हर वर्ष 14 नवंबर को नेहरू जी की याद के साथ ही प्रगति मैदान में महाफेयर का उद्घाटन किया जाता है। जिसे देश-विदेश के लोग देखने के लिये उत्सुक रहते हैं। इस बार के 30 वें ट्रेडफेयर का भी सभी को बेसब्री से इंतजार था, लेकिन आम जनता को करना पड़ा पांच दिन का इंतजार। चलिए देर आए, दुरूस्त आए। अगर पिछले पांच दिनों का लेखा-जोखा मिलाएं तो कुछ ऐसा होगा कि कई मुद्दे सामने आये हैं – जैसे कि पहले तो टिकटों की कहानी। अधिकारियों की माने तो एक दिन में टिकटों की बिक्री कम से कम तीन से चार हजार के बीच की है, लेकिन रोजाना 45 से 80 हजार भीड़ के दर्शन हो रहे हैं तो आंकड़ों का मेल कुछ सही नहीं बैठता। दूसरी ओर अधिकारी बताते है कि इस बार मुफ्त पास में कटौती कर दी गई है। साथ ही पवेलियन में स्टाल कर्मचारियों को भी इस बार मुफ्त पास उपलब्ध नहीं करवाये गये। तो यदि ऐसा सब कुछ है जो कागजों में नजर आ रहा है तो इतनी भीड़ को बुलावा किसने दिया। वक्त के अनुसार पहले पांच दिन बिजनेस को ध्यान में रखकर ही अलग रखे गये थे, लेकिन छोटे-छोटे बच्चे व युगलों का जोड़ा कौन सा बिजनेस प्रजेंटेशन देने के लिये वहां पर आये थे, जरा इसका जवाब भी दीजिए।
सुनने में आया है कि आकर्षण खींचने के लिये ही एक पास पर दो से चार लोगों की एंट्री की जा रही है, साथ ही चार सौ रूपये के पास को कम से कम 100 रूपये में बेचा जा रहा है। इसका पुख्ता सबूत तब मिला जब एक पत्रकार अपने दोस्त का बाहर इंतजार कर रहा था और अचानक एक युवक ने आकर उसको अंदर एंट्री करवाने का ऑफर देते हुए चार सौ रूपये की बिजनेस टिकट ना लेते हुए मात्र दो सौ रूपये में कॉम्पलिमेंट्री पास लेने के लिये कहा। जब इस पत्रकार ने कहा कि मुझे एक नहीं दस पास चाहिए तो उसने फौरन ही इस टिकट की कीमत से 200 से 150 कर दी। ज्यादा मोलभाव करने के बाद उसने इसको 100 रूपये में हमें बेचने को तैयार हो गया। हालांकि इन पास व टिकटों का अधिकारी वो कैसे बना इस बारे में वो कुछ भी नहीं बोला। लेकिन उसके गले में लटके आई कार्ड से साफ हुआ कि वो सर्विस प्रोवाइडर बतौर कार्यरत था।
इस बाबत अधिकारी कुछ भी बोलने पर तैयार नहीं है।
दूसरा सबसे बड़ा घोटाला शायद आपको कभी भी आईटीपीओ के तहत सुनने में आये, जिसकी खबर हमने पहले भी दी थी। इस वर्ष आईटीपीओ में चल रहा है माफियाओं का बोलबाला, वो भी आईटीपीओ के अधिकारियों के इशारे पर ही। कहानी में पेंच यह है कि आईटीपीओ के एफ एंड बी मैनेजर ने ट्रेड फेयर शुरू होने से पहले ही टेंडर निकाले थे। लेकिन इन टेंडरों पर किसी का भी ध्यान नहीं गया। क्यों? इन ट्रेंडरों में ऐसी शर्ते व नियम जानबूझकर रखे गये थे जो सीधा एक ही कंपनी की जेब में गये, वो है दाना-पानी कंपनी। असल में यह पूरा खेल दाना-पानी कंपनी व आईटीपीओ के एफ एंड बी मैनेजर की मेल-जोल से ही खेला गया था। खाली पड़े स्थानों व स्टाल्स को किसी राज्य को खाना खिलाने के उद्देश्य से ही बेचा गया, लेकिन सिर्फ उन्हीं राज्यों ने इसे खरीदा जिसने पहले से ही दाना-पानी कंपनी से हाथ मिला रखा था। जैसे कि भारतीयम की लोकेशन पर जम्मू एंड कश्मीर राज्य ने अपने स्टाल को खरीदा और उसने सांठ-गांठ के चलते इसी स्टाल को दाना-पानी कंपनी को कम कीमत पर बेच दिया। आज वहां पर पब्लिक की नजर में जम्मू एंड कश्मीर का स्पेशल फूड स्टाल है, लेकिन वहां पर बिकता है दाना-पानी कंपनी के ठेलेवालों द्वारा बनाया गया खाना, जिसमें है छोले-भटूरे, चाउमीन, नूडल्स आदि। ऐसा सिर्फ एक राज्य के स्टाल पर नहीं बल्कि सारे फूड कोर्ट में देखा जा सकता है, क्योंकि उस स्थान पर किसी राज्य के स्पेशल खाने का स्वाद लेने के लिये लोगों की आंख में धूल झोंककर आईटीपीओ के एफ एंड बी मैनेजर व दाना-पानी कंपनी की मिलावट परोसी जा रही है। पिछले साल तक आईटीपीओ इन स्टाल्स को एक करोड़ की कीमत पर 11 महीने के लिये किराये पर देता था, लेकिन इस सांठ-गांठ के चलते अब यही स्टाल्स एक लाख की कीमत में दिया गया है।
इसके अलावा प्रगति मैदान में खाली पड़े बैंक्वेट हॉल व फूड कॉर्नर अपनी ही दशा को बयान करते नजर आते है। इन स्थानों का खाली रहना भी यही टेंडर घोटाला है। इससे सरकार को लगभग 6 करोड़ का नुकसान हुआ है। पिछले दस साल के आंकड़ों पर नजर दौड़ाए तो इन बैंकवेंट हॉल व फूड कॉर्नर से आईटीपीओ को पांच से छ: करोड़ का मुनाफा हुआ था लेकिन इस बार मुनाफा मात्र 40-50 लाख तक सिमट कर रह गया। अब सवाल यह उठता है कि टिकटों व मुफ्त पास पर हो रही धांधली किन अधिकारियों की मिली-भगत के सहारे हो रही है। इसके अलावा पब्लिक को स्वादिष्ट खाने के नाम पर ठेलेवालों का भोजन चखाने का क्या उद्देश्य है। सबसे बड़ा सवाल तो यह है कि इस टेंडर घोटाले से हुए सरकार को करोड़ों का चूना लगाने वाला का चेहरा कब सामने आयेगा।
लेखिका अनिका अरोड़ा पत्रकारिता से जुड़ी हुई हैं.

