मैंने जबसे पढ़ा है कि चेहरा चरित्र की किताब होता है तब से ही सोच रहा हूं कि जिनका चरित्र नहीं होता है क्या उनके चेहरा ही नहीं होता। और बिना चेहरेवाला शख्स मुझे आज तक कोई दिखा ही नहीं। हां एक-एक चेहरे पर कई-कई चेहरे लगाने वाले जरूर मिले। यानी कि आज के दौर में चेहरा किताब नहीं अच्छी खासी लाइब्रेरी हो गया है। और जिनके चेहरे किताब थे उन को पढ़ने वाले फेस रीडर खुद ही फेसबुक हो गए। चेहरा-चाल और चरित्र का मामला है ही बड़ा टेढ़ा। फेस की असलियत फेस करने पर भीतर की तमाम गोपनीय चीज़ें यकबयक सरफेस पर आ जाती हैं।
अब यदि किसी की ये शिकायत है कि एक चेहरे पर कई चेहरे लगा लेते हैं लोग, तो दूसरे का दावा ये भी है कि लाख छिपाओ छिप न सकेगा राज़ है इतना गहरा..दिल की बात बता देता है असली-नकली चेहरा। और इधर ब्रिटेन के शोधकर्ताओं को भी क्या दिल्लगी सूझी है कि वे चेहरे से आदमी का चरित्र बताने का दावा कर रहे हैं। उसमें भी सिर्फ पुरुषों के चेहरे को देखकर वे चरित्र का दावा कर रहे हैं। मेरी शिकायत ये हैं कि उन्होंने स्त्री के चरित्र के लिए चेहरे के आधार पर कोई दावा क्यों नहीं किया। क्या उन्होंने ये श्लोक सुन लिया है कि पुरुष के भाग्य और स्त्री के चरित्र को देवता भी नहीं जान पाते तो हम वैज्ञानिक क्या खाक बता पाएंगे। या फिर मेकअप से रंगे-पुते थोबड़ों में चेहरा होता ही कहां है जिसके आधार पर कुछ कहा जा सके।
इन सिरफिरे वैज्ञानिकों ने सिर्फ पुरुषों के चेहरों को ही खंगाला है। और फतवा जारी कर दिया कि गोल चेहरेवाले लंपट और चालू किस्म के लोग होते हैं। मैं इस बात को सीरियसली नहीं लेता। क्योंकि ये तो महज इत्तफाक है कि लालूप्रसाद,चंद्रास्वामी, सुरेश कलमाड़ी, एनडी तिवारी और ए.राजा के चेहरे गोल हैं और उन्होंने गोलमाल के मामले में अपनी असाधारण प्रतिभा का परिचय दिया है, मगर हमारे तो राम, कृष्ण भगवानों से लेकर सभी देवताओं के और-तो-और यहां तक कि मेरा भी चेहरा गोल है। शायद इसी शर्मिंदगी में देवता सामने नहीं आते हैं। मामला शरीफ गोल चेहरे का है इसलिए मैं सामने आ गया हूं। अब बताइए अगर गोल चेहरेवाले ही बदमाश होते हैं तो फिर बताइए कि शरीफ होने का ठेका क्या सिर्फ सूअर, गधे और कुत्तों-जैसे लंबोतरे चेहरेवालों ने ही उठा रखा है क्या। हमें तो लगता है कि या तो इन वैज्ञानिकों के चेहरे भी ऊंट-जैसे ही रहे होंगे या फिर इन्हें इस गोल पृथ्वी पर पूनम के चांद-से गोल चेहरेवाली नाजनीनों ने तबाह किया होगा। तभी ये दिलजले आशिक अपनी खुन्नस निकालने के लिए ऐसी बातें गढ़ रहे हैं।
अगर चेहरे से आदमी को पकड़ा जा सकता तो न जाने कितने शरीफ आदमी सियासत में जाने से रह जाते। और न जाने कितने होनहार नटवरलाल बिना किसी सांस्कृतिक गतिविधि के तिहाड़ जेल पहुंच जाते। और फिर हमारे यहां तो चेहरे भी मोहरे होते हैं। कौन-सा चेहरा देखकर आप चरित्र बताएंगे। एक आदमी का जब आपसे काम पड़ता है तो कैसा होता है उसका चेहरा। और जब उसी आदमी से कभी आपको काम पड़ता है तो कैसा होता है उसका चेहरा। रेपबहादुर बिगड़ैल रईसजादे मुंह पर रूमाल बाधें जब टीवी पर प्रकट होते हैं तो कौन-सा चेहरा उनका असली होता होगा। वो जानवरी चेहरा जिसे लड़की ने झेला था या जिस चेहरे को दिखाकर वह जज से अपने निर्दोष होने की कहानी सुनाता है। और साहब चमचों के चेहरे कहां होते हैं उनके तो पूछ होती है। उनका चरित्र चेहरे से नहीं पूंछ उठाकर ही बताया जा सकता है। सही पूछो तो बकौल एक शायर ये न पूछो कि किस-किसने धोखे दिए वरना अपनों के चेहरे उतर जाएंगे। चेहरों के पीछे जो चेहरे हैं उनकी फितरत का कोई गणित नहीं होता। क्योंकि धोखे का कभी कोई एक चेहरा नहीं होता।
व्यंग्य लेखक पंडित सुरेश नीरव हिंदी काव्यमंच के लोकप्रिय कवि हैं. 16 पुस्तकें प्रकाशित. 7 धारावाहिकों का पटकथा लेखन. अंग्रेजी, उर्दू, फ्रेंच में अनुवाद. 30 वर्ष तक कादम्बिनी के संपादन मंडल से संबद्ध. छब्बीस देशों की विदेश यात्राएं. भारत के राष्ट्रपति से सम्मानित. आजकल स्वतंत्र लेखन और यायावरी. उनसे संपर्क सुरेश नीरव, आई-204, गोविंद पुरम, गाजियाबाद या मोबाइल नंबर 09810243966 के जरिए किया जा सकता है.

