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चीन की बेचैनी का मतलब समझें

: चीन ने कहा जापान को भड़का रहा है भारत : इस समय चीन बैचेन है। बैचेनी का कारण भारत की विस्तारवादी विदेश नीति है। इस विदेश नीति के तहत भारत ने उन देशों से दोस्ती बढ़ानी शुरू कर दी है, जो देश चीन से किसी न किसी मसले पर भिड़ें है। चीन काफी बैचेनी से भारतीय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की हाल ही में हुई विदेश यात्रा और बराक ओबामा का नवंबर के दूसरे सप्ताह में होने वाली दक्षिण एशिया की यात्रा पर नजर रखे है। भारतीय प्रधानमंत्री की जापान, मलेशिया, दक्षिण कोरिया, वियतनाम यात्रा की आलोचना चीनी अखबार पीपुल्स डेली कर रहा है। जबकि ओबामा की यात्रा को भी चीनी अखबार विस्तारवादी यात्रा बता रहा है। दिलचस्प बात है कि चीन अपनी सारी गतिविधियों को विस्तारवादी बताने के बजाए सहयोगी बताता है पर भारत और अमेरिका की हर गतिविधियों को अलग तरीके से व्याख्या कर रहा है।

: चीन ने कहा जापान को भड़का रहा है भारत : इस समय चीन बैचेन है। बैचेनी का कारण भारत की विस्तारवादी विदेश नीति है। इस विदेश नीति के तहत भारत ने उन देशों से दोस्ती बढ़ानी शुरू कर दी है, जो देश चीन से किसी न किसी मसले पर भिड़ें है। चीन काफी बैचेनी से भारतीय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की हाल ही में हुई विदेश यात्रा और बराक ओबामा का नवंबर के दूसरे सप्ताह में होने वाली दक्षिण एशिया की यात्रा पर नजर रखे है। भारतीय प्रधानमंत्री की जापान, मलेशिया, दक्षिण कोरिया, वियतनाम यात्रा की आलोचना चीनी अखबार पीपुल्स डेली कर रहा है। जबकि ओबामा की यात्रा को भी चीनी अखबार विस्तारवादी यात्रा बता रहा है। दिलचस्प बात है कि चीन अपनी सारी गतिविधियों को विस्तारवादी बताने के बजाए सहयोगी बताता है पर भारत और अमेरिका की हर गतिविधियों को अलग तरीके से व्याख्या कर रहा है।

भारत की लूक इस्ट नीति की जोरदार आलोचना पिछले दिनों पीपुल्स डेली ने की। पीपुल्स डेली ने कहा कि भारत दक्षिण एशिया में राजनीति कर रहा है। भारत दक्षिण एशिया में चीन विरोध को बढ़ा रहा है और कई मुल्कों को चीन के खिलाफ लामबंद कर रहा है। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की नीति को विस्तारवादी बताते हुए पीपुल्स डेली ने कहा है कि जापान को भारत भड़का रहा है। भारत की तरह ही जापान से चीन का सीमा विवाद शुरू हो गया है। भारत में जहां अरूणाचल प्रदेश को लेकर चीन बदमाशी कर रहा है, वहीं एक जापानी द्वीप पर चीन दावेदारी जता रहा है। हाल ही में जापान ने चीन के एक नौका को पकड़ लिया। इसका विरोध चीन ने अपने मुल्क में करवाया। लेकिन चीन का मानना है कि भारत यहीं नहीं रूका। चीन के घोर विरोधी दक्षिण कोरिया को भी भारत ने अपने पाले में कर लिया है। गौरतलब है कि चीन दक्षिण कोरिया का घोर विरोधी रहा है। उतर कोरिया को पूरी सहायता चीन ही अबतक देता रहा है।

वियतनाम की राजधानी हनोई में भारतीय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने वेन जियाबाओ से मुलाकात की। उन्होंने साफ शब्दों में चीन की भारत नीति की आलोचना की। उन्होंने कहा कि भारत की आलोचना करने से पहले चीन अपनी गलतियों को सुधारे। खासकर कश्मीरी लोगों को अलग वीजा देने की नीति को छोड़े, जिसमें वीजा कागज पर देकर नत्थी किया जा रहा है। साथ ही अरुणाचल प्रदेश को लेकर भी चीन अपनी दावेदारी छोड़े। भारत के इस विरोध का मतलब अब चीन समझ रहा है। चीन अब भारत की विदेश नीति को हल्के में नहीं ले रहा है। चीन के सरकारी अखबार पीपुल्स डेली में यह लिखा जाना कि जापान को भारत ने अपने पाले में लिया है, साधारण बात नहीं है। चीन ने महसूस किया है कि भारत हर उस देश को अपने साथ करेगा जिसका किसी न किसी तरीके से चीन के साथ विवाद है। चीन को पता है कि सीमा विवाद के मसले पर जापान भारत के साथ खड़ा है।

चीन की व्यापार नीति मुक्त नहीं है। इस कारण उनके व्यापारिक सहयोगी देशों को नुकसान होता है। भारत इसमें से एक है। दक्षिण कोरिया जैसे देशों को चीन से ज्यादा फायदा भारत से है। कोरिया की कंपनी पास्को को भारत के उड़ीसा में एक बड़ा प्लांट लगाने की अनुमति भारत ने दी है जो अबतक भारत का सबसे बड़ा विदेश निवेश है। इस निवेश पर भारतीय प्रधानमंत्री से दक्षिण कोरिया के नेताओं ने बात की। इस प्रोजेक्ट में आ रहे अड़ंगे को भारत ने खत्म करने का आश्वासन दिया है। भारत इस बात को समझता है कि आने वाले दिनों में दक्षिण एशिया में चीन विरोधी देशों से व्यापार को और बढ़ाना होगा ताकि व्यापार भारत के पक्ष में भी हो। चीन के साथ बेशक भारत का व्यापार चालीस अरब डालर से उपर पहुंच चुका है, पर अभी तक इस व्यापार का झुकाव चीन की तरफ है। भारतीय दवाई उद्योग की चीन के बाजार में अभी तक पहुंच नहीं है। इसका सीधा नुकसान भारत को है। चीन पर भारत मुक्त व्यापार पर दबाव डाल रहा है। चीन इसके लिए राजी नहीं है। क्योंकि भारतीय दवाई उद्योग के खुलते ही चीन को नुकसान हो सकता है।

दरअसल, भारत ने चीन की विस्तारवादी विदेश नीति का जवाब देना शुरू कर दिया है। चीन जिस तरह से पाकिस्तान, नेपाल और श्रीलंका को अपने खेमें किया है, उससे भारत की परेशानी बढ़ी है। नेपाल सीमा तक चीन ने तिब्बत स्थित लहासा से रेल लाइन बिछाने का काम शुरू कर चुका है। पहले चरण में लहासा से सिगात्से से तक रेल लाइन बिछाया जाएगा। इसके बाद इसे नेपाल सीमा तक लाया जाएगा। बाद में इसे काठमांडू तक बिछाए जाने की चीनी विस्तारवादी योजना है। इससे भारत काफी नाराज है। लंका में भी हैबेनटोंटा बंदरगाह का विकास चीन कर रहा है। लंका ने भारत-चीन विवाद का फायदा लेते हुए चीन से रक्षा सहयोग पर भी विचार शुरू कर चुका है। भारत चीन समेत अपने पड़ोसी मुल्कों की रणनीति को समझ रहा है। पाकिस्तान, श्रीलंका और नेपाल तीनों मुल्क गरीब है। इनकी अर्थव्यवस्था बुरी हालत में है। चीन इन्हें सहायता देकर अपने खेमें करना चाहता है। हाल ही में नेपाल में भारतीय राजदूत राकेश सूद पर जूता फेंके जाने की घटना को इसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए। यह जूता माओवादियों ने फेंका जिनका नेतृत्व नेपाल के एक पूर्व मंत्री और माओवादी नेता गोपाल कर रहे थे। जबकि उस समय उसी इलाके में गए चीनी राजदूत का जोरदार स्वागत नेपाली माओवादियों ने किया था।

चीन की इस नीति की काट करते हुए भारत ने चीन की इस नीति के विरोध में मजबूत अर्थव्यवस्था वाले मुल्क जापान, दक्षिण कोरिया आदि को अपने पक्ष में करने की नीति पर चल पड़ा है। साथ ही मध्य एशिया में भी चीन को मजबूती से टक्कर देने के खेल में जुट गया है। अफगानिस्तान में भारत पहले ही अपना खेल कर चुका है। इससे चीन पूरी तरह से घबराया हुआ है। पाकिस्तान-चीन की जोड़ी भारत को अफगानिस्तान से निकालना चाहते है, पर अभी तक कामयाब नहीं हो पाए है। जबकि पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रांत स्थित ग्वादर में चीन द्वारा बनाए गए गवादर बंदरगाह का महत्व पहले ही भारत ने अपनी रणनीति से खत्म करवा दिया है। भारत ने ईरान स्थित एक बंदरगाह से तेहरान होते हुए सेंट्रल एशिया के अस्काबाद तक रेल लाइन पहले ही बिछवा दिया। इससे चीन द्वारा पाकिस्तान में बनाए गए ग्वादर बंदरगाह का महत्व खत्म हो गया। इस पराजय को चीन अभी तक भूल नहीं पाया है।

दिलचस्प बात है कि चीनी अखबार पीपुल्स डेली ने बराक ओबामा की दक्षिण एशिया यात्रा को भी विस्तारवादी और चीन विरोधी यात्रा बताया है। बराक ओबामा की भारत यात्रा से चीन परेशान है। चीन को लग रहा है कि भारत को मजबूत समर्थन अमेरिका देगा। क्योंकि अमेरिका भी चीन की आर्थिक नीतियों से परेशान है। बताया जाता है कि अमेरिका किसी भी कीमत पर सेंट्रल एशिया और दक्षिण एशिया में अपनी उपस्थिति रखना चाहता है। इसके लिए उसका महत्वपूर्ण सहयोगी भारत ही हो सकता है। गौरतलब है कि अमेरिका भी भारत का एक बड़ा व्यापार सहयोगी है। अभी भी भारत अमेरिकी रक्षा सामाग्री का सबसे बड़ा खरीदार है। अमेरिका भारत जैसे अपने ग्राहक को हाथ से नहीं निकलने देना चाहता है। साथ ही भारतीय मध्य वर्ग की क्रय शक्ति पर भी अमेरिका की नजर है।

लेखक संजीव पांडेय पत्रकार हैं.

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