स्वघोषित हिंदी पट्टी के प्रमुख क्षेत्र बिहार और झारखण्ड में पत्रकारिता बाजार खुद को तलाश रहा था. चैनल को चलाने वाले मैनेजमेंट ने बिहार और झारखण्ड में संभावनाओ को तलाशना शुरू कर दिया. पत्रकारिता के विषय पर बिहार की पत्रकारिता काफी पहले से ही परिपक्व हो चुकी थी. राष्ट्रीय पत्रकारिता में बड़े-बड़े नाम या तो बिहार से होते थे या बिहार की पत्रकारिता में उनका दखल होता था. परन्तु बिहार के समय से ही झारखण्ड (पहले का दक्षिण बिहार) राजनीतिक और सामाजिक दृष्टि से पिछड़ा था. बिहार के राजस्व का बड़ा भाग झारखण्ड से प्राप्त होता था, लेकिन झारखण्ड के लोगों को इसका सीधा लाभ नहीं मिल पा रहा था. ले-देकर बिहार की सत्ता गर्मियों के महीने में रांची शिफ्ट हो जाया करती थी, चूँकि रांची तत्कालीन बिहार की ग्रीष्मकालीन राजधानी थी. प्रभात खबर और रांची एक्सप्रेस जैसे अखबार स्थानीय झारखण्ड के मुद्दे को गरम कर रहे थे.
वर्ष 2000 में झारखण्ड राज्य का निर्माण हुआ. झारखण्ड राज्य के निर्माण के समय राज्य से बाहर के लोग सिर्फ रांची, जमशेदपुर, धनबाद और बोकारो जैसे व्यवयासिक स्थानों को ही जानते थे और बाकी जगहों की जानकारी सिर्फ झारखण्ड के सरकारी खातों और नक्शों में ही थी. अलग राज्य के निर्माण के साथ ही झारखण्ड की आर्थिक स्थितियों ने उछाल मारा. चूँकि झारखण्ड प्रदेश आदिवासी बाहुल्य राज्य था इसलिए यहां पर रियल एस्टेट संबंधी जरूरतों का बुनियादी अभाव था. अचानक ही नया राज्य बन जाने के कारण बाहर से आये नौकरीपेशा लोगों और वर्षों से यहां के भूगर्भ पर गिद्ध की दृष्टि जमाये माफियाओं के लिए घर संबधी जरूरतों को पूरा करना नितांत ही आवश्यक था. चूँकि झारखण्ड राज्य में गैर आदिवासियों और झारखण्ड से बाहर के लोगों के लिए जमीन खरीदने में एक तरह से पाबंदी है, ऐसे में स्थानीय भू-माफियाओं, भ्रष्ट नेताओं, बेलगाम अधिकारियों और बिल्डर माफियाओं ने न सिर्फ नियमों को तोड़ा बल्कि विलुप्ति के कगार पर खड़े आदिवासियों को चंद पैसे और शराब की ऐसी लत लगायी कि आदिवासी कंगाल और जमीन से बेदखल हो गए और भूमाफियाओं, नेताओं अधिकारियों और बिल्डरों को रातों-रात करोडपति बना दिया.
इन भ्रष्ट लोगों ने अपने साथ ऐसा कॉकस तैयार किया जिसने पत्रकारिता जैसे पवित्र पेशे के लोगों को भी इस दलदल में खींच लिया. अब भ्रष्टाचार के इस पंक्ति में पत्रकार सबसे अगुआ बन बैठे. सत्ता का शीर्ष दलाली के दलदल में आकंठ डूब चूका था और लोकतंत्र के सभी स्तंभ (न्यायपालिका छोडकर) इस दलाली दरबार में जी हजूरी कर रहे थे. इस बीच रिजनल मीडिया के प्रादुर्भाव ने इसी चाल में कदमताल ही किया. हालांकि कुछ अख़बारों में अभी पत्रकारिता जिन्दा बची थी परन्तु इस वक्त उनकी आवाज नक्कारखाने में तूती ही साबित हो रही थी. अब स्थिति यह हुई कि अपने पेशे के साथ इमानदार अख़बारों को इसका दंड मिलने लगा. बिल्डर माफिया कभी नहीं चाहते थे कि उनके विरुद्ध कहीं भी किसी तरह का चर्चा भी हो. ऐसे में बिल्डर यहां के अखबार के लिए संजीवनी बूटी बन गए. इन माफियाओं ने मीडिया के सबसे ताकतवर वर्ग को मानो खरीद लिया. मीडिया का यह वर्ग उनके कहे पर नाचने लगा. भ्रष्टाचार के दलदल में आकंठ डूबने के बावजूद स्थानीय न्यायपालिका ने बार-बार सरकार का कान ऐंठा. बाद में इन माफियाओं को खतरे का एहसास नहीं खत्म हुआ तो उन्होंने नयी चाल चली. अब वे खुद का मीडिया हॉउस खड़ा करने लगे. रिपोर्टरों को बड़े बड़े प्रलोभन दिए जाने लगे. ऐसे में झारखंड कि पत्रकारिता फिर से चौराहे पर खड़ी है, बेबस और लाचार, शायद अपनी नियति पर आंसू बहा रही है…
लेखक अनंत झा पिछले एक दशक से झारखंड की पत्रकारिता में सक्रिय हैं. प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक दोनों मीडिया में काम करने का अनुभव है. इन दिनों यायावरी कर रहे हैं.

