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…तब अंग्रेज, आज कांग्रेस!

एसएनदेश सावधान हो जाए। एक बार फिर सांप्रदायिक आधार पर देश को बांटने की तैयारी हो रही है। बिल्कुल ब्रिटिश शासकों की तर्ज पर। इस मामले में दु:खद यह कि ताजा प्रयास गुलाम भारत में अंग्रेजों की तरह नहीं, बल्कि आजाद भारत में अपने ही लोगों द्वारा हो रहा है। वह भी, वोट और सिर्फ वोट की राजनीति के लिए। अंग्रेजों ने शासन कायम रखने के लिए वह पाप किया था, आज राजनीतिक दल सत्ता में बने रहने के लिए ऐसा पाप कर रहे हैं। अगर कांग्रेस की दृष्टि में लश्कर-ए-तैयबा से कहीं अधिक खतरनाक कट्टरवादी हिंदू संगठन हैं, तो क्षमा करेंगे, इस दल के नए नेतृत्व को न तो हिंदुस्तान की पहचान है और न ही हिंदुस्तानी सोच की। देश के भावी प्रधानमंत्री के रूप में राहुल गांधी को प्रस्तुत करनेवाली कांग्रेस दु:खद रूप से स्वयं अपने इतिहास को भूल रही है। भविष्य के लिए लक्ष्य निर्धारित करने की प्रक्रिया में अतीत की याद की जाती है। समझदार अतीत से सबक भी लेते हैं। समझ में नहीं आता कि ऐसे शाश्वत सत्य को कांगे्रस नजरअंदाज क्यों कर रही हैं? पार्टी के नीति निर्धारक इतने नासमझ कैसे हो गए? मैं यह मानने को कतई तैयार नहीं कि केंद्रीय सत्ता पर काबिज पार्टी की कमान मूर्खों की कोई मंडली संभाल रही है।

एसएनदेश सावधान हो जाए। एक बार फिर सांप्रदायिक आधार पर देश को बांटने की तैयारी हो रही है। बिल्कुल ब्रिटिश शासकों की तर्ज पर। इस मामले में दु:खद यह कि ताजा प्रयास गुलाम भारत में अंग्रेजों की तरह नहीं, बल्कि आजाद भारत में अपने ही लोगों द्वारा हो रहा है। वह भी, वोट और सिर्फ वोट की राजनीति के लिए। अंग्रेजों ने शासन कायम रखने के लिए वह पाप किया था, आज राजनीतिक दल सत्ता में बने रहने के लिए ऐसा पाप कर रहे हैं। अगर कांग्रेस की दृष्टि में लश्कर-ए-तैयबा से कहीं अधिक खतरनाक कट्टरवादी हिंदू संगठन हैं, तो क्षमा करेंगे, इस दल के नए नेतृत्व को न तो हिंदुस्तान की पहचान है और न ही हिंदुस्तानी सोच की। देश के भावी प्रधानमंत्री के रूप में राहुल गांधी को प्रस्तुत करनेवाली कांग्रेस दु:खद रूप से स्वयं अपने इतिहास को भूल रही है। भविष्य के लिए लक्ष्य निर्धारित करने की प्रक्रिया में अतीत की याद की जाती है। समझदार अतीत से सबक भी लेते हैं। समझ में नहीं आता कि ऐसे शाश्वत सत्य को कांगे्रस नजरअंदाज क्यों कर रही हैं? पार्टी के नीति निर्धारक इतने नासमझ कैसे हो गए? मैं यह मानने को कतई तैयार नहीं कि केंद्रीय सत्ता पर काबिज पार्टी की कमान मूर्खों की कोई मंडली संभाल रही है।

मैं चाहूंगा कि मेरा आकलन गलत साबित हो। लेकिन फिलहाल यह शब्दांकित करने के लिए विवश हूँ कि कहीं कोई शातिर दिमाग है जो देश के इस अभिभावक दल के कंधों पर बंदूक रख लक्ष्य साध रही है। इस अदृश्य शक्ति की पहचान जरुरी है। इतिहास गवाह है कि व्यापार के नाम पर भारत पहुंचे अंग्रेजों ने अपनी कुटिलता, साजिश और अत्याचार के हथियार से भारत को गुलाम बनाया तथा धर्म संप्रदाय के विष का फैलाव कर फूट डालो और राज करो की नीति अपनाकर हम पर शासन करते रहे।

कोई दो…चार…दस साल नहीं, लगभग 200 वर्षों तक धूर्त अंग्रेजों ने हमें गुलाम बनाए रखा। इस बीच उन्होंने सांप्रदायिक आधार पर समाज को जिस तरह बांटा उसकी परिणति आजादी के साथ देश विभाजन के रूप में हुई, यही नहीं लगभग 10 लाख लोग उस आग की बलि चढ़ गए थे। आजादी के 63 वर्षों बाद भी उसकी तपिश समय-समय पर हमें झुलसा जाती है।

विकिलिक्स के खुलासे के अनुसार, कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी ने अमेरिकी राजदूत को बताया था कि ”लश्कर-ए-तैयबा जैसे इस्लामिक आंतकी संगठनों को कुछ मुसलमानों का समर्थन मिला हुआ है। लेकिन देश को उससे बड़ा खतरा कट्टरपंथी हिंदू संगठनों से है। ये संगठन धार्मिक तनाव व राजनैतिक वैमनस्य पैदा कर रहे हैं।” ध्यान रहे इसी क्रम में राहुल ने गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी जैसे भाजपा नेताओं द्वारा फैलाए जा रहे तनाव का भी जिक्र किया था। देश में ”भावी प्रधानमंत्री कांग्रेस की नजर में” की यह सोच तो निंदनीय है ही, आपत्तिजनक भी कि उन्होंने अपनी ऐसी सांप्रदायिक सोच की जानकारी अमेरिका को दी। कांग्रेस की ओर से दिया गया स्पष्टीकरण बचकाना है। राहुल ने सिर्फ हिन्दू संगठनों और भाजपा की चर्चा की है।

इससे तो साफ तौर पर प्रमाणित होता है कि कांग्रेस बिल्कुल ब्रिटिश शासकों की तर्ज पर देश में सांप्रदायिक वैमनस्य फैलाना चाहती है – धर्म व जाति के आधार पर समाज को बांटने पर तत्पर है। क्या यह देशद्रोही आचरण नहीं। पिछले दिनों मुंबई में 26/11 के शहीद वरिष्ठ पुलिस अधिकारी हेमंत करकरे की शहादत को एक अन्य कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह ने कथित हिंदू सांप्रदायिकता से जोडऩे की कोशिश की थी। इसके पहले राहुल गांधी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की तुलना प्रतिबंधित मुस्लिम आतंकी संगठन ”सिमी” से कर चुके हैं। इस पार्श्‍व में राहुल गांधी या कांग्रेस को संदेह का लाभ भी नहीं दिया जा सकता। राहुल गांधी को ”राहुल बाबा” निरुपित कर क्षमा करना एक बड़ी भूल होगी। अगर वे सचमुच ना-समझ या भोले हैं, तब यह संदेह और भी प्रगाढ़ हो जाता है कि कहीं कोई अदृश्य ताकत उनका इस्तेमाल कर रही है।

दोनों ही हालत में देश इसे बर्दाश्त नहीं कर सकता। क्योंकि दिग्विजय सिंह के रूप में कांग्रेस के अंदर लंबी हो रही चाटुकारों की पंक्ति ‘राहुल सोच’ को पार्टी की नीति-सिद्धांत मान आगे बढऩे को उद्दत है। भगवा आतंक और हिंदुवादी भाजपा का मंत्रजाप कर कांग्रेस सिर्फ वोट की राजनीति ही नहीं कर रही, एक और देश विभाजन का मार्ग प्रशस्त कर रही है। इसे रोकना होगा और तत्काल रोकना होगा।

लेखक एसएन विनोद वरिष्ठ पत्रकार हैं.

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