उदयपुर में फतहसागर के किनारे स्थित होटल राजबाग पैलेस में डॉ. रणजीत की ‘प्रतिनिधि कविताएँ’ पुस्तक का विमोचन समारोह हुआ। यह आयोजन माननीय समाज की स्थानीय ईकाई व सिद्धार्थ प्रकाशन के संयुक्त तत्वावधान में सम्पन्न हुआ। इस अवसर पर वरिष्ठ कवि, समाजवादी चिंतक प्रो. नंद चतुर्वेदी ने कहा कि रणजीत की कविताएँ अपने समय को प्रतिबिम्बित करती हैं। इन कविताओं में हम वर्तमान रुढ़िग्रस्त और विषमतावादी व्यवस्था का पुरअसर विरोध करते हैं। मन की भावनाएँ कविताओं को जन्म देती हैं किन्तु भावनाओं के सहारे ही चलने का विरोध भी करती है। रणजीत की कविताओं की यह विशिष्टता है कि वे अन्याय और अत्याचार के खिलाफ़ लड़ने के लिए व्यक्ति को ताकत भी देती है। प्रो. नंद चतुर्वेदी ने यह भी कहा कि डॉ. रणजीत की कविताओं में हम एक ऐसे उतार-चढ़ाव को भी पाते हैं, जो कवि के निजी जीवन के उतार-चढ़ावों को भी अभिव्यक्त करती है। उन्होंने आगे कहा कि ये कविताएँ प्रगतिशील चेतना के संदर्भ में अधिक स्मरणीय हैं।
मूर्धन्य आलोचक प्रो. नवलकिशोर ने अपने उद्बोधन में कहा कि काव्य-रचना की पहली शर्त कविता होना है। हमारे यहाँ मूल अवधारणा कविता को लेकर है। इस दृष्टि से हम कवि रणजीत की कविताओं को एक उपलब्धि के रूप में देखते हैं। उन्होंने आगे कहा कि कवि रणजीत ने अपने विचारों को कविता के रूप में सतत् प्रवाहित होने दिया है। इसकी का यह परिणाम रहा है कि समकालीन कविता की नयी दिशा के अनुसार अपनी कविता का स्थान वे बना पाये। प्रो. नवलकिशोर ने यह भी कहा कि वैश्विक और राष्ट्रीय विकास में आर्थिक और राजनीतिक संरचना का बड़ा महत्व है। देश की संपूर्ण व्यवस्थाएँ इन्हीं स्थितियों पर आधृत हो गयी हैं। आज साहित्य में इन व्यवस्थाओं की अभिव्यक्ति भी होने लगी है और यह आवश्यक भी है।
कार्यक्रम में सुखाड़िया विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. इन्द्रवर्द्धन त्रिवेदी ने अपने उद्बोधन में कहा कि समाज की दृष्टि से साहित्य की भूमिका एक सेतु जैसी होनी चाहिए। वह जोड़ने का कार्य करे। डॉ. रणजीत की कविताएँ इसलिए अपना महत्व भी प्रतिपादित करती है, क्योंकि उनमें मनुष्यता की परवाह मुख्य रूप से रही है। प्रो. त्रिवेदी ने यह भी कहा कि साहित्य की सच्ची उपयोगिता समाज-हित ही है।
राजस्थान विद्यापीठ में हिन्दी विभागाध्यक्ष डॉ. मलय पानेरी ने डॉ. रणजीत की कविताओं का मूल्यांकन करते हुए कहा कि ये कविताएँ एक ऐसे दुस्समय की कविताएँ हैं, जहाँ आम आदमी अपने जीवन में छटपटाहट, यंत्रणा, असंतुष्टि, दुराचार, असमानता आदि का शिकार है वहाँ ऐसी अभिव्यक्ति और भी अधिक प्रासंगिक हो जाती है। रणजीत की कविताएँ अपनी पूरी चमक के साथ दीर्घस्थायी प्रभाव पैदा करते हुए आम जन को संघर्ष के लिए तैयार करती है। डॉ. मलय पानेरी ने अपेन वक्तव्य में इस बात को विशेष रूप से रेखांकित किय कि विभिन्न समाजवादी-साम्यवादी दलों की पारस्परिक विद्वेषपूर्ण नीतियों की आलोचना कर डॉ. रणजीत ने अपने रचनात्मक धर्म को पूरी गंभीरता से निभाया है। विद्रोह की समग्रता भौगोलिक स्तर पर ही नहीं अपितु ऐतिहासिक स्तर पर एवं कालगत स्तर पर भी विद्यमान है।
इस अवसर पर कवि रणजीत ने अपनी कुछ कविताओं का पाठ करते हुए अपनी काव्य-रचना-प्रक्रिया पर प्रकाश डाला। उन्होंने यह स्पष्ट किया कि कवि की अपनी विचारधारा और परिस्थितियों का साम्य अथवा वैषम्य रचना में महत्व पाता है। अनुभूत यथार्थ की अभिव्यक्ति कविता को अधिक संदर्भित करती है। कविता का यही मानवीय पक्ष काव्य की धार तय करता है। डॉ. रणजीत ने यह भी रेखांकित किया कि किसी भी कविता की स्वतन्त्र वैचारिकता होती है और इसी के बल पर वह अपनी रचना करता है। रचनात्मकता से पूर्व अधिक सोचना भी रचना-प्रक्रिया का ही अंग है। कभी-कभी तात्कालिक घटनाएँ भी रचनात्मकता का आधार बन जाती हैं चाहे वे विचारधारा के विरोध-रूप में ही क्यूं न हो। समग्रतः डॉ. रणजीत ने अपनी कविताओं को यथार्थ-चिंतन की रचनाएँ माना।
कार्यक्रम के आरंभ में सिद्धार्थ प्रकाशन के संचालक ने आगंतुकों का स्वागत करते हुए कवि-परिचय प्रस्तुत किया। मानवीय समाज की स्थानीय इकाई के संचालक डॉ. राधाकृष्ण दशोरा ने कार्यक्रम के अंत में आभार-प्रदर्शन करते हुए डॉ. रणजीत की कविताओं पर अपने विचार प्रदर्शित किये। डॉ. औंकारसिंह ने धन्यवाद देते हुए कवि की रचनाओं को आज के संदर्भ में प्रासंगिक माना। उन्होंने डॉ. रणजीत की कविताओं को अतिप्रगतिशील चेतना की रचनाएँ माना।
पल्लव कुमार की रिपोर्ट.

