भारतीय संस्कृति में और जीवन-दर्शन में माँ गंगा का स्थान अनन्य है। लगभग ढाई हजार किलोमीटर में वृहद प्रक्षेत्र में प्रवाहित होती है। वह संबंधित इलाकों का तो सीधे भरण-पोषण कर रही हैं, इसके अतिरिक्त पूरे भारत के असंख्य लोगों के हृदय में प्राण-धारा बनकर प्रवाहित हो रही है। इसे दुखद कहा जायगा कि हमारी ही लापरवाही से आज गंगा की धारा कमजोर और प्रदूषित हो चली है। निश्चय ही गंगा के प्रति श्रद्धा का अभिव्यक्ति का सबसे सही तरीका यही होगा कि हम गंगा को प्रदूषण मुक्त कराने व बचाने का दृढ़ संकल्प लें। मां गंगा का धरती पर अवतरण ज्येष्ठ शुक्ल दशमी को हुआ था। इस तिथि को गंगा दशहरा मनाने की परंपरा है। काशी में तो गंगा दशहरा का एक लोक-पर्व के रूप में लोकप्रिय है। इस अवसर पर कन्याएँ, गुड्डे-गुड़ियों का विवाह रचाती हैं, और उनका दीप-पुष्पादि के साथ विसर्जन कर देती हैं। वैसे तो सभी घाटों पर इसकी धूम रहती है, किन्तु दशाश्वमेघ घाट व पंचगंगा घाट पर विशेष गहमागहमी रहती है।
सुखी दामपत्य जीवन की कामना के साथ ही लोक मानस से गंगा का जुड़ाव इसका उद्देश्य है। मान्यता है कि इस अवसर पर गंगा स्नान करने से मानसिक, वाचिक और कायिक दसों दोष नष्ट हो जाते हैं। मानसिक मैल माने गये है। – पराया धन हड़पने का विचार, दूसरों का अहित सोचना, और नास्तिकता, जबकि वाचिक मैल है- कटु संभाषण, मिथ्या संभाषण और परनिंदा। शारिरिक क्रिया दोष माने जाते हैं- व्यर्थ संभाषण, शास्त्र द्वारा वर्जित हिंसा, चोरी और अनैतिक संबंध। किन्तु आज के परिवेश में इन विचारों को ध्यान में रखना कुछ ही प्रतिशत में है। और बढ़ते प्रदूषण द्वारा जीवनदायिनी माँ गंगा के शुद्ध जल पर संकट बना हुआ है। मौजूदा समय में गंगा एक्षन प्लान के तहत पिछले 24 वर्षों में एक अरब से कहीं अधिक खर्च किये जा चुके हैं लेकिन गंगा में गिरने वाले 350 एमएलडी सीवर जल के विपरीत अब तक महज 100 एमएलडी सीवर जल के शोधन का ही बंदोबस्त किया जा सका। शेष 250 एमएलडी सीवर जल आज भी गंगा में प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से गिर रहा है। ऐसा भी नहीं कि शेष सीवर जल के लिए कोई प्लान बना ही नहीं जो भी बने वे सरकारी और प्रशासनिक इच्छा शक्ति के अभाव में नौ दिन चले ढ़ाई कोस के शिकार हो गये।
नगवा नाले से तकरीबन 80 एमएलडी, आरपी घाट नर 8 एमएलडी, राजघाट के निकट 70 एमएलडी नाले का पानी गंगा में गिरते किसी भी समय देखा जा सकता है। इतना ही नहीं तकरीबन 65 एमएलडी कल कारखानों का दूषित जल विभिन्न घाटों पर निकलने वाले छाटे-छोटे नालों के जरिए गंगा में गिराया जा रहा है। इसके अलावा आसपास के कई ऐसे छोटे नाले भी हैं जिनकी जल निकासी आज भी गंगा की ओर है। इसी तरह विभिन्न नालों के जरिए वरूणा में गिरने वाने लगभग 90 एमएलडी सीवर जल परोक्ष रूप से गंगा को दूषित कर रहा है। हालांकि नगवा नाले के लिए रमना में 60 एमएलडी का ट्रीटमेंट प्लांट और बाहर व वरूणापार के सीवर जल की निकासी के लिए सथवां में 260 (वरूणापार के लिए 120 और बाहरी क्षेत्र के लिए 140 एमएलडी) क्षमता का प्लांट प्रस्तावित है। ये कब मूर्तरूप लेंगे कोई नहीं जानता। मसलन, नगर के पुराने और जर्जर हो चले ब्रिक सीवर का लोड कम कर इसके जल को ट्रीटमेंट प्लांटों तक पहुँचाने के लिए रिलीविंग ट्रंक सीवरेज योजना को वर्ष 2005 में ही अंतिम रूप दे दिया जाना था, लेकिन वर्ष 2011 भी अंतिम रूप के करीब आ गया है और इसे अंतिम रूप नहीं दिया जा सका। इतना ही नहीं, अस्सी और वरूणा संगम के बीच 32 जगहों से गंदा पानी गंगा में गिर रहा है। इसके अतिरिक्त पर्यावरण के अभिन्न अंग कहे जाने वाले वृक्षों की संख्या भी बाहरों में लगभग खत्म हो रही है जिससे ताप के बढ़ने का खतरा बना हुआ है।
इतने गहरे संकट को दूर करने के बजाय सरकार गंगा उस पार ग्राम कटेसर के आगे अधिग्रहण कर नई काशी की योजना बना रही है। 400 वर्ष पुराने इस गाँव को उजाड़ने और नई काशी को बनाने में आने वाले खर्च को क्या गंगा के निर्मलीकरण में इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। गंगा तट पर बसे इस गाँव के अधिग्रहण से कुछ परिवार तो अपने आने वाली सन्तानों को अपना इतिहास ही नहीं बता पाएंगे ये वे परिवार हैं जो महज बिस्वा, दो बिस्वा या इससे अधिक के मालिक हैं। और नई काशी बसाने पर इनके द्वारा उत्सर्जित सीवर जल का बहाव फिर गंगा में होगा और उसे रोकने का कोई प्लान क्या सरकार ने बनाया है? अभी तो इतने प्लानों को मूर्तरूप देने के बजाय और जीवनदायिनी माँ गंगा को प्रदूषण मुक्त किये बगैर पूरे गाँव को ही विस्थापित करना न्यायसंगत नहीं है।
राज शर्मा, अमरेश्वर कुमार राय, विनीता सिंह की रिपोर्ट.

