डा. बिनायक सेन के बारे में पढ़ते-सोचते-लिखते हुए अभी डा. प्रकाश आमटे का हाल का एक बयान याद आ रहा है. हालांकि समाचार एजेंसी भाषा द्वारा जारी और विभिन्न अखबारों में प्रकाशित उनके बयान से सीधे बिनायक मामले का कोई संबंध नहीं है. लेकिन अपने महान पिता ‘बाबा आमटे’ के नक्सलियों के बारे में जो विचार उन्होंने बताए उसे जानकर वर्तमान सन्दर्भ में छत्तीसगढ़ की नक्सल समस्या और उसके निवारण हेतु किये जाने वाले उपायों की प्रासंगिकता समझा जा सकता है. अपने पिता को उद्धृत करते हुए प्रकाश कहते हैं, ‘अगर नक्सली समस्या को आप विशेषकर आदिवासी क्षेत्रों से जोड़कर देखते हैं, तो बाबा (आमटे) का इस बारे में मानना था कि आदिवासियों तक खाद्यान्न की नियमित तौर पर उपलब्धता होनी चाहिए. अगर उनके जीवन-यापन के जरिये खत्म हो रहे हैं तो उन्हें रोज़गार मिलना चाहिए और हर तरह से उनका शोषण खत्म होना चाहिए.’
छत्तीसगढ़ से लगे महाराष्ट्र के गढ़चिरौली एवं चंद्रपुर के नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में लगातार अपनी पूरी निष्ठा के साथ प्रभावी कार्य कर यश कमाने वाले स्व. बाबा आमटे के इस विचार को आप छत्तीसगढ़ के सन्दर्भ में दो तरह से देख सकते हैं. पहला यह कि अगर आपकी नीयत वास्तव में काम करने की हो, आपका कोई छुपा एजेंडा नहीं हो और आपका कोई भी कार्य ‘लोकतंत्र’ को कमज़ोर कर ‘हिंसा’ को प्रोत्साहन देने वाला नहीं हो तो धुर नक्सल क्षेत्रों में कार्य करते हुए भी आप ‘बाबा’ की तरह कीचड़ के कमल साबित हो सकते हैं. आज जब उनके डाक्टर बेटे और बहू उन्हीं नक्सली क्षेत्रों के हितार्थ अपना जीवन समर्पित कर बाबा के काम को आगे बढ़ा रहे हैं तो आप एक दूसरे डा. बिनायक सेन को याद कर लीजिए. आखिर क्या कारण है कि जहां ‘प्रकाश आमटे’ अपने डाक्टरी पेशे के साथ न्याय करते हुए कुष्ठ रोगियों के साथ-साथ बेजुबान जानवरों तक की चिकित्सा करते हुए भी विभिन्न सामाजिक प्रकल्पों में व्यस्त हैं, वहां बिनायक की सम्पूर्ण चिकित्सा कौशल केवल नक्सली ‘नारायण सान्याल’ तक ही सिमटा हुआ था. अगर उन पर अपना ‘आला’ छोड़कर केवल ‘लश्कर’ बनने की ही फिराक में लगे रहने का ही फितूर सवार हो तो उनकी मंशा पर सवाल तो पैदा होता ही है. क्या कोई भी निष्पक्ष व्यक्ति बाबा आमटे के परिवार के योगदान को बिनायक सेन द्वारा किये गए कथित कार्यों के बरक्स रखना चाहेगा?
जहां तक किसी लोकतांत्रिक ढंग से चुनी हुई सरकार का सवाल हो तो उसे आखिर क्या पड़ी है कि वह किसी कथित ‘सीधे-साधे, निष्ठावान और ईमानदार’ डाक्टर को जेल में रखें? जेलों में तो वैसे ही क्षमता से कई गुना अपराधी भरे पड़े हैं और इसके उलट समाज में भी डाक्टरों की काफी कमी है. फ़िर सरकार पर सवाल उठाने वाले लोगों को भी यह बेहतर पता है कि कौन बंदी रखने लायक हैं और कौन नहीं, यह तय करने का अधिकार किसी सरकार का नहीं बल्कि न्यायालय का होता है. उस न्यायालय का जिसने अभी तक करीब आधा दर्ज़न बार विनायक की ज़मानत अर्जी खारिज की है. एक बार जब सुप्रीम कोर्ट से उन्हें ज़मानत मिली भी थी तो केवल अठारह सेकण्ड की सुनवाई के बाद जिसमें सरकार का पक्ष सुना ही नहीं गया था.
अभी एक लंबी सुनवाई और देश के प्रख्यात वकील तक का बिनायक के पक्ष में दलील सुनने के बाद भी बिलासपुर हाई कोर्ट ने अगर सेन के मामले को ज़मानत योग्य नहीं माना तो यह माना जा सकता है कि वामपंथी समूहों द्वारा किये गए प्रोपगंडा के उलट यह मामला काफी मज़बूत है. बचाव पक्ष कमजोर पड़ने के कारण ही मीडिया और अन्य उपायों का सहारा लेकर दबाव बनाने की कोशिश कर रहा है, यह मानने की पर्याप्त वज़ह है. जहां तक सरकार का सवाल है तो निश्चित ही यह बार-बार कहे जाने की ज़रूरत है कि लाख बुराइयों के बावजूद देश की लोकतांत्रिक प्रणाली और उससे चुन कर आये सरकारों का हमारे यहां कोई विकल्प नहीं है. निश्चित ही घपलों-घोटालों ने और देशद्रोहियों द्वारा फैलाए जा रहे दुष्प्रचार ने देश में लोकतंत्र के प्रति भरोसे को कमज़ोर किया है. लेकिन अभी भी अगर मामला चयन का हो तो निश्चय ही भारत की नब्बे प्रतिशत से अधिक जनता बजाय किसी विदेशी विचारों के अपनी विधायिका, न्यायपालिका समेत लोकतंत्र द्वारा स्थापित संस्थाओं पर ही भरोसा करना चाहेगी.
निश्चित ही रोज-रोज पकड़ में आ रहे लाखों करोड के घोटालों ने देश में नैराश्य का वातावरण पैदा किया है. लेकिन छत्तीसगढ़ के सन्दर्भ में बात करते हुए ये भी नहीं भूला जा सकता कि इसी लोकतांत्रिक व्यवस्था की पैदाइश वहां की सरकार नाम मात्र की कीमत पर आदिवासियों तक चावल एवं नमक आदि ज़रूरी चीज़ों का वितरण कर शायद संयोगवश ही बाबा आमटे के उन विचारों को अमल में ला रही है कि ‘आदिवासियों तक खाद्यान्न की नियमित तौर पर उपलब्धता होनी चाहिए.’ इसके अलावा वहां विभिन्न तरह के रोजी-रोज़गार के अवसर उत्पन्न कर उन्हें शोषण से मुक्ति के मार्ग पर भी ला रही है. रोज़गार के अन्य प्रकल्पों के अलावा सरकार द्वारा नियुक्त किये गए विशेष पुलिस अधिकारी बन अपने जीवन के साथ-साथ लोकतंत्र को भी सुरक्षित करने का अवसर आज वहां के आदिवासियों के पास है. ज़ाहिर है, जब उनकी रक्षा के लिए सुदूर पूर्वोत्तर तक से आये जवान ताबूत में बंद होकर वापस जा रहे हों तो आखिर वहां की भौगोलिक परिस्थितियों से सर्वथा वाकिफ वहां के ही माटी पुत्रों के हाथ खुद की सुरक्षा का दायित्व सौपने में बुराई क्या है? निश्चित ही इससे कमज़ोर पड़ने वाले देशद्रोही तत्व बौखलायेंगे लेकिन देश को उनकी बौखलाहट से ज्यादा अपनी आंतरिक सुरक्षा की चिंता करने की ज़रूरत है. और ऐसा करने वाली व्यवस्था के पक्ष में पूरी मजबूती से खड़ा होना देश के नागरिक होने के नाते हम सबका कर्तव्य है.
बिनायक मामले में कथित मानवाधिकार संगठनों या भावुक नागरिकों का प्रथम दृष्टया यह कहना भले ही सही प्रतीत होता हो कि जहां देश की संपदा को बेतरह लूटने वाले भ्रष्टाचारी मुक्त हैं, वहां कथित रूप से गरीबों के पक्ष की बात करने वाले एक डाक्टर को जेल में डाल दिया गया है. लेकिन यहां बजाय सतही बातों के, चीज़ों को तर्क की कसौटी पर कसना समीचीन होगा. निश्चित ही माओवाद की तरह ही भ्रष्टाचार भी आज लोकतंत्र के लिए कोढ़ सदृश है. एक के कारण आंतरिक सुरक्षा खतरे में है तो दूसरे के कारण आर्थिक. मोटे तौर पर इन दोनों समस्या के कारण नागरिकों के ‘जान’ और ‘माल’ पर खतरा उत्पन्न हो गया है. लेकिन इसका कहीं से मतलब ये नहीं है कि भ्रष्टाचार को माओवाद के कवच के रूप में देखा जाय. दोनों समस्यायों से निपटने के अलग तरीके हैं और इन दोनों का आपस में कोई संबंध नहीं है. ज़ाहिर है अगर देश के एक कोने में महामारी फ़ैली हो और दूसरे में अराजकता तो दूसरे कोने में मजबूती के साथ लड़ने वालों की इसलिए आलोचना नहीं की जा सकती कि महामारी से निपटा नहीं जा रहा है और अराजकता को खत्म किया जा रहा है. बहरहाल.
निश्चित ही बिनायक सेन कोई उतने बड़े विषय नहीं हैं जितना उन्हें बनाया जा रहा है. वह किस अदालत से दोषी साबित होंगे किससे निर्दोष, कहां ज़मानत मिल पायेगी, कहां नहीं यह भी कोई राष्ट्रीय विमर्श का विषय नहीं है. भारत का संविधान, हज़ार दोषी भले ही छूट जाय लेकिन किसी एक निर्दोष को सज़ा नहीं मिले, के नैसर्गिक सिद्धांत में भरोसा करता है. अतः अगर अभियोजन पक्ष के साक्ष्य थोड़े भी कमज़ोर होंगे तो हो सकता है कल को बिनायक बरी हो जाएं. इंदिरा गांधी के हत्यारों तक का बचाव करने वाले देश के सबसे महंगे वकील तक की सेवायें उन्हें उपलब्ध हैं ही. अतः उनके समर्थकों के लिए उचित यही होगा कि बजाय दुनिया भर में अपने देश को बदनाम करने के, मुक़दमे पर अपना ध्यान लगाएं. उन्हें यह समझना होगा कि देश की सभी प्रणाली इतनी मज़बूत तो है ही कि किसी भी तरह उनके किसी बेजा दबाव में नहीं आने वाली. क़ानून, नीर-क्षीर विवेकी होकर अपना काम करता ही रहेगा. सर्वोच्च न्यायालय तक से दोषी साबित होने तक वे भले ही सेन को निर्दोष मानने को स्वतंत्र हैं, लेकिन आम जनमानस, निचली अदालत से देशद्रोह का अपराधी साबित होने और सभी अदालतों से अभी तक ज़मानत खारिज होते रहने के कारण सेन को दोषी मानता है और मानता ही रहेगा. लाख रणनीतियों एवं दुष्प्रचारों के बावजूद फिलहाल बिनायक लोकतंत्र के नायक नहीं अपितु खलनायक ही माने जायेंगे.खैर.
फ़िर से बाबा आमटे का ही एक सन्दर्भ. एक बार तात्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने बाबा के कामों से प्रभावित होकर उन्हें दिल्ली में रहकर काम करने का आग्रह किया था. बाबा का जबाब था कि ”उनकी ‘चवन्नी’ अपने ही माटी में खोया हुआ है अतः इसे यही उन्हें ढूँढने दिया जाय.” इसी तर्ज़ पर बस्तर की ‘चवन्नी’ पर आँखे टिकाये सभी अलोकतांत्रिक समूहों से यही कहना उचित होगा कि अपनी-अपनी चीज़ें अपने इलाके में खोजने का प्रयास करें. लाख विसंगतियों एवं कमजोरियों के बावजूद देश के तमाम इलाके की तरह ‘बस्तर’ में भी लोकतंत्र अपने बेहतर रूप में काम कर रहा है. आज का बस्तर किसी रुदालियों या घडि़याली आसूं बहाने वालों की कोई ज़रूरत महसूस नहीं कर रहा है.
लेखक पंकज झा छत्तीसगढ़ बीजेपी के मुखपत्र दीपकमल के संपादक हैं.

