स्वच्छ भारत का एक महानगर। पूरी तरह स्मार्ट सिटी। जगह-जगह कचरे के ढेर। जगह-जगह बन्द शौचालय, जिनके आसपास भयानक दुर्गन्ध। खुले में शौच करने की कोई सुविधा नहीं। दूर-दूर तक कोई फलदार वृक्ष नहीं। प्यासों को पीने के लिए मुफ्त पानी कहीं उपलब्ध नहीं। न मनुष्यों के लिए, न पशु-पक्षियों के लिए। शहर केेेे हर इलाके में खुले गन्दे नाले बह रहे हैं। पशु-पक्षी बेहाल होने पर इन्हीं नालों के पानी से प्यास बुझा लेते हैं। गॉंव से पलायन कर शहरी जीवन का लुत्फ उठाने आयेे काक-कोकिला एक सूखे वृक्ष की डाल पर मायूस बैठे हैं। रुऑंसे काक-कोकिला के बीच हँसी-मजाक चल रहा है।
कोकिला– कांव कांव… कांव कांव…
काक– कूहू कूहू… कूहू कूहू…
कोकिला– का बे कौए, मेरी मीठी बोली की नकल करता है !
काक– कर्कशा कहीं की… चुप कर। जानती नहीं, मैं पक्षियों का गुरू हूँ। खग-संसार कागभुसुंडि के रूप में मेरी पूजा करता है। मेरी विद्वता का लोहा मानव समाज के ऋषि-मुनि भी मानते हैं।
कोकिला– गू खौआ कहीं का… साधु बनता है। जानती नहीं क्या, मरे हुए जानवर पर चोंच मार-मार कर पेट भरता है!
काक– तेरी कसम, अब मैं गू और सड़ा मॉंस जैसी गंदी चीजें नहीं खाता।
कोकिला– तो क्या अब गाय-भैंस का दूध पीने लगा है? सूखे मेवे खाकर जिन्दा है?
काक– देख बहना, दिल्लगी मत कर। स्वच्छ भारत ने हमारी कौआ बिरादरी का आहार छीन लिया। इस स्मार्ट सिटी में तेरा पेट भरने का भी तो कोई जुगाड़ नहीं है।
कोकिला– सो तो है।
काक– देख बहना, बात समझने की कोशिश कर। अब मैं और तू शहर में रहने आये हैं। यहॉं जो उपलब्ध होगा वही तो खाएंगे। यहॉं न तेरे लिए मीठे-मीठे फल से लदे वृक्ष हैं और न मेरे लिए मरे हुए जानवरों के लावारिस शव। नरेन्द्र मोदी के स्वच्छ भारत में हम कौए गू के लिए भी तरस जा रहे हैं। ऐसे में, यदि हम खानपान का अपना संस्कार उपलब्धता के अनुरूप नहीं बदलेंगे तो भूखे मर जाऍंगे।
कोकिला– तेरा प्रवचन सारगर्भित है। सचमुच तू गुरू कागभुसुंडि का अवतार लग रहा है।
काक– कूहू कूहू… कूहू कूहू… अच्छा तो चलते हैं, जोर की भूख लगी है। तू भी निकल.. कुछ खा-पी ले।.
कोकिला– कांव कांव… कांव कांव…
काक— कूहू कूहू… कूहू कूहू…
Vinay Shrikar
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