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चप्पलमारों से पूछो ये सवाल- कब मिलेगा वापस बुलाने का अधिकार

जनाब, चप्पलमार सांसद प्रकरण अभी खत्म नहीं हुआ है । कभी किसी नेता या किसी वीआईपी पर को आम व्यक्ति जब जूता-चप्पल या स्याही फेंक कर किसी मुद्दे पर अपना विरोध जताता है तो उस व्यक्ति के खिलाफ कानूनी कार्रवाई होने में जरा भी देर नहीं लगती, उसको गिरफ्तार कर सलाखों के पीछे डालने में पुलिस भी पूरी मुस्तैदी दिखाती है । हालांकि इस तरह की घटनाएं हमला या मारपीट नहीं होतीं। भले ही ये तरीका गलत हो, मगर ये तो एक तरह की अभिव्यक्ति ही है। यह आक्रोश जताने का एक तरीका है।

जनाब, चप्पलमार सांसद प्रकरण अभी खत्म नहीं हुआ है । कभी किसी नेता या किसी वीआईपी पर को आम व्यक्ति जब जूता-चप्पल या स्याही फेंक कर किसी मुद्दे पर अपना विरोध जताता है तो उस व्यक्ति के खिलाफ कानूनी कार्रवाई होने में जरा भी देर नहीं लगती, उसको गिरफ्तार कर सलाखों के पीछे डालने में पुलिस भी पूरी मुस्तैदी दिखाती है । हालांकि इस तरह की घटनाएं हमला या मारपीट नहीं होतीं। भले ही ये तरीका गलत हो, मगर ये तो एक तरह की अभिव्यक्ति ही है। यह आक्रोश जताने का एक तरीका है।

आमतौर पर कोई आम आदमी को किसी वीआईपी के सामने अपने विचार व्यक्त करने का मौका नहीं मिल पाता है तब वो इस तरह से अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करने की कोशिश करता है। ज्यादातर मामलों में जूता या स्याही वांछित व्यक्ति तक पहुंच भी नहीं पाती, तब भी जूता या स्याही फेंकने वाला गुनाहगार बन जाता है।

शिवसेना सांसद गायकवाड़ तो अपने कृत्य के लिए सीधे-सीधे गुनाहगार है। उन्होंने न केवल एयरलाइंस कर्मचारी से नाजायज मांग करते हुए दबंगई दिखाई बल्कि उसके साथ मारपीट और गाली-गलौज भी की। यही नहीं, पद का रौब दिखाते हुए खुलेआम स्वीकार भी किया कि उन्होंने कर्मचारी को सैंडिल मारी और आगे भी वो ऐसा करेंगे। इसे ही कहते हैं– चोरी, ऊपर से सीनाजोरी। क्या उसकी गिरफ्तारी महज इसलिए नहीं की जा रही है क्योंकि वो संसद का सदस्य है? सवाल यह है कि उसकी गिरफ्तारी से संसद की प्रतिष्ठा को चोट पहुंचेगी या उसने जो काम किया है उससे? वैसे भी उसने ऐसा काम पहली बार नहीं किया है, पहले से ही उसके खिलाफ कई मुकदमें दर्ज हैं। वो तो लचर न्याय व्यवस्था की बलिहारी है कि वो चुनाव लड़ कर सांसद बन ही न पाता अगर एक भी मामले में उसे सजा मिल जाती। लालू जैसा हाल होता।

इस मुद्दे पर एक टीवी चैनल ने कई सांसदों से सवाल किया कि अगर जनता भी सांसद की तरह आचरण करे तो? सांसदों ने जो उपदेश दिया, देश भर ने उसे देख-सुन लिया। मीडिया को सही सवाल उठाना चाहिये। सांसदों से असली सवाल तो यह पूछा जाना चाहिये कि क्या दबंग, सीनाजोर  (या अन्य जैसे कामचोर, भ्रष्टाचार, दुराचार आदि के आरोपी ) जनप्रतिनिधियों को वापस बुलाने का अधिकार जनता को मिलना चाहिये? अगर हां तो कब और अगर नहीं तो क्यों नहीं? सच जानिये, यह सवाल सुनकर बड़े-बड़ों की बोलती बंद हो जाएगी। उपदेश झाड़ना भूल जाएंगे।

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