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चक्के पर चक्का और छक्‍का

जुगनू शारदेय: कुछ बातें बेमतलब 9 : यह क्या हो गया भाई! बहुत बड़ा हुआ। अगर यह छक्के पर छक्का होता तो क्या होता। पहले पेज पर होता। हमारे देश को छक्का बहुत पसंद है। आज से ही नहीं महाभारत काल से छक्का को महत्व दिया गया है। तब बेचारा या बेचारी शिखंडी कहलाता था। महापुरुष भीष्म पितामह आज के उन लोगों का प्रतिनिधित्व करते थे जो सेनापति होते थे अवसरवादी सत्ताधारी मोर्चा के और अपनी मृत्यु का रहस्य बता देते थे अवसरवादी प्रगतिशील मोर्चा को कि शिखंडी की आड़ में मुझे मार सकते हो। यह युद्ध बहुत कमाल की चीज होती है। इसके बारे में न जाने किसने कहा, पर क्या खूब कहा कि युद्ध और प्रेम में सब कुछ सही है। हमारे बिहार के चुनाव युद्ध में आचार संहिता वाला चुनाव आयोग सब कुछ सही नहीं मानता। एक दिन ऐसा आएगा कि चुनाव में उम्मीदवार अपने घर से भी बाहर नहीं निकलेगा। वोटर ने यह काम शुरू भी कर दिया है कि घर से बाहर ही नहीं निकलता है।

जुगनू शारदेय

जुगनू शारदेय: कुछ बातें बेमतलब 9 : यह क्या हो गया भाई! बहुत बड़ा हुआ। अगर यह छक्के पर छक्का होता तो क्या होता। पहले पेज पर होता। हमारे देश को छक्का बहुत पसंद है। आज से ही नहीं महाभारत काल से छक्का को महत्व दिया गया है। तब बेचारा या बेचारी शिखंडी कहलाता था। महापुरुष भीष्म पितामह आज के उन लोगों का प्रतिनिधित्व करते थे जो सेनापति होते थे अवसरवादी सत्ताधारी मोर्चा के और अपनी मृत्यु का रहस्य बता देते थे अवसरवादी प्रगतिशील मोर्चा को कि शिखंडी की आड़ में मुझे मार सकते हो। यह युद्ध बहुत कमाल की चीज होती है। इसके बारे में न जाने किसने कहा, पर क्या खूब कहा कि युद्ध और प्रेम में सब कुछ सही है। हमारे बिहार के चुनाव युद्ध में आचार संहिता वाला चुनाव आयोग सब कुछ सही नहीं मानता। एक दिन ऐसा आएगा कि चुनाव में उम्मीदवार अपने घर से भी बाहर नहीं निकलेगा। वोटर ने यह काम शुरू भी कर दिया है कि घर से बाहर ही नहीं निकलता है।

कहते हैं कि चुनाव का काम वोटर का शिक्षण और प्रशिक्षण है। चुनाव आयोग का आचार संहिता उम्मीदवार को एकांउटेंट बना रहा है। भविष्य में इससे जीते हुए उम्मीदवारों को बहुत लाभ होगा। वह जान जाएंगे कि कैसे पैसे का सही हिसाब रखा जाए कि सब कुछ सामने हो और कुछ भी नहीं दिखाई देता है। कभी कभी हमें लगता है कि चुनाव आयोग धृतराष्ट है। अच्छा है। इस देश की पाखंडी मानसिकता के लिए बढ़िया है। अब तो इतना ही बचा है कि युद्ध न लड़ने का फैसला कर कृष्ण ने अपने रथ का चक्का उठा ही लिया।

अपने देश में तब से चक्का उठाने की परंपरा है। इसका अभ्यास पत्थर फेंक कर किया जाता है। पत्थरबाजों ने कश्मीर में सीआरपीएफ को बता दिया कि पत्थर फेंकने की ताकत क्या है। अभी राष्ट्रमंडल खेलों में चक्काबाजों ने बता दिया कि वह छक्काबाजों से बहुत आगे है। मगर देश है कि दीवाना छक्काबाजों का ही है। अब देखिए न, राष्ट्रमंडल खेलों में जब-तब भारत कोई न कोई कमाल दिखा रहा है। यह जब-तब वाले खेल छक्का वाले खेल के कारण गुमनाम से ही होते हैं। लेकिन चक्का खेल का कमाल तो वैसा ही कमाल है कि बिहार में चुनाव में कांग्रेस को बहुमत मिल जाए।

सच तो यह भी है कि इस देश के हर चुनावी खेल में बहुमत कांग्रेस को ही मिलता है। कांग्रेस ने सभी राजनीतिक दलों को कांग्रेस बना दिया है। कांग्रेस क्या है महाभारत का परिवार है। लड़ने वाले – मरने वाले सभी एक ही परिवार के सदस्य या समर्थक होते थे। इसलिए बहुमत जिसे मिले, जैसे मिले – सब में कांग्रेस की जीत है। वह तो कृष्ण का विराट रूप है। सब कुछ में समाया है। जैसे राष्ट्रमंडल खेलों के चक्काबाजों ने भुलवा दिया इस बात को कि राष्ट्रमंडल खेलों के नाम पर लाखों-करोड़ का गोलमाल हुआ है। आशा है इस चक्काबाजी से प्रेरणा प्राप्त कर बिहार में चुनाव लड़ने वाले दल घोषणा करेंगे कि चुनाव के बाद पत्थरबाजी प्रतियोगिता आयोजित होगी। टिकटार्थियों को इसका पूरा अभ्यास है।

जुगनू शारदेय हिंदी के जाने-माने पत्रकार हैं. ‘जन’, ‘दिनमान’ और ‘धर्मयुग’ से शुरू कर वे कई पत्र-पत्रिकाओं के संपादन/प्रकाशन से जुड़े रहे. पत्रकारिता संस्थानों और इलेक्ट्रोनिक मीडिया में शिक्षण/प्रशिक्षण का भी काम किया. उनके घुमक्कड़ स्वभाव ने उन्हें जंगलों में भी भटकने के लिए प्रेरित किया. जंगलों के प्रति यह लगाव वहाँ के जीवों के प्रति लगाव में बदला. सफेद बाघ पर उनकी चर्चित किताब “मोहन प्यारे का सफ़ेद दस्तावेज़” हिंदी में वन्य जीवन पर लिखी अनूठी किताब है. इस किताब को पर्यावरण मंत्रालय ने भी 2007 में प्रतिष्ठित “मेदिनी पुरस्कार” से नवाजा. फिलहाल दानिश बुक के हिन्‍दी के कंसल्टिंग एडिटर हैं तथा पटना में रह कर स्वतंत्र लेखन कर हैं.

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