: ग्रामीण पत्रकारों को पहचान पत्र तक नहीं दिया जाता है : आज के इस दौर में मीडिया के ऊपर समाज की अहम जिम्मेदारी है. समाज में एकरूपता लाने के लिए मीडिया हर मुमकिन कोशिश करने का दावा करता है. लोगों को जागरूक करने का स्वांग करता है. लेकिन खुद मीडिया के भीतर ही एकरूपता नहीं है. मीडिया के सर्वोच्च पद पर आसीन लोग अपने निचले पायदान पर खड़े होने वाले रिपोर्टरों का ध्यान नही देते हैं. गाहे बगाहे ग्रामीण इलाके के पत्रकारों का शोषण भी करते हैं. पत्रकारिता के समाज का यह दलित वर्ग बड़ी से बड़ी खबरें सबसे पहले शीशों के घरों में काम करने वाले बुद्धिजीवी पत्रकारों तक पहुंचाता है. ग्रामीण अंचलों में जान जोखिम में डाल कर काम करने वाले तमाम बड़े अखबारों के रिपोर्टरों को मानदेय की कौन कहे, उन्हें पहचान पत्र तक नही दिया जाता है.
अथक मेहनत कर अखबार में जान डालने वाले का शोषण उनके ब्यूरो कार्यालय से ही शुरू हो जाता है। कई बार तो अच्छी खबरों पर बाईलाइन भी नही दी जाती है। एक भी खबर छूटने पर ना सिर्फ काम से निकाले जाने की धमकी दी जाती है, बल्कि कभी कभी तो गुलाम मजदूरों की तरह व्यवहार भी किया जाता है. इस स्थिति में ग्रामीण रिपोर्टरों का भविष्य लगातार अनिश्चित होता जा रहा है। हर त्योहार, तमाम लोगों के पुण्यतिथि और जन्मदिवस पर विज्ञापन लाने के फरमान सुनाए जाते हैं. रिपोर्टर खबर लाने के साथ विज्ञापन के लिए भी दौड़ता है. इसके लिए संस्थान की तरफ से फूटी कौड़ी नहीं दी जाती है. बाद में विज्ञापन लाने वाले रिपोर्टरों को कमीशन देकर शांत कर दिया जाता है. दूसरों के शोषण प्रकाशित करने वाले रिपोर्टर खुद शोषण हो रहा है, लेकिन वे किसी से कह नही सकते हैं. प्रबंधन भी इस अहम समस्या की तरफ ध्यान नही देता है.
ऊंचे पदों पर मंहगे वेतन और पैकेज को देने में प्रबंधन को कोई दिक्कत नहीं होती. लेकिन जब बात ग्रामीण पत्रकारों को होती है तो प्रबंधन को सांप सूंघ जाता है. प्रबंधन को कभी नहीं लगता कि ग्रामीण अंचलों में अखबार की अलख जगाने वाले को भी कुछ दे दिया जाए. यहां तक कि अखबार प्रबंधन यही समझता हैं कि ग्रामीण क्षेत्रों में रिपोर्टिंग करने वाले सभी लोगों का खर्चा अपने आप या ऊपरी आमदनी से ही चल जाता है, जबकि यह तथ्य बिल्कुल गलत है. कुछ अखबार वाले मानदेय के नाम पर दो से पांच सौ रूपये देते हैं लेकिन उससे फोन और फैक्स का ही खर्च नही निकलता है। दैनिक जागरण, अमर उजाला, हिन्दुस्तान जैसे बड़े समूहों द्वारा अपने ग्रामीण रिपोर्टरों को मानदेय के नाम पर ढाई सौ रूपये से एक हजार रूपये दिया जाता है, जो आज के दौर में काफी कम है. ज्यादातर स्थानीय रिपोर्टरों को परिचय पत्र नही दिया जाता है. जिनका ऊपर संबंध ठीक है, जो वरिष्ठों को खुश रखते हैं उन्हें परिचय पत्र मिल जाता है. जिनके पास इस तरह का जुगाड़ नहीं होता उन्हें परिचय पत्र मिलना दूर की कौड़ी होती है. खास मौकों पर रिपोर्टिंग करने में परिचय पत्र जरूरी होता है.
आज जब महंगाई ने लोगों का जीना हराम कर रखा है. क्या ग्रामीण क्षेत्र में काम करने वाले पत्रकारों का खर्च या जरूरतें नहीं बढ़ी हैं? इसके बाद भी ग्रामीण इलाके का पत्रकार अपनी आवाज नहीं उठा सकता. अखबार के लिए आधी उम्र गुजारने के बाद भी कब लात मारकर बाहर निकाल दिया जायेगा कहा नहीं जा सकता. अस्थाई ही सही नौकरी की कोई गारंटी नहीं है. किसी दिन किसी वरिष्ठ को गुस्सा आ गया तो अगले ही दिन बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता है. इसके लिए ना तो कोई सुनवाई होती है और ना ही कहीं किसी मंच पर आप अपनी बात रख सकते हैं. लोकतांत्रिक देश में भी ग्रामीण पत्रकारों के लिए ना तो कोई लोकतंत्र है और ना ही कोई न्यायतंत्र. अखबार के लिए दिनरात एक करने वाले लोगों के साथ ऐसा बर्ताव कहां तक जायज कहा जा सकता है. करोड़ों की कोठियों में रहने वाले अखबार मालिक तथा वरिष्ठों को सोचना चाहिए कि उनकी कोठी की नींव शहरों से ही नहीं गांवों की गलियों से होकर भी बनती है.
लेखक केके मिश्र पत्रकार हैं.

