: इसको सफल बनाने के लिए निशानेबाजों को आगे आना होगा : सरकार की कुनीतियों के विरुद्ध विरोध प्रदर्शित करने का हक प्रजातांत्रिक राज्य में ही सम्भव है। धरना-प्रदर्शन, पुतले फूंकना, नंगे बैठना, भूख हड़ताल, पोस्टर जलाना इत्यादि विरोध-प्रदर्शन के सर्वमान्य तरीके हैं। विरोध प्रदर्शन की आग में वर्षों से सरकारी सम्पत्ति ही स्वाहा होती आ रही है लेकिन हाल में जूता फेंककर विरोध-प्रदर्शन का एक नायाब तरीके का इजाद हुआ है, जिसमें सरकारी सम्पत्ति जैसे बस, रेल इत्यादि को नुकसान नही पहुंचता है। विरोध प्रदर्शन की इस पद्धति के इस्तेमाल से उन लोगों के मुंह पर भी ताला जड़ा जा सकता है, जो जूते को हीन दृष्टि से देखते हैं और सोचते हैं कि जूते का स्थान सिर्फ पैरों में ही है!
जूता फेंककर विरोध प्रदर्शन करने का अभूतपूर्व सिलसिला सुदूर स्थित मध्यपूर्वी देश ‘इराक’ से शुरू हुआ और तत्पश्चात भूमण्डलीयकरण की प्रक्रिया के अन्तर्गत सारी राजनीतिक, सांस्कृतिक, सामाजिक एवं आर्थिक सीमाओं को तोड़ते हुए भारतवर्ष की पुण्य भूमि में इस पद्धति का आगमन हुआ है। इस नई जूता-मारू विरोध प्रदर्शन पद्धति को इजाद करने का श्रेय इराकी पत्रकार मुन्तजिर-अल-जैदी को जाता है। जिन्होंने अमरीका सरीखे शक्तिशाली देश के राष्ट्रपति जार्ज बुश पर दिसम्बर, 2008 में इराकी राजधानी बगदाद में जूता फेंका और बुश को ‘कुत्ता’ शब्द से नवाजा। यह जूता जार्ज बुश पर नहीं बल्कि इराक पर किए गए अमरीकी नृशन्सताओं के खिलाफ था। खैर इराकी पत्रकार ने तो पहल कर लोगों को बता दिया कि विरोध प्रदर्शन के पुराने तरीकों को त्यागकर नये और अद्भुत तरीके अपनाने का वक्त आ गया है। पता नहीं इन नए तरीकों को अपनाने से सरकारों के कानों पर जूं रेंगेगी भी या नही, लेकिन कम से कम जूता खाकर ये बड़े-बड़े राजनीतिज्ञों को अपनी असली औकात तो पता चलेगी ही।
जर्मन विद्यार्थी मार्टिन झोंके ने जब टीवी पर इराकी पत्रकार को बुश पर जूता फेंकते हुए देखा तो उससे बहुत अधिक प्रभावित हुआ। पिछले वर्ष फरवरी में कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में जब चीनी प्रीमियर वेन जियाबाओ वैश्विक आर्थिक स्थितियों पर भाषण दे रहे थे, उस वक्त मार्टिन ने जियाबाओ को निशाने पर लेकर उनकी तरफ जूता फेंका लेकिन पैथालोजी का विद्यार्थी होने की वजह से उसका निशाना चूक गया और उसे पहली मर्तबा अहसास हुआ कि काश वह निशानेबाज होता। फिलहाल मार्टिन ने जूता फेंककर अपना विरोध प्रदर्शित किया। वेन जियाबाओ को अपने चीनी कद का लाभ प्राप्त हुआ और वो जूता खाने से बच गए।
जूता-मारू प्रदर्शन पद्धति का आगमन भारत में होने ही वाला था कि इस पद्धति का सदुपयोग यूरोपीय देश स्वीडन में हो गया! यूरोपीय महाद्वीप में इस पद्धति का यह प्रथम प्रयोग था और इसका इस्तेमाल किया गया इस्राइली राजदूत के विरूद्ध। इस्राइली राजदूत पर जूता उस वक्त फेंका गया जब वो स्वीडन में स्टॉकहोम विश्वविद्यालय में श्रोताओं को सम्बोधित कर रहे थे। जूता चला लेकिन निशाना फिर चूक गया और इस्राइली राजदूत भी जूता खाने से बच गए।
विरोध प्रदर्शन के जूता-मारू पद्धति के अगले शिकार पाकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी बने। इस बार परम्परा का निर्वहन एक बुर्जुग व्यक्ति ने किया। बुर्जुग ने जूते उस वक्त मारे जब जरदारी बर्मिन्घम(ब्रिटेन) में एक जनसभा को सम्बोधित कर रहे थे। बुर्जुग का आक्रोश इस बात पर फूटा कि देश (पाकिस्तान) में बाढ़ ने कोहराम मचा रखा है और जरदारी साहब विदेश दौरे कर रहे हैं। वृद्धावस्था ने बुर्जुग को धोखा दे दिया और जरदारी जूता खाने से बच गए अन्यथा दोनों जूतों में से कम से कम एक जूता तो निशाने पर लगता ही।
जूता-मारू प्रदर्शन पद्धति का भारत आगमन
इतिहास गवाह है कि विश्व के ज्यादातर महान अविष्कार दूसरे देशों में ही हुए है लेकिन उन अविष्कारों का सही तरीके से इस्तेमाल हमारे देश में ही हुआ है। जैसे- रेल, बस, मोबाइल, कम्प्यूटर इत्यादि का अविष्कार पश्चिमी देशों में हुआ परन्तु इसका सदुपयोग!(तोड़-फोड़ में) हमारे देश में सर्वाधिक हुआ है। ठीक उसी प्रकार विरोध प्रदर्शन की जूता-मारू पद्धति का सफरनामा शुरू तो मध्यपूर्व से हुआ लेकिन इसे चरम पर पहुंचाया गया हमारे देश में। कई देशों में भ्रमण करने के पश्चात यह पद्धति अन्ततोगत्वा विश्व की उभरती अर्थव्यवस्था भारतवर्ष में पिछले वर्ष, हनुमान जी के पवित्र दिन मंगलवार को पहुंची।
भारत में इस पद्धति की शुरूआत करने का श्रेय दैनिक जागरण के वरिष्ठ पत्रकार जरनैल सिंह को जाता है। जिन्होंने विरोध प्रदर्शन के इतिहास को खंगालने के बाद जूता-मारू पद्धति को विरोध प्रदर्शन की सर्वोत्तम पद्धति पाया। जैसे- ताली कभी एक हाथ से नहीं बजती, ठीक वैसे ही जूता मारने व जूता खानेवाला दोनों ही महत्वपूर्ण है। विरोध प्रदर्शन की जूता-मारू पद्धति का प्रयोग भारत में सर्वप्रथम गृहमन्त्री चिदम्बरम पर उस वक्त किया गया जब वो नई दिल्ली में प्रेस को 1984 के सिख विरोधी दंगों पर जगदीश टाइटलर को सीबीआई की क्लीनचिट के विषय में सम्बोधित कर रहे थे। पत्रकार बन्धु ने आव देखा न ताव और उछाल दिया जूता गृहमन्त्री की ओर। एक बार फिर वही हुआ जो बुश, वेन जियाबाओ, इस्राइली राजदूत और जरदारी के जूता काण्ड में हुआ था। इन सभी नेताओं की तरह चिदम्बरम साहब भी किस्मत के धनी निकले और जूता खाने से बच गए! इस काण्ड की पूरे देश में भर्त्सना हुई लेकिन पत्रकार साहब ने अपना नाम इस पद्धति के उपयोग एवं भारत में इसके प्रणेता के रूप में इतिहास में दर्ज तो करा लिया।
हरियाणा स्थित कुरूक्षेत्र में जब कांग्रेस के सासंद नवीन जिंदल भाषण दे रहे थे तो बबैन गांव के सरकारी स्कूल के 62 वर्षीय रिटायर्ड स्कूल प्रधानाध्यापक राजमल सिंह ने जूता जिंदल पर फेंका। इस बार निशाना चूका तो लेकिन बेकार नहीं गया! जिंदल साहब तो जूता खाने से बच गए लेकिन जूता कांग्रेस के एक पार्टी कार्यकर्ता को लग गया फिर क्या था, मंच पर उपस्थित स्थानीय विधायक रमेश गुप्ता ने अपने दिमाग को खंगाला और हाईस्कूल में पढे़ गए न्यूटन के गति के तीसरे नियम (प्रत्येक क्रिया की बराबर व विपरीत प्रतिक्रिया होती है) का प्रयोग करते हूए जूते को पुनः उसी दिशा में उतने ही वेग से फेंका, जितने वेग से व जिस दिशा से जूता आया था। इस प्रकार पहली बार इस पद्धति में विज्ञान के नियमों का प्रयोग हुआ और यह पद्धति वैज्ञानिक भी हो गई! अतः अब विरोध प्रदर्शन की इस पद्धति के अस्तित्व पर सवाल उठाना बेवकूफी होगी।
हाल ही में जम्मू-कश्मीर के मुख्यमन्त्री पर जूता उस वक्त फेंका गया, जब वो स्वतन्त्रता दिवस के अवसर पर लेह की स्थिति पर भाषण दे रहे थे। जूता प्रदेश पुलिस के एक निलंबित अफसर ने फेंका था। जम्मू-कश्मीर के स्थानीय निवासी बताते है कि जो जूता मुख्यमन्त्री पर फेंका गया था, उसमें कुछ भरा गया था, जैसे गोल गप्पों में पानी भरा जाता है। जूता मारने वाले शख्स की हौसला अफजाही करने के लिए उसके साथ उसके पन्द्रह अन्य साथी भी थे। जूता काण्ड के पश्चात जिनकी तालियों की गड़गड़ाहट से माहौल गरम हो गया।
जूता-मारू प्रदर्षन पद्धति के उपरोक्त वाकयों के विश्श्लेषण करने पर कुछ बातें साफ हो जाती है। पहली यह कि इस पद्धति का चलन अभी आम नहीं है, इसका प्रयोग सीमित है एवं केवल उच्च शिक्षित और सभ्य समाज के पास ही इसका प्रयोग करने का अधिकार है। प्रत्येक काण्ड में जूता मारने व जूता खाने वाला दोनों ही सभ्य व शिक्षित त समाज से सम्बन्ध रखता है। दूसरे अभी तक जिन महानुभावों ने अभी तक इस पद्धति का प्रयोग किया है उन सबको निशानेबाज न होने का मलाल हो रहा है। एक बात तो साफ है कि अगर इस पद्धति को सर्वमान्य बनाना है तो उन लोगों को सामने आना होगा जो सभ्य व शिक्षित समाज से ताल्लुक रखने के साथ-साथ अच्छे निशानेबाज भी हो। तीसरे यह कि सभी लक्ष्य (राजनेता) किस्मत के धनी थे! देखते है किस्मत राजनेताओं का साथ कब तक देती है, कभी न कभी तो कोई सूरमा पैदा ही होगा, जो जूता-मारू पद्धति का प्रयोग करके समस्या का समाधान निकलवाएगा।
लेखक नीरज अम्बुज स्वतंत्र पत्रकार हैं.

