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जल्‍दी क्‍या थी! धीरे धीरे लूटते कॉमन लोगों का वेल्‍थ

सूर्यकांत त्रिपाठी: एक बार मार्केट बन जाती फिर जी भरकर लूटते, कौन रोकता है : इनके आगे धुरंधर घोटालेबाज अपनी अंगुली खुद अपने दांतों से काट रहे हैं : बेचारे मंत्री जी चिंता में दुबले हुए जा रहे हैं। उनकी समझ में नहीं आ रहा है कि उनके सहयोगी उनको दुनिया में मुंह दिखाने लायक छोड़ेंगे या नहीं। इन लोगों ने सब गुड़ गोबर कर दिया है। अब इनको कौन समझाए। कहीं सोने का अंडा देने वाली मुर्गी को कोई हलाल करता है, लेकिन कहते हैं न लालच आदमी को अंधा बना देती है। एक ही बार में घर भरने के चक्कर में ये लोग भूल गए कि कुछ दिलजले भी आसपास मंडरा रहे हैं। आखिर वही हुआ। जरा सा चूके और सारी पोल-पट्टी झटके से खुल गई। एक-एक कर काली करतूतें परत-दर-परत उघडऩे लगी। अपने संत-महंत सही कह गए हैं-पाप का घड़ा एक न एक दिन अवश्य भरता है।

सूर्यकांत त्रिपाठी

सूर्यकांत त्रिपाठी: एक बार मार्केट बन जाती फिर जी भरकर लूटते, कौन रोकता है : इनके आगे धुरंधर घोटालेबाज अपनी अंगुली खुद अपने दांतों से काट रहे हैं : बेचारे मंत्री जी चिंता में दुबले हुए जा रहे हैं। उनकी समझ में नहीं आ रहा है कि उनके सहयोगी उनको दुनिया में मुंह दिखाने लायक छोड़ेंगे या नहीं। इन लोगों ने सब गुड़ गोबर कर दिया है। अब इनको कौन समझाए। कहीं सोने का अंडा देने वाली मुर्गी को कोई हलाल करता है, लेकिन कहते हैं न लालच आदमी को अंधा बना देती है। एक ही बार में घर भरने के चक्कर में ये लोग भूल गए कि कुछ दिलजले भी आसपास मंडरा रहे हैं। आखिर वही हुआ। जरा सा चूके और सारी पोल-पट्टी झटके से खुल गई। एक-एक कर काली करतूतें परत-दर-परत उघडऩे लगी। अपने संत-महंत सही कह गए हैं-पाप का घड़ा एक न एक दिन अवश्य भरता है।

जब तक थोड़ा-थोड़ा खाया मामला दबा रहा। कभी-कभी कुछ खुसर-पुसर हुई तो जांच के नाम पर मामले को दबा दिया गया। कुछ तो खिलाडिय़ों का हक तक मार गए, उनको मिलने वाली सुविधाएं भी धीरे से डकार गए। हिम्मत बढ़ती चली गई। सो जैसे ही सुना बड़ा आयोजन होने वाला है। लार टपकने लगी। कई बेचारे माल बटोरने में जुट गए। ऐसा जुटे कि देश के बाहर थू-थू हो रही है। किसी तरह साख बनाने का मौका मिला था, इन लोगों ने उस पर भी पानी फिरा दिया। कमाने से कौन मना करता है भाई। कलियुग में कोई दूध का धुला नहीं है, जिनको मौका नहीं मिला उनकी बात करना बेकार है। वे न कभी दौड़ में थे न रहेंगे, लेकिन एक बात समझनी चाहिए, थोड़ा सब्र करते फिर ऐसे तमाम आयोजन हर साल होते रहते।

एक बार मार्केट बन जाती फिर जी भरकर लूटते कौन रोकता है। लेकिन नहीं मौका मिला नहीं लूटने में लग गए। कल कौन देखता है। अरे भाई भ्रष्‍टाचार मामूली चीज नहीं। घपले-घोटाले करना सबके बस का नहीं होता। यह कोई खेल का मैदान नहीं पहुंचे और हाथ पांव चलाने लगे। इसका एक सलीका होता है। मार्केटिंग की थ्योरी होती है। पूरा अर्थशास्त्र होता है। पहले इसको समझो। समझने के बाद इस पर चले होते फिर हाथ पैर घी में और सिर कढाई में होता।

मजाल कोई माई का लाल तुम्हारे ऊपर यह तोहमत लगा पाता कि तुम घोटालेबाज हो। फिर बेटे को ठेका देते या बाप को, किसी को पूछने की हिम्मत न पड़ती। खुद भी मजा मारते और रिश्तेदारों और पड़ोसियों को भी पूरा मजा मारने का मौका देते। सब तुम्हारे दरियादिली की जयजयकार करते बोनस में। तुम्हारी इसी घटिया व्यक्तिवादी सोच के कारण सारी मेहनत तेलहंडे में चली गई है। अब भुगतो। चेहरे पर कालिख लगवा दी। कल तक जिनकी आवाज नहीं निकलती थी, वह देखते ही गुर्रा रहे हैं। इशारा कर रहे हैं, वह जा रहा घोटालेबाज। सारी मार्केट खराब कर दी। अब ले लेना और आयोजनों का ठेका।

ताऊ एक खेल अधिकारी को रोक कर ताने पर ताना कसे जा रहे थे। बेचारे ताऊ के व्यंग्य बाणों से बिधे कराह रहे थे। उनकी स्थिति न उगलते बन रही थी न निगलते बन रही थी। ताऊ के तेवर देख मैंने पूछ लिया, इसमें इनका क्या दोष है?  तू चुप कर ताऊ दहाड़े। माना इनका कोई दोष नहीं है लेकिन इनके भाई-बंधुओ ने ही देश की नाक कटवा दी है।

एक आयोजन में इतना बड़ा घोटाला किया है कि धुरंधर घोटालेबाज अपनी अंगुली खुद अपने दांतों से काट रहे हैं। कई बाकायदा कोस रहे हैं। इन लोगों के चलते उनका भी भविष्य चौपट हो गया है। बात खेलों के मुखिया तक पहुंची, मामले की जानकारी मिलते ही सुना है मुखिया जी पसीने -पसीने हो गए। अंदर की खबर है कि मुखिया जी सीधे भगवान की शरण में पहुंच गए हैं। हे भगवान बस एक बार आयोजन सफल करवा दो। इज्जत तुम्हारे हाथों में है। इसके बाद कभी खेलों का मुखिया नहीं बनूंगा। मां कसम।

लेखक सूर्यकांत त्रिपाठी मेरठ से प्रकाशित होने वाले अखबार ‘प्रभात’ में डीएनई हैं.

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