चंदौली के नक्सल प्रभावित क्षेत्र में जिला मुख्यालय से लगभग ४५ किमी दूर घुरहूपुर की पहाड़ी पर एक पौराणिक गुफा मिला है. पहाड़ी के ऊपर स्थित गुफा के भीतर मौजूद गौतमबुद्ध की भित्ति चित्र इस स्थान पर किसी प्राचीन सभ्यता के होने के संकेत देती हैं, जिसकी खोज पुरातत्व विभाग कर रहा है. वैसे तो नक्सल क्षेत्र की पहाडियों में कई रहस्य अब भी दफ़न हैं, मगर समय के साथ एक के बाद एक रहस्य परत दर परत खुलने लगे हैं. कुछ ऐसी ही कहानी घूरहू पुर की पहाड़ियों की है. लगभग तीन वर्ष पूर्व हिन्दुस्तान के वरिष्ठ पत्रकार सुशील त्रिपाठी की कवरेज के दौरान इस स्थान पर दुर्घटना में हुई मौत के बाद यह गुफा पुरातत्वविभाग के संरक्षण में दे दी गयी. अब हर वर्ष श्रद्धालुओं का हुजूम यहाँ दर्शन पूजन के लिए उमड़ता है. इस पहाड़ी के ऊपर गुफाओं में मिले गौतम बुद्ध, पञ्चशील, कन्याए व जानवरों के भित्ति चित्र ने इस स्थान को पूरे विश्व में ख्याति दिला दी है. अब श्रीलंका, नीदरलैंड, चीन, नेपाल, भूटान आदि देशों के बौद्ध धर्मावलम्बी यहां भारी संख्या में पहुंच रहे हैं.
अक्तूबर २००८ में श्रीलंका से अपने पांच शिष्यों के साथ यहाँ आये बौद्ध गुरु ने गौतमबुद्ध की मूर्ति की स्थापना के बाद सैकड़ों लोगो के बीच उपदेश दिए. उन्होंने अपने उपदेश में बताया कि बौद्ध धर्मावलम्बियों के प्रमुख ग्रन्थ त्रिपटक में जिन पञ्च गुफाओं का उल्लेख है, उन पञ्च गुफाओं की खोज लगातार की जा रही थी, लेकिन इस स्थान को देखने के बाद पञ्च गुफाओं की खोज समाप्त होने की बात उन्होंने स्वीकारी थी. यहाँ के लोगो मानना है की इस गुफा में मिले भित्ति चित्र छठवीं शताब्दी के आसपास की है. भगवान बुद्ध बोध गया से जब चले थे तो यहाँ भी विश्राम किये थे. सतह से सैकड़ों फीट ऊंची पहाड़ी पर गुफाओं के भीतर पानी का पाया जाना अपने आप में आश्चर्य का विषय है और यहाँ किसी सभ्यता होने के भी संकेत देता है. इस स्थान पर कई और गुफाए भी हैं जिनके सीने में दफ़न रहस्यों पर से अब तक कोई पर्दा नहीं उठा पाया है. ऊंची पहाड़ी पर एक जलाशय भी मिला है, जो भीषण गर्मी में भी नहीं सूखता है. इस जलाशय में पानी कहां से आता है आज तक लोगों के लिए यह यक्षप्रश्न बनकर खड़ा है.
इस स्थान को पुरातत्व विभाग के अधीन दिया जा चुका है मगर विभाग की उदासीन रवैये के कारण आज भी यहां पर सुविधाओं का अभाव है. पहाडियों के बीच दुर्गम रास्ते भी श्रद्धालुओं के हौसलों को डिगा नहीं पा रहे हैं और गौतम बुद्ध में आस्था रखने वाले भक्तो का हुजूम यहाँ उमड़ता ही रहता है. लोग लकड़ी सीढि़यों के सहारे यहां पहुंचते हैं. अब तक किसी प्रकार की व्यवस्था यहां नहीं की जा सकी है. जबकि देश के साथ विदेशों से भी बौद्ध धर्मावलम्बी यहां आते हैं. यहाँ पहुंचने के लिए नजदीकी रेलवे स्टेशन मुग़लसराय आना पड़ता है या फिर बनारस. फिर वहां से उतर कर निजी या किराये के वाहन से लगभग ४५ किमी कि दूरी तय करनी पड़ती है. उसके बाद दुर्गम पथरीले रास्तों से लगभग दो किमी पैदल चलकर उँची पहाड़ी पर चढ़ना पड़ता है, तब जाकर गुफा के दर्शन होते हैं.
लेखक संतोष जायसवाल टीवी पत्रकार हैं.

