परिवार में तीन भाई हैं, जमीन का टुकड़ा सिर्फ सौ गज का, पिता-माता चाहते हैं कि जीते जी बंटवारा हो जाए। उपाय उस जमीन को बेचकर आपस में चार हिस्से कर लें, या किसी बिल्डर से डील कर, बेसमेंट के अधिकार उसे सौंप दें, अथवा अपने-अपने पैसे से एक-एक मंजिल बना लें और उसकी रजिस्ट्री अपनी-अपनी पत्नियों के नाम करवा लें। आसान जमीन को बेचकर हिस्सा बांट है, परंतु जमीन के टुकड़े के साथ जुड़ी भावनाएं नि:संदेह अधिक मूल्यवान हैं। ऐसी ही भावनाएं जन्मभूमि बाबरी विवाद में हैं। अब जजों ने जो फैसला कर दिया, सो कर दिया। आजकल समाज में फ्लैट संस्कृति का बोलबाला है, फ्लैट भी अब कम के नहीं करोड़ों, अरबों के हैं। एक फ्लैट पर सब्र करने वाले बहुतेरे हैं। वे न तेरे हैं, न मेरे हैं, सब राम के हैं, रहीम के हैं। खुदा या भगवान भी सब्र कर लेंगे। विवादित टुकड़ा 2.7 एकड़ में से एक तिहाई रामलला को, शेष निर्मोही अखाड़ा और मुस्लिम समुदाय में बराबर बांट दिया गया। निर्मोही भी भूमि मोह की जबरदस्त जकड़ में है।
इस भूमि पर हक जमाने वाले उसे बेचने की तो सोच नहीं सकते, ऐसा काम राजनेता करते हैं। तो हो सके तो वहां एक बहुमंजिला मंदिरी-मस्जिदी टॉवर बना दिया जाये उस बहुमंजिली टॉवर की छत पर अखाड़ा बना लिया जाए। खूब आनंद रहेगा, जिसको चाहे ऊपर ले जायें, थोड़ी कोशिश में वह नीचे टपक पड़ेगा। सब कुछ मन के आनंद के लिए ही तो है। तन के आनंद का वहां कोई स्कोप है भी नहीं।
एक फ्लैट हिन्दुओं को दे दें जो अपने 32 करोड़ 99 लाख 99 हजार 9 सौ निन्यानवै प्लस रामलला को उसमें समायोजित कर लें। एक फ्लैट मुसलमानों को दिया जाये, वो जैसा चाहे उपयोग करें। बकाया बाकी अखाड़चियों को दिया जाये और दो-चार अधिक रहें। कौन सी मंजिल के फ्लैट में किसका आराध्य बसेगा, लॉटरी से निर्णय लिया जा सकता है या सब सहमत हों तो टॉवर की छत पर दंगल करके फैसला …।
जब इंसान इन फ्लैटों में खुशी हासिल कर सकता है। तो उसके पूज्य को आपत्ति भला क्यों होगी। एतराज तो सिर्फ नेताओं को होता है, कट्टरपंथियों को होता है, जो हर मुद्दे पर रोटी सेंकने का लुत्फ लेते रहते हैं। किसी की खुशी लूटने या उस पर डाका डालने की संस्कृति का असर तो यहां पर भी है। हम अपने मां-बाप को तो दुखी रखने में संकोच नहीं करते हैं परंतु मंदिर-मस्जिद के लिए, लड़ कर क्यों यह मुगालता पालते हैं कि ईश्वर अवश्य खुश हो रहा होगा। मिट्टी की यह लड़ाई सब कुछ जरूर मिट्टी ही कर देगी। चलो, मिट्टी होने से पहले सब मिलकर विवादित भूमि पर टॉवर निर्माण की सहमति बनाते हैं।
लेखक अविनाश वाचस्पति वरिष्ठ पत्रकार और लेखक हैं. व्यंग लेखन में इन्हें महारत हासिल है. यह व्यंग डीएलए में प्रकाशित हो चुका है.

