
अतुल
मैंने पूछा था कि घोटाले के आरोप बीजेपी लगा रही है और जांच का भरोसा हर कांग्रेस दिला रही है, सवाल ये उठता है कि जांच की नौबत ही क्यों आई? हर कोई अपनी-अपनी ज़िम्मेदारी को ईमानदारी से क्यों नहीं निभाता? क्यों हम जैसे आम आदमी, जो टैक्स चुकाता है, की मेहनत की कमाई की बंदरबांट की जा रही है?
सवाल बहुत सीधा सा था, लेकिन पता नहीं क्यों, शायद चर्चा में हावी होने की मंशा से नकवी साहब भड़क गए। फट पड़े। पहले तो आईओसी अध्यक्ष सुरेश कलमाड़ी को जमकर खरी-खोटी सुनाई। शब्दों का भी ख्याल नहीं रखा। कलमाड़ी को दलाल, घोटालेबाज़, माफिया और खेलों का तालिबानी तक कह डाला। ये भी कहा कि ऐसे माफियाओं को जेल में ठूंस दिया जाना चाहिए। बाद में उन्हे मेरे टैक्स चुकाने वाले सवाल की याद आई होगी तब वो मुझे भी आड़े हाथों लेने की कोशिश की। उन्होंने कहा, “आप टैक्स-पेअर जैसे अंग्रेज़ी के शब्दों का बेकार इस्तेमाल बंद कीजिए। सारे टैक्स पेअर बेईमान होते हैं और कालाबाज़ारी में लगे हुए हैं। नंबर दो की कमाई को नंबर एक में करने में लगे हुए हैं टैक्स पेअर। आप बार-बार टैक्स पेअर की बात क्यों कर रहे हैं?”
मुख्तार अब्बास नकवी की इस बात को सुनकर वरिष्ठ पत्रकार प्रदीप सौरभ ने सबसे पहले विरोध दर्ज कराया और कहा कि नकवी जी आपका ये बयान घोर आपत्तिजनक है और निंदनीय है। मैं इसकी भर्त्सना करता हूं। इसके बाद शकील अहमद और अबुनी राय ने भी इस बयान की आलोचना की। मैंने फिर पूछा, “नकवी साहब आप गुस्से में आग-बबूला होकर देश के सभी टैक्स चुकाने वालों को बेईमान कह रहे हैं, मैं भी टैक्स चुकाता हूं, ज्यादा न सही थोड़ा ही सही, लेकिन मैं बेईमान नहीं हूं। मैं आपको चुनौती देता हूं कि आप अपनी बात को साबित करें।” इतनी देर में शायद नकवी जी को अपनी भूल का अहसास हो चुका था। वो बोले कि मैनें सभी को नहीं कुछ लोगों को बेईमान और कालाबाज़ारी करने वाला कहा है, जो काली कमाई को सफेद करने में जुटे हुए हैं।
लेकिन नकवी जी की ये बात किसी को भी हज़म नहीं हुई। कमान से निकला तीर और जुबान से निकली बात वापस तो आती नहीं। अब नकवी जी ने गैर-ज़रूरी बात बोल दो दी लेकिन उसकी काट कैसे करें, ये उन्हें खुद समझ नहीं आ रहा था। लगे लीपापोती करने में। मुख्तार अब्बास नकवी ये बात उनके गले की फांस बन गई। कहां पहले वो कॉमनवेल्थ खेलों में हुए घोटालों के मुद्दे पर कांग्रेस को घेर रहे थे, कहां खुद लेने के देने पड़ गए। ज्यादा होशियारी दिखाने के चक्कर में देश के टैक्स पेअर्स को बेईमान कह डाला, सो उनकी हालत वैसी हो गई जैसे चौबे जी की हुई थी। चौबे छब्बे बनने गए थे लेकिन दुबे बन कर लौटे। कांग्रेस के शकील अहमद और वाम दल के अबुनी राय ने तो कोसा ही, पत्रकारों की भी नाराज़गी झेलनी पड़ी सो अलग।
इस गरमा-गर्म बहस-मुबाहिसे के बीच मैंने पूछा कि अच्छा ये बताइए कि आप टैक्स भरते हैं कि नहीं? चुनावी हलफनामे में जो ब्यौरा आपने दिया था वो आपको याद है? इस पर नकवी साहब बोले हां, मैं देश का नागरिक हूं और टैक्स भरता हूं। तुरंत ही मैंने क्रॉस क्यूश्चेन किया कि तो फिर आप भी वही हुए जो आपने तमाम टैक्स पेअर्स के लिए कहा है? नकवी साहब लगे बगलें झांकने। सफाई पर सफाई देने लगे जनाब। अड़ गए कि मैनें सभी के लिए नहीं कहा है, सिर्फ उन बड़े टैक्स चोरों की तरफ इशारा था, जो टैक्स बचाते हैं और काले को सफेद करते हैं।
कुल मिलाकर मुख्तार अब्बास नकवी साहब बुरे फंसे। सोच रहे होंगे कि जाने कहां से ये बेतुका बयान मुंह से निकल गया। माहौल खासा गरमा-गर्म हो चुका था। मुख्तार अब्बास साहब पर चौतरफा शाब्दिक हमले होने लगे थे। थोड़ी देर बाद मैंने खुद ही कहा, “लगता है कि हम मुद्दे से भटक रहे हैं। हम कॉमनवेल्थ खेलों की तैयारियों में हुए भ्रष्टाचार और आर्थिक बंदरबांट पर चर्चा करने के लिए इकट्ठा हुए थे लेकिन मुख्तार साहब ने टैक्स पेअर पर गैर-ज़रूरी टिप्पणी कर बहस को दूसरी तरफ मोड़ दिया। मैं और दूसरे पैनेलिस्ट नकवी साहब से पूरी तरह से असहमत हैं और उनके इस बयान की घोर निंदा करते हैं। चलिए अब हम अपने मूल मुद्दे पर वापस लौटते हैं।”
इसके बाद कॉमनवेल्थ की तैयारियों पर आई सीवीसी की रिपोर्ट की चर्चा हुई और बिना किसी नतीजे के खत्म भी हो गई। इंडिया न्यूज़ का सबसे बड़ा शो इंडिया प्राइम टाइम भी खत्म हो गया, लेकिन असल मुद्दा जस का तस बना रह गया कि आखिर मुख्तार अब्बास नकवी की ज़ुबान क्यों और कैसे फिसल गई? क्या मुख्तार अब्बास नकवी साहब देश के करोड़ों टैक्स पेअर्स के अपमान के लिए माफी मांगेगे? सबसे बड़ा सवाल तो ये है कि खुद को अलग चाल, चरित्र और चेहरे वाली पार्टी बताने वाली बीजेपी क्या इस महा-बकवास बयान के लिए नकवी साहब को समझाइश देगी? अगर हां, तो ठीक, वरना उसे खोखले आदर्शों और भोथरी नैतिकता जैसे कर्मकांडी ढोंग से बाज़ आना चाहिए।
लेखक अतुल अग्रवाल वरिष्ठ पत्रकार तथा इंडिया न्यूज चैनल में एंकर हैं.

