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टीवी पर ज्‍योतिष विद्या और उजला कौवा काला बंदर

ज्‍योतिष : ये भविष्यवाणियां मूल रूप से एक अवसाद उत्पन्न करती और कुछ नही : टेलीविजन चैनलों की चक्कर में पड़ गया तो फिर तो उपर वाला भी अपने हाथ खड़े कर देगा :आजकल टेलीविजन पर प्रतिदिन ज्‍योतिषों का मेला लगा रहता है और उनकी बातें कुछ अजीब तरह का सनक मन में पैदा कर देती है। आपका शनि चौथे घर में मंगल के साथ बैठा हुआ है, इसके निवारण हेतु आप प्रतिदिन एक मुठ्ठी चावल बंदरों को खिलाएं! अब इस तरह के नुस्‍खे अगर अपनाने चलेंगे तो फिर मुसीबत तो होगी ही। हमारे एक मित्र भी इन बातों से प्रभावित होकर चले बंदरों को चावल खिलाने। अब बंदर तो रहा बंदर …आंख बचाकर चावल खाने की जगह मित्र को ही काट खाया नामुराद ने। मित्र का शनि वाकई भारी पड़ गया ।हमारे देश में कुछ बातें इस हद तक लोगों के मन मंदिर में घर कर जाती है जिससे पीछा छुड़ाना बहुत मुश्किल हो जाता है।

ज्‍योतिष : ये भविष्यवाणियां मूल रूप से एक अवसाद उत्पन्न करती और कुछ नही : टेलीविजन चैनलों की चक्कर में पड़ गया तो फिर तो उपर वाला भी अपने हाथ खड़े कर देगा :आजकल टेलीविजन पर प्रतिदिन ज्‍योतिषों का मेला लगा रहता है और उनकी बातें कुछ अजीब तरह का सनक मन में पैदा कर देती है। आपका शनि चौथे घर में मंगल के साथ बैठा हुआ है, इसके निवारण हेतु आप प्रतिदिन एक मुठ्ठी चावल बंदरों को खिलाएं! अब इस तरह के नुस्‍खे अगर अपनाने चलेंगे तो फिर मुसीबत तो होगी ही। हमारे एक मित्र भी इन बातों से प्रभावित होकर चले बंदरों को चावल खिलाने। अब बंदर तो रहा बंदर …आंख बचाकर चावल खाने की जगह मित्र को ही काट खाया नामुराद ने। मित्र का शनि वाकई भारी पड़ गया ।हमारे देश में कुछ बातें इस हद तक लोगों के मन मंदिर में घर कर जाती है जिससे पीछा छुड़ाना बहुत मुश्किल हो जाता है।

ये बात सही है कि ज्योतिष विधा की भी अपनी एक जगह होती है, पर हर वक्‍त केवल ज्योतिषों की बातें अगर हम अपनाने चले, फिर तो जीवन की नैया है राम के भरोसे, जीवन की नैया को राम ही बचाई लें। केवल भाग्य के भरोसे बैठे रहने पर तो भाग्य भी सोया रहता है, जरूरत तो है हिम्मत बाँध कर खड़े होने की, निश्चित रूप मे तब भाग्य भी उठ खड़ा होगा। पर हम तो भाई जैसे हैं वैसे रहेंगे और बात तब जाती है बिगड़।

कभी एक ज्योतिष बता रहे थे कि आप अपने शरीर के भार के बराबर का अन्न दस दिनों तक गरीबों में बांटें आपका गुरू आपके लिए सहायक हो जायेगा। अब 87 किलो के किसी इसांन के लिए दस दिनों तक अपने शरीर के भार के बराबर अन्न दान करना, वो भी तब, जब आम आदमी आज की महंगाई से पीडि़त है, यह कहां तक जायज है ? उसका दिल तो उपाय सुनकर और ज्यादा घबरा जाता है। पहले क्या दुनिया मे इतने ग्रह नक्षत्र नही थे? और क्या इनका हर बार दुनिया में प्रलय मचाने का इरादा नही होता था ? ठीक है कि मीडिया के प्रभाव में आने के बाद से लोग इन सब बातों से ज्यादा रूबरू होते रहते हैं, पर इसका मतलब ये बिलकुल भी नही होना चाहिए की हमारी आशक्ति अंधी हो जाए।

आज टेलीविजन चैनलों में लोगों को भयभीत करने का पूरा पूरा बंदोबस्‍त किया जाता है, और सच तो यह भी है कि भय से ही दुःख आते हैं, भय से ही मृत्यु होती है और भय से ही बुराइयाँ उत्पन्न होती हैं। ये भय इतना कारगर सिद्ध होता है कि इन कार्यक्रमों से लोग अपने को कभी अलग कर के नही देखना चाहते हैं। जिन राशियों से उनका सम्बन्ध होता है कम से कम उसका पूरा विवरण तो वो ले ही लेना चाहते हैं। मीन राशि के जातकों के लिए समय बडा बलवान है, तो मेष राशि के जातकों को सावधानी बरतनी होगी। पता चला मीन राशि वाला जातक इतना प्रसन्न हो गया कि खुशी में अपनी बाइक किसी के उपर चढ़ा दिया और मेष राषि का जातक इतना परेशान हो गया कि राह में खुले मेनहोल मे जा गिरा ।

ये भविष्यवाणियां मूल रूप से एक अवसाद उत्पन्न करती और कुछ नही। अब उपाय मे कबूतरी के दूध में खीर बनाकर अहले सुबह सियार को खिला दे, चितकबरे कुत्ते की पूंछ में मलाई लगा कर उसे स्नान करवाये, प्रतिदिन एक लोटा शहद काले कौवे को चटा दें, बूढ़े लंगूर से अपना पीठ खुजलवाये, इत्यादि भी आने वाले दिनों में सुनने को मिलने लगे तो आश्चर्य नही होगा। ये सब क्या है ? एक इसांन अगर परेशानियों का मारा है तो वो तो ऐसे भी किसी भी तरह से उससे छुटकारा पाने का प्रयास करेगा। और उस पर से अगर टेलीविजन चैनलों की चक्कर में पड़ गया तो फिर तो उपर वाला भी अपने हाथ खड़े कर देगा ।

क्या इन टेलीविजन चैनलों में इस तरह की भविष्यवाणियां और उसके अनाप-शनाप उपाय ज्योतिष विधा का अपमान नही है ? आँख के अंधे को दुनिया नहीं दिखती, काम के अंधे को विवेक नहीं दिखता, मद के अंधे को अपने से श्रेष्ठ नहीं दिखता और स्वार्थी को कहीं भी दोष नहीं दिखता। आज के दौर में ये टेलीविजन चैनलों का स्वार्थ ही कहा जायेगा और कुछ नही। बिना मतलब का ये टीआरपी का खेल कई लोग या परिवार को ले डूबे, क्या सही होगा समाज के लिये ? मैने बहुत से ऐसे लोग या परिवार देखे हैं, जो इस तरह के चक्कर में फंस गये और फिर आगे जाकर अपनी स्थिति पहले से भी ज्यादा बेहाल कर के रख लिया ।

पृथ्वी का अंत हो जायेगा… फलां लोगों ने ये भविष्यवाणी की तो फलां ने ये गणना की… एक तेरह साल का बच्चा जो कक्षा नौ का विधार्थी है, इसलिए अब पढ़ाई मे ध्यान नही दे रहा था क्यूंकि उसके मन में ये बात बैठ चुकी थी दिसम्बर 2012 में पृथ्वी का अंत हो जायेगा, तो अब पढ-लिख कर हम क्या करें! अब तो कुछ ही दिनो में हम सब मर जायेंगे। ये जानकारी उसे कहां से मिली ? एक नहीं अनेक टेलीविजन चैनलों में ये बात कई बार दिखाई गयी है और टेलीविजन चैनल झूठ तो बोलेगा नही! अब बताएं कि उस किशोर को क्या समझ में आया और वो इसका क्या परिणाम निकाल कर आगे बढ रहा है?

सन्तोषः परमो लाभः सत्सङ्गः परमा गतिः, विचारः परमं ज्ञानं शमो हि परमं सुखम् अर्थात Contentment is the highest gain, Good Company the highest course, Enquiry the highest wisdom and Peace the highest enjoyment. क्या टेलीविजन चैनल इन बातों को कभी ध्यान में रखकर चलेगा ? ये ना तो संतोष दे पाते है, ना ही सत्संगति, ना ही सही जानकारी बांटने पर इनका ध्यान है और ना ही शांति प्रदान करने के उद्देश्य से ये कुछ करने जा रहे है । यहां तो बस जितना भ्रम और भय का संचार इन कार्यक्रमों के माध्यम से किया जा सके वही सबसे श्रेष्ठ है इनके लिए ।

स्वामी विवेकानंद ने एक बार कहा था -: ‘सभी मरेंगे- साधु या असाधु, धनी या दरिद्र। चिर काल तक किसी का शरीर नहीं रहेगा। अतएव उठो, जागो और संपूर्ण रूप से निष्कपट हो जाओ। भारत में घोर कपट समा गया है। चाहिए चरित्र, चाहिए इस तरह की दृढ़ता और चरित्र का बल, जिससे मनुष्य आजीवन दृढ़व्रत बन सके।’ अत: टेलीविजन चैनल के इस तरह के नित्य नये नये पचड़ों में पड़ने से कोई लाभ नही होने वाला है। हमारा ध्यान अपने कर्म की ओर रहे तो एक न एक दिन भगवान सब का भला करेंगे ही। आज चाहे वो तमाम चैनल हो या फिर हम आमजन सभी को आवश्यकता है निष्कपट होने की और चरित्र निर्माण की ।

लेखक अनिकेत प्रियदर्शी पत्रकार और ब्‍लागर हैं.

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