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राजनीति-सरकार

घाघ नेताओं का खेल?

राजनीति से मर्माहत एक विद्वान ने कहा था कि ‘पॉलिटिक्स इज द गेम आफ स्कॉन्ड्रल्स’ अर्थात राजनीति ‘घाघ लोगों का खेल’ है। 15वीं लोकसभा पर यह कहावत सटीक बैठती है। यह सही है कि भारतीय लोकतंत्र मजबूत हुआ है, लेकिन इससे भी ज्यादा सत्य यह है कि आजादी के 64 साल में ही संसदीय व्यवस्था और संसदीय प्रक्रिया में भारी गिरावट आई है। संसद में गुंडई, लंपटई, दबंगई और दुष्कर्म करने के आरोपियों के साथ ही ‘धन कुबेरों’ की फौज पहुंच चुकी है।

राजनीति से मर्माहत एक विद्वान ने कहा था कि ‘पॉलिटिक्स इज द गेम आफ स्कॉन्ड्रल्स’ अर्थात राजनीति ‘घाघ लोगों का खेल’ है। 15वीं लोकसभा पर यह कहावत सटीक बैठती है। यह सही है कि भारतीय लोकतंत्र मजबूत हुआ है, लेकिन इससे भी ज्यादा सत्य यह है कि आजादी के 64 साल में ही संसदीय व्यवस्था और संसदीय प्रक्रिया में भारी गिरावट आई है। संसद में गुंडई, लंपटई, दबंगई और दुष्कर्म करने के आरोपियों के साथ ही ‘धन कुबेरों’ की फौज पहुंच चुकी है।

संसद में विपक्ष की ताकत

(1) : प्रथम से तीसरी लोकसभा में कांग्रेस मजबूत थी और विपक्ष लगभग न के बराबर, लेकिन विपक्ष में जो लोग थे, उनमें आचार्य बेबी कृपलानी, अशोक मेहता, श्यामा प्रसाद मुखर्जी, एके गोपालन, एचवी कामथ, सरदार हुकुम सिंह और राममनोहर लोहिया जैसे कद्दावर नेता थे। विपक्ष के विरोध के कारण ही 1956 में टीटी कृष्णाचारी को भ्रष्टाचार के मामले में मंत्री का पद छोड़ना पड़ा था।

(2) : दूसरी लोकसभा में अनेक सामाजिक सुधार अधिनियम पास हुए और संविधान में चार संशोधन भी किए गए। संख्या बल में विपक्ष कमजोर था, लेकिन उच्चकोटि के आचरण और बेहतर वक्ता होने के कारण वे सरकार की गलत नीतियों के विरोध में खड़े हो जाते थे। यह संसदीय गरिमा की ही बात है कि कांग्रेस के सदस्यों ने ही ‘मूंदड़ाकांड’ उजागर किया और एक मंत्री को पद छोड़ना पड़ा। उसी समय कृपलानी के बारे में ब्लिट्ज अखबार में एक खबर छपी -कृपलानी महाभियोग : बूढे़, काले, नंगे झूठ। सभी दलों ने इसका विरोध किया और अंत में संपादक को सदन के सामने जवाब देना पड़ा।

(3) : तीसरी लोकसभा में बड़ी संख्या में किसान चुनाव जीतकर संसद में पहुंचे। इनमें कई ऐसे लोग थे, जो सरकार की आलोचना करने में पीछे नहीं हटते थे। इसी लोकसभा के दौरान चीन से युद्ध और नेहरू व लाल बहादुर शास्त्री की मृत्यु हुई, लेकिन विपक्ष एकजुट होकर सरकार के साथ खड़ा रहा। उस समय मधु लिमये और राम मनोहर लोहिया जनता की आवाज थे। जब ये संसद में बोलते थे, तो सरकार भी चुप होकर सुनती थी। लोहिया ने आम आदमी की दैनिक आय तीन आने, प्रधानमंत्री के कुत्ते का खर्च 25 रुपये और निजी सुरक्षा खर्च का हवाला देकर सरकार को कठघरे में खड़ा कर दिया था। भ्रष्टाचार के मसले पर तत्कालीन रक्षामंत्री कृषण मेनन और गृहमंत्री गुलजारी लाल नंदा जैसे मंत्रियों को भी पद से हटना पड़ा था।

(4) : चौथी लोकसभा में विपक्ष भारी और प्रभावशाली था। कृपलानी, लोहिया, हिरेन मुखर्जी, अटल बिहारी वाजपेयी, पीलू मोदी, इंद्रजीत गुप्त, बलराज मधोक और सुरेंद्रनाथ जैसे दिग्गज थे, जिन्हें देश का घर-घर जानता था। कांग्रेस में भी त्रिगुण सेन, हुमायूं कबीर, वीकेआरवी राव, दिनेश सिंह, केएल राव, केसी पंत, नुरुल हसन, आईके गुजराल और एमसी छागला जैसे नेता थे, जो गरीबों की आवाज थे। इसी लोकसभा में पहली बार संसदीय कार्यवाही में बढ़ती अनुशासनहीनता और शोरगुल संस्कृति के प्रति चिंता जाहिर की गई। इसी दौरान कांग्रेस के 62 सदस्यों ने अलग होकर कांग्रेस ‘अ’ नाम की पार्टी बनाई।

(5) : पांचवीं लोकसभा में फिर कांग्रेस की जीत हुई और इंदिरा गांधी के नेतृत्व में सरकार बनी। इस दौरान देसी और विदेशी मसलों पर पक्ष और विपक्ष में खूब झड़पें होती थीं। आलम ये था कि लोकसभा अध्यक्ष ढिल्लों को एस्प्रीन की गोली खानी पड़ती थी। ‘नागरवाल’ कांड पर विपक्ष ने भारी हंगामा खड़ा किया था, जिसके कारण ज्योतिर्मय बसु को सदन से निलंबित किया गया। इसी लोकसभा के दौरान ताशकंद समझौता, सिक्किम का भारत में विलय, भारत-पाक युद्ध और शिमला समझौता हुआ। इसी काल में सबसे पहले सांसदों के लिए पेंशन योजना लागू हुई। 19 संविधान संशोधन हुए और 482 अन्य अधिनियम पास हुए। यह आज भी एक रिकॉर्ड है।

(6) : जेपी आंदोलन के कारण कांग्रेस की स्थिति कमजोर हुई और छठी लोकसभा में कांग्रेस को हार का मुंह देखना पड़ा। कांग्रेस की मदद से चरण सिंह की सरकार बनी। लेकिन 1980 में इंदिरा गांधी फिर बहुमत के साथ सत्ता में आ गईं। इस तरह सातवीं लोकसभा के गठन के दौरान पंजाब की समस्या को लेकर पक्ष-विपक्ष लड़ता रहा। संसद में मंडल कमीशन के तहत पिछड़ों को 27 फीसदी आरक्षण देने की बात हुई।

(7) : आठवीं लोकसभा के दौरान ही इंदिरा गांधी की हत्या हो गई। सहानुभूति की लहर में एक बार फिर कांग्रेस सत्ता में लौटी और राजीव गांधी प्रधानमंत्री बने। इस लोकसभा के अधिकतर सदस्य नए थे। संसद में ‘पोस्टल बिल’ लाया गया, लेकिन विपक्ष के भारी विरोध के बाद इसे वापस लेना पड़ा। मानहानि संबंधी विधेयक का भी यही हाल हुआ। इस दौरान पक्ष और विपक्ष पंजाब समस्या, गोरखालैंड आंदोलन, शाहबानो प्रकरण को लेकर आपस में लड़ते रहे। शाहबानो प्रकरण पर रात पौने तीन बजे तक संसद के चलने का भी एक रिकॉर्ड है। 1989 में अनुशासनहीनता और पीठासीन अधिकारी की अवज्ञा को लेकर 63 विपक्षी नेताओं को निलंबित किया गया। यह भी एक अभूतपूर्व घटना थी। इस सभा में चंद्रशेखर जनता की आवाज थे।

(8) : नौवीं लोकसभा में कांग्रेस की हार हुई, उसे मात्र 197 सीटें ही मिलीं। भाजपा के समर्थन से वीपी सिंह की सरकार बनी। प्रधानमंत्री बनते ही विश्वनाथ प्रताप सिंह ने मंडल कमीशन की सिफारिशों को लागू कर दिया। छात्र सड़क पर उतर आए। बाद में भाजपा के समर्थन वापस ले लेने के कारण वीपी सिंह की सरकार गिर गई। किसी सरकार के खिलाफ यह पहला अविश्वास प्रस्ताव था। वीपी सिंह के काल की एक खास बात ये रही कि जनता, किसान और आमलोगों की दशा पर खूब शोर-शराबे हुए। फिर कांग्रेस के समर्थन से चंद्रशेखर प्रधानमंत्री बने। इस दौरान लोकसभा का रंग बदल चुका था। भारी शोरगुल, वाकआउट और नारेबाजी के कारण कोई भी सत्र ठीक से नहीं चल पाया। गिर चुकी संसदीय परंपरा को देखते हुए अंतिम सत्र के अंतिम दिन मधु लिमये ने राष्ट्रीय लज्जा दिवस बताया। कांग्रेस ने अपना समर्थन वापस लेकर चंद्रशेखर की सरकार गिरा दी।

(9) : 10वीं लोकसभा चुनाव के दौरान ही राजीव गांधी की हत्या कर दी गई। यह लोकसभा चुनाव हिंसा प्रधान रहा और काफी संख्या में अपराधी चुनाव जीतकर संसद में पहुंचे। कांग्रेस की सरकार बनी और प्रधानमंत्री हुए नरसिम्हा राव। जोड़-तोड़ के बल पर यह सरकार पांच साल चल तो गई, लेकिन इस दौरान सबसे ज्यादा घोटाले हुए। सांसदों को खरीदने से लेकर जमीन, घर बेचने वाले नेताओं के नाम सामने आए।

(10) : 11वीं लोकसभा में 13 दिनों के लिए कई दलों को मिलाकर वाजपेयी की सरकार बनी। बाद में देवगौड़ा और इंद्र कुमार गुजराल मोर्चा सरकार के प्रधानमंत्री बने।

नारायणन की तीन बातें

(क) : अदालतें इबादतगाह नहीं, जुआघर हैं
(ख) : संविधान को हमने विफल कर दिया है
(ग) : गरीबों के बारे में सोचें, वरना क्रांति के लिए तैयार रहें

जब नेहरू सदन में रो पड़े

संसद में बैठे इन बेईमान नेताओं को देखकर नेहरू काल की याद आ जाती है। उस जमाने की कार्यवाही देखी जाए, तो लगता है कि सही मायने में संसद ‘देश का आईना’ थी। कुछ बहसें तो आज तक नजीर बनी हुई हैं। उसी समय पूर्वी उत्तर प्रदेश की गरीबी पर विश्वनाथ गहमरी ने संसद में बताया था कि किस तरह किसान के बच्चे गोबर से अनाज निकालकर खाते हैं। इस पर नेहरू रोने लगे। कारगिल युद्ध के दौरान भाजपा के शीर्ष नेता अटल बिहारी वाजपेयी भी रोने लगे थे। 14वीं लोकसभा से आशा बंधी थी कि आम जनता के मुद्दों को लेकर बहस होगी, जनता की बेहतरी के लिए कानून बनेंगे, लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। संसदीय कार्यवाही के नाम पर करोड़ों रुपये जरूर बर्बाद होते रहे।

वरिष्ठ पत्रकार अखिलेश अखिल बिहार के मुजफ्फरपुर जिले के निवासी हैं. पटना-दिल्ली समेत कई जगहों पर कई मीडिया हाउसों के साथ कार्यरत रहे. इन दिनों हमवतन से जुड़े हुए हैं.  मिशनरी पत्रकारिता के पक्षधर अखिलेश अखिल से संपर्क [email protected] के जरिए किया जा सकता है.

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