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डीएवीपी के लिए उर्दू अखबारों ने मोर्चा खोला

: छोटे अखबारों को निपटाने में लगे हैं बड़े अखबार : नेताओं की मदद से सरकारी विज्ञापन पाने का लगा रहे हैं जुगाड़ :  संगठन बनाया जाए और फिर किसी समस्या के हल के लिए मिलकर कोशिश की जाए : हिन्दी और अंग्रेज़ी के समाचार पत्रों की तरह उर्दू के समाचार पत्रों में भी आपस में काफी मुकाबला देखने को मिलता है। अंतर सिर्फ इतना है कि एक ओर जहां हिन्दी और अंग्रेज़ी के समाचार पत्र खबरों के लिए मुकाबला करते हैं, वहीं उर्दू के अखबार सिर्फ इस बात के लिए एक दूसरे से मुकाबला करते हैं कि अधिक से अधिक मंत्रियों से कैसे जान पहचान बनाई जाए, कैसे ड़ीएवीपी में बड़े अधिकारियों से मिलकर अधिक से अधिक विज्ञापन हासिल किया जाए। उर्दू अखबारों में यह भी एक चलन है कि यहां हर अखबार बड़े-बड़े मुस्लिम विद्वानों को अपने करीब रखने की कोशिश करता है। मगर इस बार उर्दू अखबार वालों को एक ऐसी परेशानी से पाला पड़ा है कि सब के सब सरकार के विरुद्ध एकजुट नज़र आ रहे हैं।

: छोटे अखबारों को निपटाने में लगे हैं बड़े अखबार : नेताओं की मदद से सरकारी विज्ञापन पाने का लगा रहे हैं जुगाड़ :  संगठन बनाया जाए और फिर किसी समस्या के हल के लिए मिलकर कोशिश की जाए : हिन्दी और अंग्रेज़ी के समाचार पत्रों की तरह उर्दू के समाचार पत्रों में भी आपस में काफी मुकाबला देखने को मिलता है। अंतर सिर्फ इतना है कि एक ओर जहां हिन्दी और अंग्रेज़ी के समाचार पत्र खबरों के लिए मुकाबला करते हैं, वहीं उर्दू के अखबार सिर्फ इस बात के लिए एक दूसरे से मुकाबला करते हैं कि अधिक से अधिक मंत्रियों से कैसे जान पहचान बनाई जाए, कैसे ड़ीएवीपी में बड़े अधिकारियों से मिलकर अधिक से अधिक विज्ञापन हासिल किया जाए। उर्दू अखबारों में यह भी एक चलन है कि यहां हर अखबार बड़े-बड़े मुस्लिम विद्वानों को अपने करीब रखने की कोशिश करता है। मगर इस बार उर्दू अखबार वालों को एक ऐसी परेशानी से पाला पड़ा है कि सब के सब सरकार के विरुद्ध एकजुट नज़र आ रहे हैं।

मामला यह है कि पिछले कुछ महीनों से उर्दू अखबार को ड़ीएवीपी के विज्ञापन बहुत कम मिल रहे हैं। जहां तक उर्दू अखबारों का सवाल है तो उर्दू अखबार की आमदनी का जरिया बहुत हद तक ड़ीएवीपी के विज्ञापन ही होते हैं। मगर ऐसा देखा जा रहा है की यूपीए सरकार पता नहीं क्यों उर्दू अखबारों को विज्ञापन नहीं के बराबर दे रही है। हद तो यह है कि जो विज्ञापन सिर्फ उर्दू वालों के लिए होते हैं, वो भी इंग्लिश अखबारों में छपते हैं। अब चूंकि इंग्लिश या हिन्दी अखबारों की तरह उर्दू में न तो ब्लैकमेल करने का चलन है और न ही इनमें प्राइवेट विज्ञापन ज्यादा होते हैं, इसलिए उर्दू अखबार के बचे रहने के लिए ड़ीएवीपी विज्ञापन ज़रूरी है, मगर यूपीए सरकार उर्दू अखबार के साथ सौतेला रवैया अपना रही है।

सरकार की इसी बेरुखी से नाराज़ होकर उर्दू अखबार के संपादकों और मालिकों ने प्रधानमंत्री और दूसरे मंत्रियों से मिलने का सिलसिला शुरू कर दिया है। गत दिनों इसी सिलसिले में हिंदुस्तान एक्सप्रेस के परवेज़ सुहाइब अहमद, हमारा समाज के खालिद अनवर, सहाफ़त के हसन शुजा और अखबार मशरिक़ के वसीमूल हक़ ने मौलाना अरशद मदनी और सांसद बदरुद्दीन अजमल के साथ प्रधानमंत्री से मुलाकात की। प्रधानमंत्री ने इस टीम को आश्वासन दिया कि वो उर्दू अखबारों की समस्याओं पर ग़ौर करेंगे। उन्‍होंने अपने प्रेस सलाहकार से भी कहा कि इन अखबारों के समस्याओं को हल करने की कोशिश करें। इस पर अमल कब होता है, यह तो बाद में पता चलेगा। चूंकि सरकारी विज्ञापन नहीं मिलना एक बड़ी समस्या है, इसलिए इस सिलसिले में उर्दू अखबार के संपादकों ने मंत्रियों और ऐसे लोगों से मिलना शुरू कर दिया है, जिनसे कोई लाभ हो सकता है।

उर्दू अखबार की मदद के लिए मौलना लोग और कई सांसद भी सामने आ गए हैं, मगर कई लोग ऐसे भी हैं जिनका कहना है कि अखबार वाले क्या अपनी समस्या खुद हल नहीं कर सकते, जो उन्हें मौलाना लोगों की मदद लेनी पड रही है। इस सिलसिले में जिन लोगों ने खुलकर उर्दू वालों की मदद करने का वादा किया है और कर भी रहें हैं, उनमें सांसद मोहम्मद अदीब, मौलाना अहमद बुखारी, मौलाना अरशद मदनी और मौलाना वाली रहमनी का नाम उल्‍लेखनीय है। इन सभी का यही कहना है और यह सही भी कह रहें हैं कि सरकार उर्दू अखबार के साथ नाइंसाफी कर रही है। गत दिनों दिल्ली में एक प्रोग्राम के दौरान सांसद मोहम्मद अदीब ने कहा की उर्दू वालों के साथ सब से बड़ा मसला यह है कि उनका कोई संगठन नहीं है, जो उनके लिए आवाज़ बुलंद कर सके। इसी प्रोग्राम में कोलकाता के मशहूर अखबार आज़ाद हिन्द के संपादक और सांसद सईद मलीहाबादी ने कहा कि हर अखबार अकेले अपनी समस्या हल नहीं कर सकता। इसके लिए ज़रूरी है की संगठन बनाया जाए और फिर किसी समस्या के हल के लिए मिलकर कोशिश की जाए।

कुल मिला कर पहली बार ऐसा देखने में आ रहा है कि उर्दू के सभी अखबार वाले एक प्‍लेटफार्म पर आ गए हैं और सब मिलकर इस समस्या का हल निकालने की कोशिश में लगे हैं। मगर बड़े अफसोस की बात यह है कि यहां राजनीति भी हो रही है। एक ओर जहां हर कोई इस अवसर का लाभ उठा कर अपनी अधिक से अधिक पहुंच नेताओं तक बनाने की कोशिश में लगा है, वहीं उर्दू के एक बड़े अखबार राष्ट्रीय सहारा के संपादक अज़ीज़ बर्नी ने खुद को इस पूरे मामले से अलग रखा हुआ है। जिस प्रकार चुनावों के समय मुसलमानों का वोट बंट जाता है, ठीक उसी तरह यहां भी थोड़ी बहुत राजनीति हो रही है और उर्दू वाले एक दूसरे को काटने में लगे हुये हैं।

इस अवसर पर यदि सबने मिल कर काम नहीं किया तो इसका एक बड़ा नुकसान आने वाले दिनों में सब को होगा। पता नहीं यह बात उर्दू अखबारों के संपादकों या मालिकों को क्‍यों समझ में नहीं आ रही है। सुनने में यह भी आ रहा है कि सरकार को कुछ उर्दू के संपादकों ने चार-पांच नाम दे कर यह कहा है कि यही चार-पांच अखबार उर्दू के दिल्ली से निकलते हैं बाक़ी और कोई नहीं। इस के बाद से उन अखबार मालिकों में नाराज़गी पाई जा रही है, जिसका नाम इस लिस्ट में नहीं है।

लेखक ए एन शिबली पत्रकार हैं.

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