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चंदूलाल चंद्राकर स्‍मृति पुरस्‍कार और ज्‍यूरी

पंकज झाछत्तीसगढ़ के सन्दर्भ में कुछ साल पहले ‘विकास बनाम संस्कृति’ पर चर्चा करते हुए डा. रमन सिंह ने एक बड़ी अच्छी बात कही थी. बकौल डा. सिंह ‘आखिर कब तक आप संस्कृति के नाम पर गरीब आदिवासियों के सिर पर सिंह लगा उन्हें नचाते रहेंगे ? उनको भी विकास और समाज की मुख्यधारा में शामिल होने का अवसर दीजिए.’ तो ज़ाहिर सी बात है कि अगर हम प्रदेश को बदलते वैश्विक परिवेश के अनुसार आगे बढ़ते और विकसित प्रदेश के रूप में उसकी पहचान बनाना देखना चाहते हों तो हमें नवाचार को बढ़ावा देना होगा. प्रदेश की पहचान ऐसी बनानी होगी कि दुनिया यह समझे कि वास्तव में छत्तीसगढ़ अपनी पौराणिक संस्कृति की नींव पर आरूढ़ हो एक नया आधुनिक समाज बनाने की ओर भी अग्रसर है. प्रदेश निर्माण के शुरुआती कुछ साल को छोड़ दें तो निश्चय ही प्रदेश ने अपनी ऐसी छवि निर्माण करने में सफलता भी हासिल की है. आज देश के कोने-कोने से लोग इस प्रदेश में आ कर अपने सपनों को यहाँ की माटी के साथ एकाकार करना चाहते हैं. हाल में एक बड़े उद्योपति ने कहा कि अगर आज आप छत्तीसगढ़ में नहीं हैं तो समझिए कि कुछ खो रहे हैं.

पंकज झा

पंकज झाछत्तीसगढ़ के सन्दर्भ में कुछ साल पहले ‘विकास बनाम संस्कृति’ पर चर्चा करते हुए डा. रमन सिंह ने एक बड़ी अच्छी बात कही थी. बकौल डा. सिंह ‘आखिर कब तक आप संस्कृति के नाम पर गरीब आदिवासियों के सिर पर सिंह लगा उन्हें नचाते रहेंगे ? उनको भी विकास और समाज की मुख्यधारा में शामिल होने का अवसर दीजिए.’ तो ज़ाहिर सी बात है कि अगर हम प्रदेश को बदलते वैश्विक परिवेश के अनुसार आगे बढ़ते और विकसित प्रदेश के रूप में उसकी पहचान बनाना देखना चाहते हों तो हमें नवाचार को बढ़ावा देना होगा. प्रदेश की पहचान ऐसी बनानी होगी कि दुनिया यह समझे कि वास्तव में छत्तीसगढ़ अपनी पौराणिक संस्कृति की नींव पर आरूढ़ हो एक नया आधुनिक समाज बनाने की ओर भी अग्रसर है. प्रदेश निर्माण के शुरुआती कुछ साल को छोड़ दें तो निश्चय ही प्रदेश ने अपनी ऐसी छवि निर्माण करने में सफलता भी हासिल की है. आज देश के कोने-कोने से लोग इस प्रदेश में आ कर अपने सपनों को यहाँ की माटी के साथ एकाकार करना चाहते हैं. हाल में एक बड़े उद्योपति ने कहा कि अगर आज आप छत्तीसगढ़ में नहीं हैं तो समझिए कि कुछ खो रहे हैं.

लेकिन शासन की ईमानदार मंशा रहते हुए भी कई बार कुछ स्वार्थी तत्वों के कारण इस पहचान पर धक्का भी पहुंच जाता है. अखबारों में प्रकाशित खबर के अनुसार प्रदेश के सरोकारों की पत्रकारिता को समादृत करने के लिए शासन ने इस साल से हिन्दी में ‘चंदूलाल चंद्राकर स्मृति पुरस्कार’ देना शुरू किया है. इस बार के लिए यह पुरस्कार इलेक्ट्रोनिक मीडिया में ‘मोगली’ पर आधारित एक खबर के लिए देना तय हुआ है तो प्रिंट के लिए, सांस्कृतिक समीक्षा करने वाले एक लेखक का. सवाल किसी की व्यक्तिगत आलोचना-समालोचना का नहीं है लेकिन ज़रूरत इस बात का है की इस पुरस्कार के बहाने कुछ वैचारिक और गंभीर मुद्दों पर विमर्श की जाय.

इस सन्दर्भ में बात करते हुए सबसे पहले यह स्पष्ट कर देना आवश्यक है कि यह मंथन कहीं से भी शासन की मंशा पर सवाल खड़ा करने के लिए नहीं किया जा रहा है. शासन ने तो पुरस्कारों के लिए नियम बनाते हुए, ज्यूरी को सबसे ज्यादा तरजीह दी है. उसने खुद के ही क़ानून द्वारा स्वयं को ज्यूरी के निर्णय के प्रति बाध्यकारी बना दिया है. तो सवाल शासन नहीं ज्यूरी के माननीय सदस्यों की समझ और उनकी नीयत का है. वास्तव में रुडयार्ड किपलिंग के कथानक मोगली पर आधारित अभिनय करने वाले को लोगों को सामने लाने वाला वह रिपोर्ट रोचक था. साथ ही अगर प्रिंट की बात करें तो संस्कृति के संवर्द्धन में योगदान देने वाले किसी को भी प्रोत्साहित करने की ज़रूरत भी है. लेकिन ज्यूरी से यह समझने की अपेक्षा थी कि वो किसी सांस्कृतिक पुरस्कारों के चयन हेतु या किसी फीचर का चयन हेतु आमंत्रित नहीं किये गए हैं. पुरस्कार के लिए बनाए गए नियम और उसके पीछे की भावना के अनुसार उन्हें प्रदेश के गाँव-गरीब-किसान-आदिवासी के पेट, उनकी जान-माल की हिफाज़त से जुड़े मुद्दे की बात प्रखरता से उठाने वाले रिपोर्ट या आलेखों के चयन हेतु आमंत्रित किया गया हैं. उन्हें यह विचार करना था कि देश और दुनिया में प्रदेश के पक्ष का प्रतिनिधित्व करने वाले कौन से विषय हो सकते हैं जिन्हें रिकोग्नाइज कर प्रदेश का पक्ष बेहतर तरीके से व्यक्त किया जा सकता है.

आखिर इन पुरस्कारों का आशय किसी को केवल कुछ पैसे मिल जाना तो कदापि नहीं होता. शासन जिसे चाहे उसे उपकृत करने के लिए उसके पास स्वेच्छानुदान की व्यवस्था तो है ही. लेकिन राज्य द्वारा दिए जाने वाले पुरस्कार का मतलब यह होता है कि देश और दुनिया को यह खबर हो कि बाजारू पत्रकारिता के कठिन समय में सच्चे जन-सरोकारों की बात करने वाले लोगों की भी परख होती है. इस बात को कौन नहीं जानता कि छत्तीसगढ़ की पहचान आज-कल नक्सलवाद को लेकर हो रही है.

इसी मुद्दे पर प्रदेश सरकार और लोकतंत्र को बदनाम करने वाले एक रिपोर्ट पर पिछले साल पत्रकारिता का राष्ट्रीय स्तर पर सबसे प्रतिष्ठित गोयनका पुरस्कार दिया गया है. प्रदेश का सरगुजा अंचल जहाँ से नक्सलवाद लगभग समाप्ति की ओर है, पर आधारित देश-विदेश में चर्चित उस स्टोरी में ऐसा बताया गया था मानो प्रदेश की सरकार गृह युद्ध के द्वारा अपने लोगों को ही खत्म कर रही है. तो ऐसे दुष्प्रचारों के विरुद्ध प्रदेश और देश में आवाज़ बुलंद करते रहने वाले कलमकारों को, लाख लांछित होने पर भी विभिन्न माध्यमों में प्रदेश का पक्ष रखने वाले मसिजीवियों के रिपोर्टों पर विचार न कर किसी एक फीचर या सांस्कृतिक रपट को महत्त्व देना ज्यूरी की अयोग्यता या उसके द्वारा खुद के पसंद-नापसंदगी को महत्व देना ही माना जाएगा.

अगर ज्यूरी की मंशा प्रदेश की नक्सल पहचान के बदले किसी सकारात्मक मुद्दे पर ही ध्यान आकृष्ट कराने का रहा हो, तब भी उसका यह प्रयास भौंडा ही माना जाएगा. प्रदेश अपने निर्माण के दस साल पूरे कर रहा है. वास्तव में प्रदेश ने इस दशक के दौरान अपने होने का मतलब साबित किया है. हाल में मुख्यमंत्री का एक साक्षात्कार के दौरान यह कहना सूत्र वाक्य की तरह है कि “जब बड़े लोग दुखी होकर कहते हैं कि मजदूर सबसे ज्यादा सुखी हैं तो मैं समझता हूं कि मेरा काम हो गया.’’ तो मजदूरों को सुखी करने वाले कौन-कौन से काम अभी हुए हैं या सही अर्थों में सरकार की योजनाओं का कितना लाभ संबंधित लोगों तक पहुंच पाया है, प्रदेश में विकास की अट्टालिकाओं के मध्य झुग्गियों तक कितनी रोशनी पहुंच पा रही है, प्रदेश ने ऐसे कितने चेहरों तक मुस्कान बिखेरने में सफलता प्राप्त की है या की भी है या नहीं इस पर आधारित आलेख-रिपोर्ट भी अगर विमर्श का पात्र हो सकता था.

जिस तरह प्रदेश का पीडीएस सिस्टम देश भर में तारीफ़ का हकदार हो रहा है. समूचे देश में सबसे भ्रष्ट माने जाने वाले जन वितरण प्रणाली किस तरह छत्तीसगढ़ में चुस्त-दुरुस्त हो गया. इसी प्रणाली से अमल में लाये जा रहे सरकार की महात्वाकांक्षी चावल योजना नीचे तक कितना कारगर है. उसके प्रभाव-दुष्प्रभाव क्या-क्या हो सकते हैं. मूल्यवान वनोपज के बदले मुट्ठी भर नमक खरीदते रहने वाले गरीब आदिवासियों के नमक का क़र्ज़ सरकार कितना अदा कर पा रही है. सच्चे अर्थों में चड्ढी पहन कर राष्ट्रवाद का ‘फूल’ खिलाने वाले आदिवासियों को हम मोगली युग से कितना आगे ले जा पाए हैं, इस तरह के किसी सुसंगत पड़ताल को नज़रंदाज़ करना वास्तव में अफसोसजनक है. जबकि सरकार ने ज्यूरी को यह अधिकार भी दे रखा था कि वह प्रविष्टियों से इतर लेखों-रिपोर्टों पर भी विचार कर सकती है.

इसके अलावा भी पुरस्कार के आवेदकों ने ढेर सारे ऐसे विषय विचारार्थ प्रस्तुत किये होंगे जो सीधे ही प्रदेश के सरोकारों को दुनिया तक पहुंचाने वाला रहा होगा. मसलन, शासन की खनिज नीति, उद्योगों से छत्तीसगढ़जनों के विस्थापित होने की आशंका या उनकी आँखों में उज्ज्‍वल भविष्य की कामना. पलायन की त्रासदी बनाम देश भर में अपने श्रम या बौद्धिकता का पताका फहराते छत्तीसगढ़ जन. पर्यावरण बनाम विकास, समृद्धि बनाम असमानता आदि. इस तरह के ऐसे दर्ज़नों मुद्दे थे जिस पर किये गए काम को प्रदेश के प्रतिनिधि लेखन या प्रसारण के रूप में आदर दिया जा सकता था. और अगर ऐसी कोई प्रविष्टि ज्यूरी को प्राप्त नहीं हो पायी तो जिस तरह अंग्रेज़ी के लिए प्रसारण माध्यम में कोई योग्य नहीं मिला वैसे ही हिन्दी को भी अछूता छोड़ देना था. इससे पुरस्कारों की गरिमा ही बढ़ती….बहरहाल.

इस के अलावा इस पुरस्कार प्रकरण ने एक और विषय पर विचार का अवसर दिया है कि आखिर किसी के पत्रकार होने का मानदंड क्या हो ? यह तय करने या फतवा देने का अधिकार किसे दिया जाय कि फलाना व्यक्ति पत्रकार है और चिलाना व्यक्ति नहीं. सूत्रों के अनुसार विचार के लिए आवेदित कुछ प्रविष्टियों पर इसलिए नज़र नहीं डाली गयी कि आवेदक किसी विचारधारा विशेष से संबधित है. तो लेख के बदले लेखक की वैचारिकता को आधार बनाने वाले जजों को आप और क्या कह सकते हैं? महात्मा गांधी समेत आजादी के आंदोलनों में बलिदान को तत्पर नेतागण पत्रकार भी रहे और उनकी पत्रकारिता असंदिग्ध भी रही. तो बाजारू दुकानदारों द्वारा स्थापित किये जा रहे मीडिया की बड़ी-बड़ी दुकानों के इतर भी पत्रकारिता की जा सकती है यह समझना समाज के लिए आवश्यक है.

और तो और प्रदेश शासन ने जिन विभूति चंदूलाल चंद्राकर के नाम पर पत्रकारिता का यह पुरस्कार देना शुरू किया है, वह खुद भी कांग्रेस के राष्ट्रीय स्तर के पदाधिकारी और सांसद भी थे. उनकी राजनीतिक पहचान के बावजूद प्रदेश को उनकी पत्रकारिता पर नाज़ है. हिन्दुस्तान जैसे अखबार का संपादन कर उन्होंने प्रदेश को पत्रकारिता में भी राष्ट्रीय पहचान दिलाई. और अगर राजनीतिक दलों से संबद्ध होना अयोग्यता माना जाय तो खुद ज्यूरी के सदस्यगण भी या तो सरकारी-भोपू के-नौकर हैं या फ़िर खुद को विचारधारा का आदमी बता कर सरकारी मलाई खाने वाले….खैर.

पुनः यह कहना होगा कि शासन ने इस मामले में किसी भी तरह का बेजा हस्तक्षेप नहीं करते हुए चयन के लिए अधिकतम पारदर्शी तरीका अपनाया है. लेकिन आगे से उसे यह भी ज़रूर सोचना होगा कि वे ज्यूरी के लिए ऐसे असंदिग्ध व्यक्ति का चयन करे जिसके खुद का हित इस प्रदेश से ना जुड़ा हो. जो आवेदक पत्रकारों के नाम-गोत्र-जाति-वैचारिकता से निरपेक्ष रहते हुए, पक्षपात से रहित होकर, निःस्वार्थ भाव से फैसला लेने में सक्षम हो. तेज़ी से बढते-विकसित होते इस प्रदेश की पत्रकारिता को भी परिपक्व करने की जिम्मेदारी शासन को उठानी ही होगी. अगले राज्योत्सव का साफल्य इस पर भी निर्भर करेगा कि मंच पर पुरस्कृत होने वाले लोगों से बड़े-बड़े कद के व्यक्ति नीचे बैठ कर हाथ तो नहीं मल रहे हैं.

लेखक पंकज कुमार झा रायपुर से प्रकाशित ‘दीप कमल’ के संपादक हैं.

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