: 12 अगस्‍त पर विशेष : वैसे तो साल के हर दिन और हर माह आजादी कि जंग के गवाह हैं लेकिन अगस्त के महीने का १२ तारीख क्रांतिवीरों की शहादत की गाथा को इतिहास के पन्नों में लिखे अक्षरों को कुछ ज्यादा ही चमकदार बना दिया है.  फ़रवरी १९४२ में जब गान्धी जी ने आजादी की अंतिम लडाई के लिए हुंकार भरी तो क्रांतिवीरों का खून अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ खौल उठा. फ़रवरी १९४२ से जुलाई १९४२ तक इन ५ महीनों में जंगे आजादी की धार को तेज करने कि रणनीति बनायीं गयी. अंग्रेजी हुक्मरानों को जब गांधी जी की इस योजना की जानकारी हुयी तो वह आन्दोलन को नष्‍ट करने के लिए देश के हर हिस्से से छोटे-बड़े नेताओं को गिरफ्तार करना शुरू कर दिया. नेताओं कि गिरफ्तारी ने हिन्दुस्तान के युवाओं की रग़ में बह रहे खून की गति को बढ़ा दिया.  १२ अगस्त १९४२ के दिन  युवाओं के निशाने पर आ गए सरकारी भवनों पर फहर रहे अंग्रेजी यूनियन जैक.

यूनियन जैक को उतार फेंकने और हिन्दुस्तानी इमारतों पर तिरंगा फहराने को बेताब युवाओं और छात्रों के कदम सड़क पर आ गए. पढ़ने के लिए बस्तों में रखी किताबें घर के कमरों में कैद हो गयीं और हाथ में आ गया तिरंगा.  देश के बलिया, पटना, जबलपुर और अन्य शहरों के साथ-साथ

तिलक कालेज

उत्तर प्रदेश के औरैया के छात्रों ने अंग्रेजी सेना के खिलाफ ऐसा कोहराम मचाया कि अंग्रेजी शासकों की नींद उड़ गयी.  यूनियन जैक को उतारकर कुचलने और तिरंगा फहराने की जद्दोजहद में औरैया के ६ छात्र अंग्रेजी पुलिस की गोलियां खाकर शहीद हो गए थे,  जबकि जमीन पर घायल पड़े दर्जनों छात्र भारत माता कि जय  बोलते हुए अपनी बहादुरी का लोहा मनवा रहे थे.  औरैया के छात्र अपने मकसद में कामयाब हो गए थे. १२ अगस्त १९४२ को घटी यह घटना उत्तर भारत की सबसे बड़ी घटना थी.

जेल में कैद भारतीय नेताओं के कानों ने जब औरैया के छात्रों की हुंकार सुनीं तो उनके मुंह से निकल पड़ा इन्कलाब जिंदाबाद.  ईंट और गारे से बनी उत्तर प्रदेश के औरैया की सदर तहसील और यहीं के तिलक इंटर कालेज की यह इमारत कोई आम इमारतों में से नहीं है. इन इमारतों में लगी एक-एक ईंट गांधी जी के आंधी से शुरू हुयी आजादी की जंग के हर पल की गवाह हैं.  अपने सर पर गड़े अंग्रेजी यूनियन जैक से हमेशा – हमेशा के लिए मुक्ति पाने के लिए औरैया सदर तहसील की यह इमारत कुछ दूरी पर स्थित अपने छात्रों को वतन पर मर मिटने की शिक्षा दे रहे

विजय शंकर गुप्‍ता

तिलक इंटर कालेज के इस इमारत को निहार रही थी. तहसील के इस इमारत के दर्द को समझकर कालेज की बिल्डिंग मचल उठी. कालेज ने अपने छात्रों को ऐसा झकझोरा कि उनके पैर सड़क की ओर बढ़ चले. किताबें बस्तों में सिमट कर घरों में कैद हो गयीं और छात्रों के हाथ में तिरंगा आ गया.

आजादी की आग ने छात्रों को इतना गरम कर दिया कि उनके सामने अंग्रेज पुलिस बौनी नजर आने लगी. अंग्रेजों की कोई भी कोशिश औरैया के छात्रों के पैरों को रोक नहीं सकी. तिलक इंटर कालेज के छात्र सुलतान खान, बाबूराम, कल्याण चन्द्र, मंगली प्रसाद, दर्शन लाल और भूरेलाल औरैया तहसील की इमारत पर चढ़ गए और गुलामी के प्रतीक लगे यूनियन जैक को उतारकर रौंदते हुए तिरंगा फहरा दिया.  छात्रों की इस हरकत से बौखलाई अंग्रेजी पुलिस ने छात्रों पर २० राउण्ड गोलियां दाग दीं,  जिससे ६ छात्र भारत माता की जय बोलते हुए वहीँ शहीद हो गए,  जबकि कई दर्जन छात्र घायल होने के बावजूद अंग्रेज पुलिस से लोहा लेते रहें. घायल हुए उन क्रांतिवीरों में विजय शंकर गुप्ता आज भी ज़िंदा हैं. अपने पैर में लगी गोली के घाव को दिखाते हुए जब वह १२ अगस्त १९४२ का हाल सुनाते हैं तो शरीर में सिहरन हो जाती है.

चम्बल का इलाका आजादी की लड़ाई में अपने गौरवशाली इतिहास को समेटे हुए है. हालांकि चंबल घाटी का नाम आते ही हमारे जेहन में भय समा जता है लेकिन आजादी कि जंग के लिए नेताओं के नारों ने यहाँ के खूंखार डकैतों के जेहन में भी देश भक्ति का जज्बात पैदा कर दिया था.

औरैया तहसील

चम्बल के ब्रह्मचारी डाकू अपने गिरोह के साथ अंग्रेजों के खिलाफ गुरिल्ला युद्ध लड़ने लगे. शहर में छात्र अंग्रेज पुलिस से दो- दो हाथ करने को बेताब थे तो यमुना और चम्बल नदी के किनारे जंगलों में छिपे डाकू शहर की सीमा में घुसने को बेताब दूसरे जिलों से आने वाली अंग्रेजी पुलिस को खदेड़ने में लगे थे. औरैया के क्रांतिकारियों का यह दूसरा सबसे बड़ा आन्दोलन था. इससे पहले औरैया के क्रांतिकारी भारतवीर मुकुंदीलाल ने ९ अगस्त १९२५ को अपने साथियों के साथ काकोरी में सरकारी खजाना ले जा रही ट्रेन को लूट कर अंग्रेजी हुक्मरानों को भारतीय क्रांतिवीरों की ताकत का अहसास करा दिया था. काकोरी काण्ड के इस नायक भारतवीर मुकुंदीलाल द्वारा अपने जिले के युवाओं में भरा गया जोश आजादी मिलाने तक जारी रहा.

अपने निजी हितों को त्याग कर गुलामी में जकडे़ भारत माता की आजादी के लिए अपना सब कुछ लुटा चुके देश के अमर सपूतों की चौराहों पर प्रतिमाएं लगाकर सरकारें अपने कर्तव्‍य को पूरा मान बैठी है. चौराहों पर लगीं महापुरुषों की प्रतिमाएं किस हालत में हैं उसे बताने कि जरूरत नहीं आप अपने शहर के चौराहे को ही लीजिये. आजाद भारत के नेताओं ने आजादी के इन नायकों की जो दशा की है उसे देख स्‍वर्ग में बैठे हमारे अमर सपूत देश की दिशा और दशा पर चिंतित जरूर होंगे.

लेखक सुरेश कुमार मिश्र औरैया में पत्रकार हैं.

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