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साहित्य जगत

‘छिनाल’ पर विवाद के बजाय बहस की जरूरत

: हिन्‍दी साहित्‍य में दलालों के शिनाख्‍त की आवश्‍यकता : महिलाएं जब देहरी लांघती हैं, तो सबसे पहले उनके चरित्र पर ही लांछन लगाता है : साहस, दुस्साहस अथवा लफंगई, चाहे जिस भी श्रेणी में रखिए; लेकिन महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय के उप-कुलपति डॉ.विभूति नारायण राय की बात को दूर तलक जाने दीजिए। यही ठीक होगा। बात को बयान और बयान को विवाद साबित करने की बजाय यह विषय सचमुच गंभीर बहस की मांग करता है। बिना बहस के इस विषय का पटाक्षेप नहीं होना चाहिए, वर्ना इतिहास, साहित्य के खाविंदों को कभी क्षमा नहीं करेगा। यदि विभूति नारायण राय ने हिन्दी महिला लेखकों को छिनाल कहा है, तो निश्चित ही यह घोर निंदनीय वक्तव्य है। पक्के तौर पर यह एक लेखक का अहम बोल रहा है, उसके भीतर का मर्द बोल रहा है। क्योंकि विभूति नारायण राय को महिला लेखकों की अवस्था तो दिख रही है, लेकिन उन लेखिकाओं को इस अवस्था तक पहुंचाने वाले हिन्दी के प्रतिष्ठित लेखकों की दलाली क्यों नहीं नजर आ रही है? दल्ले अथवा दलाल ही छिनाल बनाते हैं, मर्जी से भला कौन देह बेचकर धन और नाम कमाना चाहता है!

: हिन्‍दी साहित्‍य में दलालों के शिनाख्‍त की आवश्‍यकता : महिलाएं जब देहरी लांघती हैं, तो सबसे पहले उनके चरित्र पर ही लांछन लगाता है : साहस, दुस्साहस अथवा लफंगई, चाहे जिस भी श्रेणी में रखिए; लेकिन महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय के उप-कुलपति डॉ.विभूति नारायण राय की बात को दूर तलक जाने दीजिए। यही ठीक होगा। बात को बयान और बयान को विवाद साबित करने की बजाय यह विषय सचमुच गंभीर बहस की मांग करता है। बिना बहस के इस विषय का पटाक्षेप नहीं होना चाहिए, वर्ना इतिहास, साहित्य के खाविंदों को कभी क्षमा नहीं करेगा। यदि विभूति नारायण राय ने हिन्दी महिला लेखकों को छिनाल कहा है, तो निश्चित ही यह घोर निंदनीय वक्तव्य है। पक्के तौर पर यह एक लेखक का अहम बोल रहा है, उसके भीतर का मर्द बोल रहा है। क्योंकि विभूति नारायण राय को महिला लेखकों की अवस्था तो दिख रही है, लेकिन उन लेखिकाओं को इस अवस्था तक पहुंचाने वाले हिन्दी के प्रतिष्ठित लेखकों की दलाली क्यों नहीं नजर आ रही है? दल्ले अथवा दलाल ही छिनाल बनाते हैं, मर्जी से भला कौन देह बेचकर धन और नाम कमाना चाहता है!

लेकिन महज विभूति नारायण राय के वक्तव्य पर केन्द्रित बहस ईमानदारी से अपने अंजाम तक नहीं पहुंचेगी। उनके बयान के बरअक्स दरअसल हिन्दी लेखन का वर्तमान परिदृश्य खड़ा है। क्या हो रहा है हिन्दी लेखन के क्षेत्र में इन दिनों? बाजार ने महिलाओं को जो कैरियरवादी रुख और सोच दी, उसका परिणामकारी असर साहित्य पर भी अवश्यम्भावी है। वर्तमान के समालोचना की तो यह वैज्ञानिक पद्धति है कि आप असर के कारक और कारणों को नजरंदाज नहीं कर सकते। विभूति नारायण राय भी तो शायद वर्तमान की समालोचना ही करने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन तरीका गलत अपना लिया, प्रस्तुति में चूक गए और ओछे हो गए।

एक अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय के उप-कुलपति से यह व्यवहार अनापेक्षित था। एक लेखक विभूति नारायण इसी बात को बोल रहे होते, तो इतनी हाय-तौबा की गुंजाइश ही न बनती, लेकिन एक संस्थान का सर्वोच्च कार्याधिकारी जब कुछ कहता है, तो असल में इसे अकादमिक वक्तव्य का रुतबा हासिल होता है। राय साहब को रुतबे का तो ख्याल करना ही चाहिए था। लेकिन भीतर से जब आवाज निकलती है तो वह कोई लोक-लिहाज की दरकार से नहीं निकलती। वह तो बस निकलती है और बोलने वाले की मानसिक क्षमता के अनुरूप अपना असर दिखा जाती है।

विभूति नारायण राय ने हिन्दी लेखन के वर्तमान परिदृश्य के समालोचना की कोशिश की। लेकिन चूक गए। 1991 में देश के बाजार को वैश्वीकरण के नाम पर दुनिया के लिए खोलते ही भारतीय समाज में भयावह उथल-पुथल का दौर शुरु हुआ। अब तो यह दौर एक स्वरूप में लगभग स्थापित होने को है। बाजार ने समूचे भारतीय जनमानस को न सिर्फ झिझोंड़ा, बल्कि अपने तौर-तरीके से उसे लैस भी कर दिया। बाजारीकरण से महज वस्तुओं और सामानों का ही लेना-देना नहीं होता, भावनाओं और विचारों का भी सरोकार होता है। सब पर फर्क पड़ता है। पहले विचार और नजरिया बदलते हैं, फिर भावनाएं। तब कहीं वस्तु और सामान बदले जाते हैं। बाजार एक तरह से विचार और भावनाओं को भी वस्तुओं में तब्दील कर देता है और फिर इनका व्यापार करता है। अच्छा व्यापारी हींग लगे ने फिटकरी और रंग चोखा करता रहता है, बुरा व्यापारी विभूति नारायण राय की तरह विवाद का बाजार बनाता है।

पिछले बीस साल के समग्र हिन्दी लेखन पर गौर करने की जरूरत है। महिला लेखन इसी दौर में अपनी समूची ताकत के साथ उदित हुआ है। महिलाएं जब देहरी लांघती हैं, तो सबसे पहले उनके चरित्र पर ही लांछन लगाता है। देहरी लांघने के बाद महिला चाहे जो करे, लेकिन एक चतुराई उसे पहले दिन से ही समझ लेनी होती है कि कोई उसकी सार्वजनिक बुराई न करने पाए। आखिर है तो यह पितृ-सत्तात्मक समाज। एक का मुंह खुला, समझ लो गटर का मुंह खुल गया। फिर जो-जो सड़ांध, जो-जो बदबू फैलती है कि संभाले नहीं संभलती है। देहरी लांघ चुकी महिलाओं के समक्ष बेपनाह चुनौतियां होती हैं और हर चुनौती से दो-चार होने में उसे पूरी ताकत और हौंसला लगाना होता है। देहरी लांघ चुकी महिला सबसे पहले अपनी देह से मुक्ति का मार्ग खोजती है, क्योंकि देहरी के भीतर वह तभी तक कैद है, तब तक अपनी देह में कैद है। मुक्ति का मार्ग किसी भी अवस्था में सहज और आसान नहीं होता। लेकिन हर अपनाया हुआ मार्ग सही हो यह जरूरी भी नहीं। मुक्ति के लिए नैतिक साहस अपरिहार्य तत्व है। नैतिक साहस से साफ मतलब इंसाफ पसंदगी है। इंसाफ की ख्वाहिश है तो नैतिक साहस बनता ही बनता है। विभूति नारायण राय क्या यह कहना चाह रहे हैं कि हिन्दी का महिला लेखन इंसाफ पसंद साहित्य नहीं है?

और विभूति नारायण राय के वक्तव्य पर हाय-तौबा मचाने वालों की जमात को तो देखिए। बालों में खिजाब लगाए। दो-चार बचे-खुचे दांतों को किटकिटाने से बचाते हुए पुरुष बुद्धिजीवियों की एक पूरी फौज राय साहब पर पिल पड़ी है। हर कोई अपने-अपने बाल झटक कर, लरजती देह को बुतूत बनाने का स्‍वांग भरकर विभूति नारायण राय को फटकार रहा है। सभी खुश है, चलिए महिला लेखकों की नजर में आने का एक मौका तो मिला। यही होता है, सड़क से गुजरती सुंदर महिला को सभी बदनीयती से घूर रहे होते हैं, लेकिन जैसे ही कोई उस महिला पर छींटाकशी करता है, सभी पुरुष अपनी-अपनी बदनीयती को इंसाफ का चोला पहनाकर पिल पड़ते हैं छींटाकशी करनेवाले पर। जो जितना ज्यादा चिल्लाएगा और जितनी जोर से चिल्लाएगा, सुंदर महिला की नजर में उतनी ही जल्दी आएगा। तो चिल्लाने वाले को लगे रहने दिया जाए और विभूति नारायण राय के विवादजनक बयान के जरिए ही सही उस बहस का आगाज किया जाए, जिसकी जरूरत हिन्दी साहित्य को बड़ी शिद्दत से है।

लेखक पुष्‍पेन्‍द्र फाल्‍गुन चर्चित कवि और मासिक पत्रिका फाल्‍गुन विश्‍व के संपादक हैं.

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